“आबुआ हातु-आबुआ राज” का बिगुल
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
“आबुआ हातु-आबुआ राज, हमारा गांव-हमारा राज” के नारों के साथ मनोहरपुर प्रखंड अंतर्गत छोटानागरा पंचायत के दुबिल गांव में ग्राम सभा ने अब सीधी लड़ाई का ऐलान कर दिया है। सेल की चिड़िया लौह अयस्क खान प्रबंधन के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा खुलकर सामने आया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि उनकी जमीनों को खनन की धूल, लाल मिट्टी और पत्थरों ने बर्बाद कर दिया, लेकिन बदले में गांव को रोजगार, मुआवजा और मूलभूत सुविधाओं तक से वंचित रखा गया।
दुबिल ग्राम सभा ने महाप्रबंधक खान, सेल, चिड़िया माइंस को पत्र भेजकर 7 दिनों का अल्टीमेटम दिया है। चेतावनी दी गई है कि यदि तय समय सीमा के भीतर मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं हुई तो ग्रामीण चिड़िया दुबिल माइंस में अनिश्चितकालीन नाकेबंदी और उग्र आंदोलन शुरू करेंगे। इसकी पूरी जिम्मेदारी कंपनी प्रबंधन और प्रशासन की होगी।

“खनन से कंपनी मालामाल, ग्रामीण बदहाल”
ग्राम सभा द्वारा जारी पत्र में कहा गया है कि दुबिल गांव से महज दो किलोमीटर दूरी पर बी.एस.एल. सेल द्वारा वर्षों से लौह अयस्क खनन किया जा रहा है। लगातार खनन और भारी वाहनों की आवाजाही से गांव की कृषि भूमि पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। खेतों पर लाल मिट्टी, कंकड़ और पत्थरों की परत जम गई है, जिससे उपजाऊ जमीन बंजर बनती जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि जिस जमीन से कंपनी करोड़ों का मुनाफा कमा रही है, उसी गांव के लोग आज रोजगार और दो वक्त की रोटी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। गांव के युवा रोजगार नहीं मिलने के कारण दिल्ली, मुंबई और दूसरे राज्यों में पलायन कर रहे हैं।
“माइंस हमारे गांव में, नौकरी बाहरी लोगों को”
ग्राम सभा ने सबसे बड़ा आरोप यह लगाया कि दुबिल गांव माइंस प्रभावित क्षेत्र होने के बावजूद स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार नहीं दिया जा रहा है। ग्रामीणों ने मांग की है कि दुबिल गांव के 18 वर्ष से अधिक उम्र के कम से कम 200 युवक-युवतियों को बी.एस.एल. सेल, कंपनी सप्लाई, सी.एस.आर. और ठेकेदारों के माध्यम से स्थायी रोजगार दिया जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि स्थानीय युवाओं को नजरअंदाज कर बाहरी लोगों को रोजगार देना अन्याय है। गांव के लोग वर्षों से कंपनी के प्रदूषण और खनन के दुष्प्रभाव झेल रहे हैं, इसलिए रोजगार पर पहला अधिकार स्थानीय विस्थापितों और प्रभावितों का होना चाहिए।
“बंजर हुई जमीन का दो मुआवजा”
ग्राम सभा ने माइंस प्रभावित रैयती जमीन का उचित मुआवजा देने की मांग भी उठाई है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कई जगहों पर रैयती जमीन पर गलत तरीके से पिलर गाड़ दिए गए हैं। इसे तत्काल हटाने और प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की मांग की गई है।
ग्रामीणों का कहना है कि खेत बर्बाद होने से खेती पूरी तरह चौपट हो चुकी है। इससे गांव की आर्थिक रीढ़ टूट गई है। अब ग्रामीणों के सामने रोजगार और जीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
“सीएसआर सिर्फ कागजों में, गांव आज भी प्यासा”
दुबिल ग्राम सभा ने कंपनी की सीएसआर नीति पर भी सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि माइंस प्रभावित गांव होने के बावजूद दुबिल में पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।
ग्रामीणों ने गांव के 8 चापाकलों में सौर ऊर्जा आधारित जलमीनार लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि भीषण गर्मी में ग्रामीण पानी के लिए जूझ रहे हैं, लेकिन कंपनी अब तक सिर्फ आश्वासन देती रही है।
पहले भी दिया गया था अल्टीमेटम, नहीं हुई सुनवाई
ग्रामीणों ने बताया कि इससे पहले भी पत्रांक G.S.D-01/2026 के माध्यम से कंपनी प्रबंधन को 15 दिनों का अल्टीमेटम दिया गया था। बाद में पत्रांक G.S.D-02/2026 के तहत ग्रामीण प्रतिनिधिमंडल ने सामान्य वार्ता के लिए जीएम से मुलाकात भी की, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
ग्रामीणों का आरोप है कि बार-बार आवेदन और बातचीत के बावजूद कंपनी प्रबंधन ने उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया। इसी कारण अब ग्राम सभा ने निर्णायक आंदोलन की चेतावनी दी है।
“अबकी बार आर-पार की लड़ाई”
ग्राम सभा ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि कंपनी बिना सूचना दिए माइंस संचालन जारी रखती है और स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार देने पर विचार नहीं करती, तो दुबिल ग्राम सभा चिड़िया दुबिल माइंस में अनिश्चितकालीन नाकेबंदी करेगी।
ग्रामीणों ने कहा कि यह आंदोलन सिर्फ रोजगार का नहीं, बल्कि जल-जंगल-जमीन और अस्तित्व बचाने की लड़ाई है। “आबुआ हातु-आबुआ राज” के नारे के साथ ग्रामीण अब अपने अधिकारों के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।
ग्राम सभा में बड़ी संख्या में जुटे ग्रामीण
इस महत्वपूर्ण ग्राम सभा में मुंडा रामलाल चाम्पिया, दुलाल आईन्द, सुखराम चाम्पिया, सुनील हांसदा, इंद्रजीत चाम्पिया समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद थे। महिलाओं की ओर से सीता हांसदा, सलामी चाम्पिया, दीपा चाम्पिया, पिंकी आईन्द समेत अन्य ग्रामीण महिलाओं ने भी आंदोलन को समर्थन दिया।
ग्राम सभा ने एक स्वर में कहा कि यदि इस बार भी उनकी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो आंदोलन और अधिक उग्र होगा, जिसकी पूरी जवाबदेही कंपनी प्रबंधन और प्रशासन की होगी।














