खदान उत्पादन सात दिन से ठप, आंदोलन स्थल बना ‘बीमारी का मैदान’; स्वास्थ्य जांच में मिले मलेरिया मरीज, फिर भी पीछे हटने को तैयार नहीं ग्रामीण
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
ग्राम सभा दुबिल के बैनर तले “हातु-आबुआ राज, ग्राम स्वराज अभियान” के तहत सेल की मनोहरपुर ओर माइंस (चिड़िया-दुबिल माइंस) के खिलाफ छिड़ा जनआंदोलन बुधवार 2 जुलाई को सातवें दिन भी उग्र तेवर में जारी रहा। लगातार बारिश, भीषण गर्मी, जंगल का कठिन जीवन और बीमारी के खतरे के बावजूद आंदोलनकारी अपने मोर्चे से हटने को तैयार नहीं हैं। खदान का उत्पादन और लौह अयस्क की ढुलाई लगातार सातवें दिन भी पूरी तरह ठप रही, जिससे प्रबंधन पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
लेकिन अब यह संघर्ष सिर्फ जमीन और रोजगार की लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि बीमारी और जिंदगी से सीधी जंग में बदलता दिख रहा है।

आंदोलन स्थल बना बीमारी का अड्डा, कई ग्रामीण बीमार
जंगल में लगातार खुले आसमान के नीचे डटे रहने और रह-रह कर हो रही बारिश के कारण आंदोलनकारियों की तबीयत बिगड़ने लगी है। कई ग्रामीण मलेरिया, सर्दी, खांसी और बुखार से ग्रसित पाए गए हैं।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मनोहरपुर विधायक जगत माझी के निर्देश पर मनोहरपुर बीडीओ ने तत्काल स्वास्थ्य टीम को आंदोलन स्थल भेजा।

76 आंदोलनकारियों की जांच, तीन में मलेरिया की पुष्टि
मनोहरपुर सीएचसी से डॉक्टर चुड़ंग देव महंता के नेतृत्व में पहुंची मेडिकल टीम में कविता खलको, निशि मिंज (सीएचओ), गोवर्धन महतो (एमपीडब्ल्यू) शामिल थे। वहीं सेल चिड़िया अस्पताल की ओर से संध्या रानी दास, मीरा दास, कुमलेन कण्डुलना (एएनएम) और मोहन लाल चौबे भी पहुंचे।
घंटों तक चली स्वास्थ्य जांच में कुल 76 आंदोलनकारियों की जांच की गई। इनमें तीन मलेरिया से संक्रमित पाए गए, जबकि दर्जनों लोग मौसमी बीमारियों की चपेट में मिले। सभी को मौके पर दवाइयां दी गईं।
चिकित्सकों ने साफ कहा कि पूरा सारंडा क्षेत्र मलेरिया का कोर जोन है। अगर आंदोलन लंबा चला तो बीमारियों का खतरा और बढ़ सकता है।

वार्ता हुई थी, लेकिन समाधान नहीं निकला
गौरतलब है कि 29 जून को आंदोलन के चौथे दिन सेल प्रबंधन की ओर से सहायक महाप्रबंधक रवि रंजन और ठेका कंपनी के प्रतिनिधि आंदोलन स्थल पहुंचे थे। कई घंटे चली वार्ता में प्रबंधन ने साफ कह दिया था कि फिलहाल रोजगार देना संभव नहीं है।
प्रबंधन ने यह भी स्वीकार किया था कि वर्ष 2022 से अब तक किसी को रोजगार नहीं दिया गया है और आगे हैंड माइनिंग की भी कोई योजना नहीं है।
सीएसआर के तहत केवल पानी की समस्या सुलझाने का आश्वासन दिया गया, लेकिन रोजगार, मुआवजा और जमीन विवाद जैसे मूल सवालों पर प्रबंधन मौन रहा।
यही चुप्पी अब ग्रामीणों के गुस्से को और भड़का रही है।
“अब मांगें नहीं, अधिकार लेकर ही लौटेंगे”
ग्रामीणों ने साफ कहा है कि जब तक उनकी चारों मांगों पर लिखित और ठोस फैसला नहीं होगा, आंदोलन खत्म नहीं होगा।
उनका कहना है कि अब यह सिर्फ नौकरी की मांग नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य, सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई है।
महिलाएं और बुजुर्ग बने आंदोलन की रीढ़
आंदोलन में महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की भागीदारी ने इसे और मजबूत बना दिया है। प्लास्टिक तंबू के नीचे रहकर, जंगल में खाना बनाकर और बीमारी के बीच डटे रहना इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं।
चार मांगों पर कायम ग्रामसभा
ग्रामसभा ने फिर दोहराया—
• दुबिल गांव के 200 बेरोजगार युवाओं को खतियान आधारित प्राथमिकता के साथ रोजगार मिले।
• अधिग्रहित जमीन का उचित मुआवजा और प्रभावित परिवारों को नौकरी दी जाए।
• सरना, कब्रिस्तान और रैयती जमीन पर गाड़े गए अवैध पिलर हटाए जाएं।
• गांव में चार नए चापाकल और आठ जलमीनार लगाए जाएं।

दुबिल की पहाड़ियों से उठी हुंकार
ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों तक सिर्फ वादे हुए, लेकिन गांव को हक नहीं मिला। अब गांव ने फैसला कर लिया है कि खाली हाथ वापस नहीं लौटेंगे।
दुबिल की पहाड़ियों में गूंज रहे नारे अब सिर्फ आवाज नहीं, संघर्ष की शपथ बन चुके हैं—
“हातु-आबुआ राज, हमारा गांव हमारा राज!”
और यह हुंकार अब सेल प्रबंधन और प्रशासन दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।














