घूसखोरी ने शिक्षक को बनाया बंदूकधारी, अब सरकार पूछ रही—सरेंडर क्यों नहीं करता?
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
सारंडा का घेरा… और सिस्टम की घेराबंदी फेल!
झारखंड के सारंडा जंगल में इस वक्त गोलियों की आवाज गूंज रही है, लेकिन उससे ज्यादा तेज एक सवाल गूंज रहा है—क्या बंदूक से सिस्टम की गंदगी साफ होगी?
करीब 60-70 साल का बुजुर्ग नक्सली—मिसिर बेसरा—जिसके सिर पर 1 करोड़ का इनाम है, पिछले कई दिनों से सुरक्षा बलों के घेरे में बताया जा रहा है। 40-50 नक्सलियों के साथ उसे 10 किलोमीटर के दायरे में सीआरपीएफ ने जकड़ रखा था। फायरिंग हुई, ऑपरेशन चला, रणनीति बनी… लेकिन खबर ये कि वह फिर निकल गया।

यानी जंगल का बुजुर्ग फिर सिस्टम को मात दे गया!
सीआरपीएफ के स्पेशल डीजी ने अल्टीमेटम दे दिया—एक महीने के अंदर सरेंडर करो, नहीं तो होगा खात्मा।
पर असली सवाल—क्या सिर्फ अल्टीमेटम से कहानी खत्म हो जाएगी?
“पापा लौट आइए…”—28 साल बाद बेटे की चीख
इस कहानी का सबसे कड़वा सच बंदूक नहीं, बल्कि एक बेटे की टूटती आवाज है।
सिद्धार्थ बेसरा—मिसिर का बेटा—28 साल से अपने पिता को नहीं देखा।
* 7 साल का था, जब बाप जंगल चला गया।
* कुछ साल बाद मां मर गई।
* बहन भी चली गई।
* घर उजड़ गया।
आज वही बेटा मुंबई की एक फैक्ट्री में 9,000 रुपये की नौकरी कर जिंदगी ढो रहा है। अब रांची में काम ढूंढ रहा है, ताकि अपने ही राज्य में दो वक्त की रोटी कमा सके।
उसकी अपील—
“पापा, बंदूक छोड़िए… घर लौट आइए…”
लेकिन यह सिर्फ एक बेटे की गुहार नहीं, यह सिस्टम के मुंह पर तमाचा है।
सच का विस्फोट: “8,000 की घूस नहीं दी, इसलिए नक्सली बन गया”
अब सुनिए वो सच, जिसे सिस्टम छिपाना चाहता है।
सिद्धार्थ के दादा एक मीडिया को बताये हैं—
“मिसिर पढ़ाई में तेज था… सरकारी शिक्षक की नौकरी लगी थी… लेकिन जॉइनिंग के समय 8,000 रुपये घूस मांगा गया। हम जमीन बेचकर देने को तैयार थे… पर उसने मना कर दिया… बोला—योग्यता है तो पैसे क्यों दें? उसी दिन से उसका सिस्टम से भरोसा खत्म हो गया… और उसने बंदूक उठा ली…”
बस! यही वो पल था—जहां एक शिक्षक मर गया… और एक नक्सली पैदा हो गया।
सिस्टम का असली चेहरा: योग्यता हार गई, घूस जीत गई
अब जरा सोचिए—
* पीजी पास युवक
* सरकारी नौकरी चयनित
* लेकिन जॉइनिंग के लिए रिश्वत जरूरी
यानी इस देश में योग्यता नहीं, “रेट कार्ड” चलता है!
और जब कोई इस गंदगी को ठुकराता है…
तो वही सिस्टम उसे अपराधी बना देता है।
30 साल बाद भी वही सड़ांध… बल्कि और बदतर!
सवाल ये नहीं कि मिसिर बेसरा क्यों बना।
सवाल ये है कि आज भी वही हाल क्यों है?
* क्या आज बिना पैसे नौकरी मिलती है?
* क्या पेपर लीक बंद हो गया?
* क्या “सेटिंग-गेटिंग” खत्म हो गई?
