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“जलमीनार खड़ा है, लेकिन गांव प्यासा है”, 15 करोड़ की जलापूर्ति योजना बनी “सफेद हाथी”।

On: March 11, 2026 4:00 PM
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दोदारी जलमीनार से सिर्फ आधा दर्जन गांवों को मिल रहा पानी, बाकी गांवों के हजारों ग्रामीण आज भी नदी-नाले का दूषित पानी पीने को मजबूर – विभागीय अधिकारियों के रवैये से फूटा आक्रोश

रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा के नक्सल प्रभावित इलाके में करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई पेयजल आपूर्ति योजना अब ग्रामीणों के लिए राहत नहीं बल्कि गुस्से और निराशा का कारण बनती जा रही है। लगभग 15 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित गंगदा पंचायत की जलापूर्ति योजना आज भी पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है।
स्थिति यह है कि दोदारी गांव स्थित जलमीनार से सिर्फ आधा दर्जन गांवों को ही पानी मिल पा रहा है, जबकि पंचायत के कई गांवों के हजारों ग्रामीण आज भी शुद्ध पेयजल से वंचित हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कासिया-पेचा गांव में बने जलमीनार से आज तक चार गांवों को एक बूंद पानी भी नहीं मिल पाया।
गर्मी की शुरुआत होते ही पानी की समस्या विकराल होती जा रही है, जिससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।

गांव में अधिकारियों के वाहन

 

करोड़ों खर्च, लेकिन अधूरी रही योजना

गंगदा पंचायत में पेयजल संकट दूर करने के लिए लगभग 1437.78 लाख रुपये (करीब 15 करोड़) की लागत से जलापूर्ति योजना बनाई गई थी। इस योजना के तहत दो बड़े जलमीनार बनाए गए –
दोदारी जलमीनार – 1.80 लाख लीटर क्षमता
कासिया-पेचा जलमीनार – 1.15 लाख लीटर क्षमता
इसके अलावा लगभग 56 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई और कोयना नदी को जल स्रोत बनाया गया। नदी के इंटेक वेल में 20 एचपी का मोटर लगाया गया ताकि पानी को जलमीनार तक पहुंचाया जा सके और वहां से सभी गांवों तक आपूर्ति हो सके।
लेकिन करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यह योजना पूरी तरह सफल नहीं हो पाई।

सिर्फ आधा दर्जन गांवों को मिल रहा पानी

ग्रामीणों के अनुसार दोदारी जलमीनार से सिर्फ आधा दर्जन गांवों को ही पानी की आपूर्ति हो रही है।
बाकी गांवों में पाइपलाइन तो बिछा दी गई, लेकिन या तो कनेक्शन नहीं दिया गया या फिर नलों से पानी नहीं निकलता।
इस वजह से पंचायत के अधिकांश गांवों के लोग आज भी पानी के लिए परेशान हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इतने बड़े बजट की योजना होने के बावजूद आधे से अधिक गांवों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

कासिया-पेचा जलमीनार आज तक बेकार

स्थिति सबसे खराब कासिया-पेचा गांव की है। यहां लगभग सात वर्ष पहले जलमीनार का निर्माण किया गया था, लेकिन आज तक उसमें पानी ही नहीं चढ़ा।
इस जलमीनार से कासिया-पेचा, घाटकुड़ी, गंगदा और रोवाम गांव को पानी आपूर्ति की योजना थी।
लेकिन आज भी इन गांवों के लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं।

14 गांवों की आबादी प्रभावित

इस योजना के तहत गंगदा पंचायत के कुल 14 गांवों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना था।
इन गांवों में शामिल हैं –
गंगदा, दुईया, सलाई, घाटकुड़ी, टिमरा, राडुवा, मम्मार, हिनुआ, कासिया-पेचा, सोदा, चुर्गी, दोदारी, रोवाम और कुम्बिया।
इन सभी गांवों की कुल आबादी लगभग 6258 है।
लेकिन आज स्थिति यह है कि सिर्फ कुछ गांवों को छोड़कर अधिकांश गांवों के ग्रामीण आज भी शुद्ध पानी से वंचित हैं।

महिलाएं बोलीं – अधिकारी बिना बात किए लौट गए

11 मार्च को पेयजल विभाग के अधिकारी और योजना के संवेदक कासिया-पेचा गांव पहुंचे थे। ग्रामीणों को उम्मीद थी कि शायद अब उनकी समस्या सुनी जाएगी।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी सिर्फ औपचारिक निरीक्षण कर वापस लौट गए।
गांव की महिलाओं ने बताया कि अधिकारी जलमीनार के पास स्थित सुनिया पूर्ति के घर लगे नल को देखने पहुंचे, लेकिन वहां भी नल से पानी नहीं निकल रहा था।
महिलाओं के अनुसार जैसे ही ग्रामीण अपनी समस्या बताने आगे बढ़े, अधिकारी बिना किसी से बातचीत किए ही वापस लौट गए। इससे ग्रामीणों में भारी नाराजगी फैल गई है।

कई बार हुआ आंदोलन, हर बार मिला सिर्फ आश्वासन

ग्रामीणों का कहना है कि पानी की समस्या को लेकर वे कई बार सड़क जाम और आंदोलन कर चुके हैं।
हर बार अधिकारियों द्वारा आश्वासन दिया गया कि जल्द समस्या का समाधान किया जाएगा, लेकिन आज तक स्थिति नहीं बदली।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार की योजनाएं कागजों में पूरी हो जाती हैं, लेकिन जमीन पर लोग पानी के लिए तरसते रहते हैं।

आज भी नदी-नाला का दूषित पानी पीने को मजबूर

गंगदा पंचायत के कई गांवों में आज भी ग्रामीण नदी, नाला और झरनों का पानी पीने को मजबूर हैं।
गर्मी के मौसम में जब जल स्रोत सूखने लगते हैं, तब स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। कई गांवों की महिलाएं और बच्चे किलोमीटरों दूर से पानी लाने को मजबूर होते हैं।
दूषित पानी पीने के कारण ग्रामीणों में जलजनित बीमारियों का खतरा भी बना रहता है।

ग्रामीणों की चेतावनी – अब होगा बड़ा आंदोलन

लगातार उपेक्षा से नाराज ग्रामीण अब बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं।
चारों गांवों के ग्रामीणों ने निर्णय लिया है कि जल्द ही ग्राम सभा की बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे गुवा–रोवाम और छोटानागरा मुख्य सड़क को अनिश्चितकालीन जाम करेंगे।

बड़ा सवाल – जिम्मेदार कौन?

सारंडा जैसे संवेदनशील और नक्सल प्रभावित इलाके में करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई योजना का इस तरह अधूरा रह जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का खुलासा हो सकता है।
क्योंकि करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी आज हजारों ग्रामीण पानी की एक बूंद के लिए तरस रहे हैं।

“जलमीनार खड़ा है, लेकिन गांव प्यासा है”

गंगदा पंचायत के ग्रामीणों की पीड़ा यही है कि उनके गांव में करोड़ों रुपये की जलापूर्ति योजना खड़ी है, लेकिन पानी आज भी नसीब नहीं हो रहा।
सारंडा के जंगलों में बसे इन गांवों में महिलाएं आज भी घड़ों और बाल्टियों के साथ नदी-नालों की ओर जाती दिखाई देती हैं।
गांव के पास खड़ा जलमीनार मानो यही सवाल पूछ रहा है –
“आखिर 15 करोड़ की योजना के बावजूद इन गांवों की प्यास कब बुझेगी?”

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