मिसिर बेसरा समेत इनामी नक्सलियों की टीम को चारों तरफ से घेरने की रणनीति
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा के घने जंगलों में अब नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक जंग की तैयारी तेज हो गई है। एक करोड़ से अधिक के इनामी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा समेत लगभग 40 सदस्यीय नक्सली दस्ते पर पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों ने शिकंजा और कस दिया है।
9 और 10 मार्च से किरीबुरू, मेघाहातुबुरु, बड़ाजामदा और आसपास के शहरी क्षेत्रों में ठहरे कोबरा, सीआरपीएफ और अन्य सुरक्षा बलों की विभिन्न कंपनियों के जवानों को युद्ध स्तर पर सारंडा के गहरे जंगलों में भेजा जा रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों का स्पष्ट लक्ष्य है—31 मार्च तक देश से नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में निर्णायक प्रहार करना। इसी रणनीति के तहत अब जंगल के भीतर स्थायी दबाव बनाने की तैयारी चल रही है।

युद्ध स्तर पर चल रहा जवानों का मूवमेंट
सुरक्षा बलों की रणनीति के तहत बड़े पैमाने पर जवानों को जंगल के अंदर भेजने का अभियान जारी है। किरीबुरू और बड़ाजामदा क्षेत्र से लगातार सुरक्षा बलों की गाड़ियां जंगल की ओर बढ़ती देखी जा रही हैं।
इसके लिए स्थानीय पुलिस द्वारा बड़ी संख्या में वाहनों की धर-पकड़ की गई है। इन वाहनों के माध्यम से जवानों के लिए जरूरी राशन, हथियार, संचार उपकरण और अन्य जरूरी सामान जंगल के अंदर अलग-अलग स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, ऑपरेशन को लंबा और लगातार चलाने की रणनीति बनाई गई है, ताकि नक्सलियों को सांस लेने तक की मोहलत न मिले।
जंगल में कैंप बढ़ाने की रणनीति
सारंडा के जंगलों के अंदर पहले से ही दर्जनों सुरक्षा कैंप मौजूद हैं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की नजर अब उन क्षेत्रों पर है जहां से नक्सली सुरक्षित निकलने की कोशिश कर सकते हैं।
ऐसे सभी संभावित रास्तों और पहाड़ी इलाकों को चिन्हित किया जा रहा है। योजना है कि वहां भी जवानों की तैनाती कर मजबूत घेराबंदी बनाई जाए, ताकि नक्सलियों के पास भागने का कोई रास्ता न बचे।
सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि यदि जवान जंगल के अंदर लगातार मौजूद रहेंगे तो ऑपरेशन चलाना काफी आसान हो जाएगा।
शहर से ऑपरेशन चलाना बनता था खतरा
अब तक कई ऑपरेशन शहरों या बाहरी कैंपों से संचालित होते रहे हैं। लेकिन इस व्यवस्था में कई तरह की परेशानियां सामने आती थीं।
जंगल के भीतर जाकर ऑपरेशन चलाने के बाद जवानों को वापस लौटना पड़ता था, जिससे रास्ते में नक्सलियों द्वारा लगाए गए एंबुश में फंसने का खतरा बना रहता था।
इसी वजह से अब रणनीति बदली गई है।
जंगल के भीतर ही मजबूत कैंप बनाकर लगातार दबाव बनाए रखने का फैसला लिया गया है।
सलाई जंगल की पहाड़ियों में दिखे नक्सली !
दूसरी ओर ग्रामीण सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सलाई जंगल के समीप स्थित ऊंची पहाड़ी—जिसे स्थानीय लोग दड़ाकदा या बड़ाकदा जंगल के नाम से जानते हैं—वहां बीते बुधवार से दो दिनों तक लगभग 30 से 40 की संख्या में नक्सली डेरा डाले हुए थे।
ग्रामीणों का कहना है कि नक्सली वहां कुछ समय तक रुके और बाद में वहां से निकल गए।
सूत्रों के अनुसार, यह वही दस्ता बताया जा रहा है जिसमें मिसिर बेसरा से जुड़े नक्सली शामिल हैं।

अब टंकुरा जंगल के चोकोयोदौड़ा पहाड़ी पर सक्रियता
ग्रामीण सूत्रों के मुताबिक, वर्तमान में नक्सलियों का यह दस्ता सारंडा के टंकुरा जंगल क्षेत्र के चोकोयोदौड़ा पहाड़ी इलाके में देखा गया है।
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि वे वहां कितने समय तक रुकेंगे। नक्सली लगातार जगह बदल रहे हैं ताकि सुरक्षा बलों की पकड़ से बच सकें।
लेकिन इस बार हालात पहले जैसे नहीं हैं।
चारों तरफ से मजबूत घेराबंदी
पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों ने अब चारों तरफ से अपनी पकड़ मजबूत कर ली है।
ड्रोन निगरानी, खुफिया नेटवर्क और स्थानीय इनपुट के आधार पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अब नक्सलियों की गतिविधियां काफी सीमित हो चुकी हैं और वे लगातार दबाव में हैं।
जंगल के अंदर जवानों की संख्या बढ़ने से नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने ढूंढना भी मुश्किल होता जा रहा है।

नक्सलियों के लिए अब बचा आखिरी विकल्प
सुरक्षा बलों के लगातार बढ़ते दबाव के बीच अब नक्सलियों के सामने विकल्प बेहद सीमित हो चुके हैं।
सुरक्षा एजेंसियों का स्पष्ट संदेश है कि अब नक्सलियों के पास सिर्फ दो ही रास्ते बचे हैं—
पहला – आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटें।
दूसरा – मुठभेड़ में मारे जाएं।
देश के कई राज्यों में नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के बाद अब सारंडा को भी पूरी तरह नक्सल मुक्त बनाने की दिशा में अंतिम चरण की कार्रवाई मानी जा रही है।
निर्णायक लड़ाई की ओर बढ़ता सारंडा
सारंडा का जंगल कभी नक्सलियों का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।
सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, ग्रामीणों का घटता समर्थन और खुफिया नेटवर्क की मजबूती ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है।
यदि यही दबाव बना रहा तो आने वाले दिनों में सारंडा जंगल नक्सलवाद के इतिहास का अंतिम अध्याय लिख सकता है।














