13 जुलाई से सूखे पड़े नल, नदी-नाले का गंदा पानी पीने को मजबूर ग्रामीण
रिपोर्ट शैलेश सिंह
पश्चिम सिंहभूम के सारंडा स्थित छोटानागरा पंचायत में करोड़ों रुपये की महत्वाकांक्षी बाईहातु-आसन जलापूर्ति योजना पूरी तरह सवालों के घेरे में आ गई है। बीते 13 जुलाई से पंचायत के सभी 10 गांवों और उनके विभिन्न टोलों में पेयजल आपूर्ति पूरी तरह ठप है। नलों से पानी की एक बूंद तक नहीं निकल रही है। नतीजतन हजारों ग्रामीण बारिश के मौसम में नदी-नालों का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इससे जलजनित बीमारियों और मलेरिया के खतरे ने ग्रामीणों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है।
ग्रामीणों का आरोप है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है। अब जब जलापूर्ति पूरी तरह बंद हो गई है, तो जिम्मेदार विभाग और ठेकेदार दोनों जवाब देने से बच रहे हैं।

टेंडर खत्म, तो बंद कर दी पानी की सप्लाई!
छोटानागरा पंचायत की मुखिया मुन्नी देवगम ने बताया कि पंचायत में बाईहातु-आसन जलापूर्ति योजना के तहत एक निजी ठेका कंपनी के माध्यम से पेयजल आपूर्ति की जा रही थी। अब बताया जा रहा है कि ठेकेदार का टेंडर समाप्त हो गया है, इसलिए जलापूर्ति बंद कर दी गई।
सबसे हैरानी की बात यह है कि इसकी कोई आधिकारिक सूचना न तो पंचायत को दी गई और न ही गांवों के मुंडाओं को। बिना पूर्व सूचना के जलापूर्ति बंद कर देना हजारों ग्रामीणों को संकट में धकेलने जैसा है।
कर्मचारियों ने बताया- वेतन नहीं मिला, प्लांट में ताला लगाकर चले गए
जोजोगुट्टू गांव के मुंडा कानू राम देवगम ने जब जलापूर्ति योजना के फिल्टर प्लांट में तैनात कर्मचारियों से संपर्क किया, तो उन्होंने चौंकाने वाली जानकारी दी।
कर्मचारियों के अनुसार ठेकेदार ने साफ कह दिया कि अब उनका काम समाप्त हो चुका है और आगे वेतन भी नहीं मिलेगा। इसके बाद दोनों कर्मचारियों ने फिल्टर प्लांट में ताला लगाया और अपने-अपने घर चले गए। इसके साथ ही पूरे पंचायत की पेयजल व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई।

10 करोड़ की योजना, लेकिन आधे गांवों तक नहीं पहुंचा पानी
मुखिया मुन्नी देवगम और मुंडा कानू राम देवगम का आरोप है कि करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से शुरू की गई इस जलापूर्ति योजना का उद्देश्य पंचायत के सभी 10 गांवों और उनके सभी टोलों तक शुद्ध पेयजल पहुंचाना था।
योजना के तहत हर घर तक पाइपलाइन बिछाकर नल कनेक्शन देने की बात कही गई थी। लेकिन धरातल पर तस्वीर बिल्कुल अलग है। पंचायत के दुबील, राजबेड़ा, बहदा, सोनापी, धर्मारगुट्टू, रोडुवा समेत कई गांवों और टोलों में आज तक पानी नहीं पहुंचा। अनेक घरों में नल तक नहीं लगाए गए।
ग्रामीणों का कहना है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद योजना अधूरी छोड़ दी गई और अब उसकी जिम्मेदारी पंचायत पर थोपने की तैयारी हो रही है।
भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप, विभाग और ठेकेदार पर सवाल
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि ठेकेदार और विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से योजना में भारी अनियमितता और भ्रष्टाचार हुआ है। उनका कहना है कि यदि पूरी राशि का सही उपयोग होता तो आज पंचायत का कोई भी गांव पानी के लिए नहीं तरसता।
ग्रामीणों का आरोप है कि योजना की बड़ी राशि का दुरुपयोग किया गया और अधूरे काम को पूरा दिखाकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की जा रही है।
अब पंचायत चलाएगी योजना? कई सवाल खड़े
ग्रामीणों के अनुसार ठेकेदार अब कह रहा है कि आगे इस जलापूर्ति योजना का संचालन पंचायत करेगी।
लेकिन पंचायत प्रतिनिधियों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
यदि योजना पंचायत को सौंपी जाती है तो फिल्टर प्लांट का लाखों रुपये का बिजली बिल कौन चुकाएगा? रखरखाव का खर्च कौन देगा? कर्मचारियों का वेतन कहां से आएगा? जब अधिकांश घरों तक पानी पहुंचा ही नहीं और नल कनेक्शन भी नहीं मिले, तब ग्रामीण जलकर क्यों देंगे?
इन सवालों का जवाब न तो विभाग के पास है और न ही ठेकेदार के पास।
मलेरिया प्रभावित इलाके में बढ़ा बड़ा खतरा
छोटानागरा पंचायत सारंडा के उन इलाकों में शामिल है जिन्हें मलेरिया का कोर जोन माना जाता है। यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में लोग मलेरिया की चपेट में आते हैं और कई ग्रामीणों की जान भी चली जाती है।
बारिश के मौसम में जब जलभराव और गंदगी पहले से ही बढ़ी हुई है, ऐसे समय में दूषित नदी-नाले का पानी पीने की मजबूरी ग्रामीणों के लिए दोहरी मार बन गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि असुरक्षित पेयजल और खराब स्वच्छता जलजनित बीमारियों के साथ-साथ संक्रामक रोगों के प्रसार का खतरा बढ़ाती है।
ग्रामीणों में बढ़ रहा आक्रोश
लगातार 13 दिनों से जलापूर्ति बंद रहने के कारण पंचायत के लोगों में भारी नाराजगी है। महिलाओं को रोजाना कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ रहा है, जबकि बच्चे और बुजुर्ग भी पीने के सुरक्षित पानी के लिए परेशान हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर योजना तो बना दी, लेकिन उसकी निगरानी नहीं की। यदि समय रहते गुणवत्ता की जांच होती तो आज ऐसी नौबत नहीं आती।
निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग
मुखिया मुन्नी देवगम, मुंडा कानू राम देवगम और ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। योजना में हुई कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी तय कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
साथ ही अधूरे कार्यों को तत्काल पूरा कर पंचायत के सभी गांवों और प्रत्येक घर तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि लोगों को दूषित पानी पीने के लिए मजबूर न होना पड़े।

जनता पूछ रही है जवाब
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब योजना पर लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च किए गए, तो आज हजारों ग्रामीण पानी के लिए क्यों भटक रहे हैं? यदि टेंडर समाप्त होना था तो वैकल्पिक व्यवस्था पहले क्यों नहीं की गई? बिना सूचना जलापूर्ति क्यों बंद कर दी गई? अधूरी योजना का संचालन पंचायत पर क्यों थोपा जा रहा है? और सबसे अहम—इस पूरे मामले में जवाबदेही किसकी तय होगी?
इन सवालों के जवाब का इंतजार सिर्फ छोटानागरा पंचायत ही नहीं, बल्कि पूरा सारंडा कर रहा है।














