ग्राम सभा के फैसले पर मुंडा मंगल पुरती के नेतृत्व में ग्रामीणों ने पारंपरिक सीमा पर लगाया पहचान बोर्ड | खतियान और मालगुजारी रसीदें लेकर उमड़े ग्रामीण, जिला प्रशासन से नगरपालिका में शामिल करने का प्रस्ताव तत्काल वापस लेने की मांग
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
गुवा, 1 नवंबर। विकास के नाम पर किसी गांव की पहचान, परंपरा और पारंपरिक स्वशासन को मिटाने की कोशिश आखिर कब तक बर्दाश्त की जाएगी? क्या शहरीकरण का मतलब यह है कि सदियों से अपनी जमीन, संस्कृति और ग्राम सभा की परंपराओं के सहारे जीवन जी रहे ग्रामीणों के अस्तित्व पर ही बुलडोजर चला दिया जाए? पश्चिमी सिंहभूम जिले के ऐतिहासिक गांव गुवासाई में आज यही सवाल जिला प्रशासन के सामने चुनौती बनकर खड़ा हो गया है।
गुवासाई को नगरपालिका क्षेत्र में शामिल करने की प्रशासनिक कवायद के खिलाफ ग्रामीणों का आक्रोश अब खुलकर सड़क पर उतर आया है। अपने गांव की पारंपरिक पहचान, पुश्तैनी जमीन और ग्राम सभा के अधिकारों की रक्षा के लिए ग्रामीणों ने रविवार, 1 नवंबर को ऐसा कदम उठाया, जो प्रशासन के लिए स्पष्ट संदेश है। गांव की पारंपरिक सीमा पर ग्रामीणों ने अपनी अस्मिता और अस्तित्व का प्रतीक पहचान बोर्ड गाड़कर दो टूक संदेश दे दिया कि गुवासाई की पहचान किसी प्रशासनिक आदेश से समाप्त नहीं की जा सकती।

ग्राम सभा का फैसला, सीमा पर गड़ा अस्मिता का बोर्ड
गांव के मुंडा मंगल पुरती की अध्यक्षता में तथा सारंडा पीढ़ मानकी सुरेश चांपिया, दीउरी सुशील पूर्ति, डकुआ जगमोहन पूर्ति, राज पूर्ति, लंका पूर्ति, विनय पूर्ति, हेमंत पान, सुमित्रा पूर्ति, बीर सिंह पूर्ति, मंगल सिंह पूर्ति, रजनी पूर्ति, लखन पूर्ति, सोनाराम बोदरा, मनीष कोड़ा, सोनाराम पूर्ति, रोहन चांपिया आदि ग्रामीणों की उपस्थिति में आयोजित ग्राम सभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया था कि गुवासाई की पारंपरिक सीमा और अलग ग्राम पहचान को हर हाल में सुरक्षित रखा जाएगा। इसी निर्णय को धरातल पर उतारते हुए रविवार सुबह मुंडा मंगल पुरती के दिशा-निर्देश पर ग्रामीणों ने गांव की पारंपरिक सीमा पर पहचान बोर्ड स्थापित किया।
यह महज एक बोर्ड लगाने की औपचारिकता नहीं थी, बल्कि नगरपालिका में शामिल किए जाने की प्रस्तावित कवायद के खिलाफ ग्रामीणों की सामूहिक असहमति और अपनी पहचान बचाने का खुला ऐलान था। ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया कि वे अपने गांव के पारंपरिक स्वरूप और अधिकारों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेंगे।
हाथों में खतियान, मालगुजारी रसीदें और चेहरे पर आक्रोश
इस विरोध की सबसे खास तस्वीर तब सामने आई, जब गांव के लोग अपने हाथों में पुश्तैनी जमीन के खतियान और मालगुजारी रसीदें लेकर सीमा पर पहुंचे। ग्रामीणों के हाथों में मौजूद ये दस्तावेज उनकी जमीन से जुड़े ऐतिहासिक अधिकारों और पीढ़ियों पुराने जुड़ाव की गवाही दे रहे थे।
उनका संदेश साफ था कि गुवासाई कोई नई बसी हुई शहरी कॉलोनी नहीं, बल्कि अपनी स्थापित सामाजिक व्यवस्था, पारंपरिक सीमाओं और सांस्कृतिक पहचान वाला ऐतिहासिक गांव है। यहां की जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पूर्वजों की विरासत और आने वाली पीढ़ियों की पहचान है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिस जमीन पर उनके पूर्वजों ने जीवन बिताया, जिस गांव की मिट्टी में उनकी परंपराएं और संस्कृति रची-बसी हैं, उसके भविष्य का फैसला उनकी भावनाओं और ग्राम सभा की सहमति को नजरअंदाज कर कैसे किया जा सकता है?
