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सारंडा के जाजोगुट्टू में मासूमों के निवाले पर डाका! डेढ़ महीने से 30-35 बच्चे भूखे लौटने को मजबूर

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आंगनबाड़ी केंद्र में नहीं बन रहा पोषक भोजन, रोज थाली लेकर आते हैं बच्चे और खाली हाथ लौटते हैं घर

सहायिका का आरोप– सेविका नहीं दे रहीं राशन और सब्जियां, हर बार राशन नहीं होने का बनाया जा रहा बहाना

गांव के विजय देवगम, बामिया सुरीन और ग्रामीणों में भारी नाराजगी, बच्चों के पोषण से खिलवाड़ करने वालों पर उच्चस्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग

रिपोर्ट शैलेश सिंह।

किरीबुरू। सारंडा के अति पिछड़े गांवों में शुमार जाजोगुट्टू में सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता का एक ऐसा मामला सामने आया है, जो महिला एवं बाल विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में पढ़ने वाले लगभग 30 से 35 मासूम बच्चों को पिछले डेढ़ महीने से पोषक भोजन नसीब नहीं हो रहा है। हैरानी की बात यह है कि जिन बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार ने आंगनबाड़ी केंद्रों को सौंपी है, उन्हीं बच्चों को भोजन के अभाव में रोज भूखे घर लौटना पड़ रहा है।

आंगनबाड़ी केंद्र में सहायिका रांकी सुरीन 

थाली लेकर आते हैं बच्चे, लेकिन भोजन के बजाय मिलती है मायूसी

जाजोगुट्टू आंगनबाड़ी केंद्र की तस्वीर बेहद चिंताजनक है। प्रतिदिन छोटे-छोटे बच्चे अपने घरों से भोजन करने के लिए थाली लेकर केंद्र पहुंचते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि आज केंद्र में भोजन मिलेगा और वे अपनी भूख मिटा सकेंगे। लेकिन केंद्र में भोजन नहीं बनने के कारण बच्चों की उम्मीद हर दिन टूट रही है। सहायिका के पास भोजन लेने पहुंचने वाले बच्चे खाली थाली लेकर निराश मन से वापस अपने घर लौट जाते हैं।

यह सिलसिला एक-दो दिन का नहीं, बल्कि पिछले डेढ़ महीने से लगातार जारी बताया जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर इन मासूमों के हिस्से का पोषक भोजन कहां जा रहा है?

सहायिका ने सेविका पर लगाया राशन नहीं देने का आरोप

इस पूरे मामले में आंगनबाड़ी केंद्र की सहायिका रांकी सुरीन ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि केंद्र की सेविका द्वारा पिछले डेढ़ महीने से बच्चों के भोजन के लिए राशन और सब्जियां उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। ऐसे में भोजन तैयार करना उनके लिए संभव नहीं है।

सहायिका के अनुसार, वह प्रतिदिन सेविका से राशन और सब्जियों की मांग करती हैं, लेकिन हर बार राशन उपलब्ध नहीं होने, राशन का उठाव नहीं होने अथवा सप्लाई नहीं मिलने का हवाला देकर उन्हें लौटा दिया जाता है। सहायिका का सवाल है कि जब भोजन बनाने के लिए जरूरी सामग्री ही नहीं मिलेगी, तो बच्चों के लिए खाना कैसे तैयार किया जाएगा?

केंद्र के अन्य खर्च की निकासी होती है, फिर राशन कहां अटका?

सहायिका ने यह भी बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र के अन्य खर्चों के लिए आने वाली राशि की निकासी करने के दौरान सेविका उनके साथ बैंक जाती हैं। ऐसे में ग्रामीणों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब केंद्र के अन्य कार्यों के लिए राशि की निकासी हो रही है, तो बच्चों के भोजन के लिए राशन और सब्जियों की व्यवस्था पिछले डेढ़ महीने से क्यों नहीं हो पा रही है?

हालांकि, इन आरोपों की विभागीय स्तर पर जांच और संबंधित सेविका का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

विजय देवगम की तस्वीर

विजय देवगम, बामिया सुरीन और ग्रामीणों में आक्रोश

आंगनबाड़ी केंद्र में डेढ़ महीने से बच्चों को भोजन नहीं मिलने की जानकारी सामने आने के बाद गांव के विजय देवगम और बामिया सुरीन समेत ग्रामीणों में भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि गरीब और पिछड़े इलाके के बच्चों के लिए आंगनबाड़ी केंद्र पोषण और प्रारंभिक देखभाल का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन यहां बच्चों को उनका बुनियादी अधिकार तक नहीं मिल पा रहा है।

ग्रामीणों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि गांव के 30-35 बच्चों को डेढ़ महीने तक भोजन नहीं मिला, तो संबंधित विभाग के अधिकारियों ने इसकी सुध क्यों नहीं ली? क्या विभागीय निगरानी केवल कागजों तक सीमित है?

सारंडा में कुपोषण की चुनौती, फिर बच्चों के पोषण से खिलवाड़ क्यों?

सारंडा के दुर्गम और पिछड़े गांवों में गरीबी, सीमित संसाधन और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण बच्चों के पोषण की चुनौती पहले से गंभीर बनी हुई है। क्षेत्र के कई गांवों में कुपोषण की समस्या सामने आती रही है। ऐसे हालात में आंगनबाड़ी केंद्रों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए पोषाहार और भोजन की व्यवस्था पर लाखों रुपये खर्च करती है। लेकिन यदि जाजोगुट्टू जैसे गांवों में बच्चों को डेढ़ महीने तक भोजन ही नहीं मिले, तो सरकारी योजनाओं का लाभ आखिर किसे मिल रहा है?

उच्चस्तरीय जांच हो, दोषियों पर हो कठोर कार्रवाई

जाजोगुट्टू की यह स्थिति केवल एक आंगनबाड़ी केंद्र की अव्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि बच्चों के पोषण और उनके अधिकारों से जुड़ा गंभीर सवाल है। जिला प्रशासन और महिला एवं बाल विकास विभाग के वरीय अधिकारियों को तत्काल मामले का संज्ञान लेकर केंद्र का औचक निरीक्षण करना चाहिए।

पिछले डेढ़ महीने के राशन उठाव, आपूर्ति, वितरण, खर्च और भोजन वितरण से संबंधित अभिलेखों की जांच कराई जानी चाहिए। साथ ही बच्चों और अभिभावकों से भी वास्तविक स्थिति की जानकारी ली जानी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बच्चों के हिस्से का निवाला आखिर कहां गायब हो रहा है।

मासूमों के निवाले पर किसी को डाका डालने का अधिकार नहीं है। यदि जांच में लापरवाही, अनियमितता अथवा सरकारी पोषाहार के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि डेढ़ महीने से भोजन क्यों नहीं बना, बल्कि यह भी है कि जिन मासूमों के पोषण के नाम पर सरकारी राशि खर्च हो रही है, उन्हें उनका हक आखिर कब मिलेगा?

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