सच कड़वा है—
पहले 8,000 में काम होता था, आज लाखों-करोड़ों में सौदा होता है।
यानी सिस्टम सुधरा नहीं…
बल्कि और महंगा, और गंदा हो गया।
सरकार की दोहरी नीति: बंदूक वालों पर सख्ती, भ्रष्टों पर नरमी
सरकार कहती है—नक्सलवाद खत्म करेंगे।
ठीक है, करना चाहिए…खत्म होना चाहिए।
लेकिन सवाल ये है—
* जो घूस लेते हैं, वो क्या देशभक्त हैं?
* जो पेपर लीक कराते हैं, वो क्या सिस्टम के सेवक हैं?
* जो नौकरी बेचते हैं, वो क्या राष्ट्रनिर्माता हैं?
नहीं! ये भी उतने ही खतरनाक हैं जितने जंगल में छिपे नक्सली।
फर्क बस इतना है—
एक बंदूक से मारता है, दूसरा सिस्टम को अंदर से खा जाता है।

मिसिर बेसरा—अपराधी या व्यवस्था की उपज?
यहां एक सीधा सवाल है—
* क्या मिसिर बेसरा पैदा हुआ था नक्सली बनने के लिए?
* या उसे बनाया गया?
जब सिस्टम योग्य को अपमानित करेगा…
जब मेहनत करने वाले को ठुकराएगा…
जब न्याय बिकेगा…
तो बंदूक ही आखिरी रास्ता बनता है।
नई पीढ़ी उबल रही है… और सिस्टम सो रहा है
आज का युवा सब देख रहा है—
* मेहनत करने के बाद भी रिजल्ट संदिग्ध
* परीक्षा से पहले पेपर आउट
* इंटरव्यू में सेटिंग
यानी “मेहनत” मजाक बन गई है।
और यही आक्रोश कल विस्फोट बनेगा।
सरेंडर की अपील नहीं, सिस्टम का आत्मसमर्पण जरूरी
आज सरकार कह रही—मिसिर बेसरा सरेंडर करो।
लेकिन असली जरूरत है—
सिस्टम खुद अपने भ्रष्टाचार के सामने सरेंडर करे!
* घूसखोर अफसरों को जेल नहीं, उदाहरण बनाइए
* पेपर लीक माफिया को जड़ से खत्म कीजिए
* भर्ती प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाइए
“कदाचार मुक्त परीक्षा”—सिर्फ नारा नहीं, युद्ध होना चाहिए
अगर सच में नक्सलवाद खत्म करना है, तो युद्ध जंगल में नहीं, सिस्टम में छेड़िए।
* हर परीक्षा की रियल-टाइम निगरानी
* हर चयन प्रक्रिया की सार्वजनिक जांच
* हर शिकायत पर त्वरित कार्रवाई
जिस दिन गरीब का बेटा बिना पैसे नौकरी पाएगा—
उसी दिन बंदूक अपने आप गिर जाएगी।
आखिरी चेतावनी: अगला मिसिर और खतरनाक होगा
आज मिसिर बेसरा 60-70 साल का है।
कल 25 साल का होगा।
आज वह जंगल में है।
कल शहर में होगा।
अगर सिस्टम नहीं सुधरा, तो आने वाला विस्फोट ज्यादा खतरनाक होगा।
बंदूक से नहीं, ईमानदारी से जीतेगा देश
यह लड़ाई सिर्फ नक्सलियों के खिलाफ नहीं है।
यह लड़ाई उस भ्रष्ट सोच के खिलाफ है, जिसने एक होनहार युवक को अपराधी बना दिया।
याद रखिए—
नक्सली जंगल में पैदा नहीं होते,
उन्हें सिस्टम पैदा करता है।
अब फैसला सरकार के हाथ में है—
जंगल साफ करेगी… या सिस्टम भी?
(नोट: इस लेख का उद्देश्य मिसिर बेसरा या किसी नक्सली/अपराधी को हीरो बनाना नहीं है, बल्कि सिस्टम की सच्चाई को बताना है)