नगरपालिका बनी तो ग्राम सभा और पारंपरिक व्यवस्था पर संकट!
ग्रामीणों की सबसे बड़ी चिंता केवल नगरपालिका की प्रशासनिक सीमा में शामिल होने तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, इस फैसले से गांव की पारंपरिक ग्राम सभा, सामाजिक व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
गांव की परंपरा में सरना स्थल और ग्राम सभा का विशेष महत्व है। यहीं ग्रामीण सामूहिक रूप से बैठकर सामाजिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक हितों से जुड़े फैसले लेते हैं। पारंपरिक व्यवस्था में मुंडा और ग्राम सभा की भूमिका केवल औपचारिक नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण आधार है।
ग्रामीणों को आशंका है कि नगरपालिका का ढांचा लागू होने के बाद शहरी कर व्यवस्था, भवन निर्माण संबंधी नियमों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का दबाव बढ़ेगा। इससे उनकी पारंपरिक जीवनशैली और स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। उनका सवाल है कि जब गांव की अपनी पहचान और व्यवस्था पहले से मौजूद है, तो फिर उस पर शहरी व्यवस्था थोपने की जरूरत आखिर क्यों?
विकास चाहिए, लेकिन अस्तित्व की कीमत पर नहीं!
ग्रामीणों का विरोध विकास के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी इच्छा और पारंपरिक पहचान की अनदेखी कर लिए जाने वाले फैसले के खिलाफ है। गांव में सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विस्तार होना चाहिए, लेकिन इन सुविधाओं के नाम पर गांव की मूल पहचान समाप्त करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
ग्रामीणों की दलील है कि विकास की योजनाएं गांव के पारंपरिक स्वरूप और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए। गांव को सुविधाएं देने के बजाय उसकी पहचान ही बदलने की कोशिश की गई तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।

जिला प्रशासन से दो टूक मांग—फैसले पर पुनर्विचार नहीं, प्रस्ताव वापस हो!
गुवासाई की सीमा पर स्थापित पहचान बोर्ड अब जिला प्रशासन के लिए एक स्पष्ट राजनीतिक और प्रशासनिक संदेश बन गया है। ग्रामीण चाहते हैं कि प्रशासन उनके खतियान, मालगुजारी रसीदों, पारंपरिक सीमाओं और ग्राम सभा में लिए गए सर्वसम्मत निर्णय को गंभीरता से संज्ञान में ले।
ग्रामीणों की मांग है कि गुवासाई को नगरपालिका क्षेत्र में शामिल करने की प्रस्तावित प्रक्रिया तत्काल रोकी जाए और गांव को नगरपालिका में शामिल करने का फैसला वापस लिया जाए। साथ ही, ग्रामीणों की ग्राम सभा के साथ संवाद स्थापित कर उनकी सहमति और पारंपरिक अधिकारों का सम्मान किया जाए।
गुवासाई में रविवार को गाड़ा गया पहचान बोर्ड केवल एक गांव की सीमा का संकेत नहीं है, बल्कि अपनी जमीन, संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा के लिए एकजुट हुए ग्रामीणों की बुलंद आवाज है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस आवाज को गंभीरता से सुनता है या फिर ग्रामीणों को अपने अधिकारों और अस्मिता की लड़ाई और तेज करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।










