जयराम महतो बनाम पुलिस की लड़ाई अब व्यक्तिगत विवाद नहीं—कानून, सत्ता, राजनीतिक मर्यादा और जनआक्रोश की बड़ी परीक्षा
एक तरफ पुलिस एसोसिएशन का अल्टीमेटम, दूसरी तरफ जयराम का पलटवार—अब किसके आगे झुकेगी सरकार?
रिपोर्ट शैलेश सिंह
धनबाद के बरवाअड्डा थाना प्रभारी और डुमरी विधायक जयराम महतो के बीच कथित गाली-गलौज और अभद्र भाषा के इस्तेमाल से शुरू हुआ विवाद अब झारखंड की राजनीति के सबसे गर्म मुद्दों में बदलता दिखाई दे रहा है। मामला केवल एक थाना प्रभारी और एक विधायक के बीच हुए विवाद का नहीं रह गया है। इसके पीछे पुलिस की कार्यशैली, आम नागरिकों के साथ व्यवहार, कथित अवैध वसूली, बालू-कोयला कारोबार, राजनीतिक संरक्षण, जनप्रतिनिधियों की मर्यादा और सरकार की कानून-व्यवस्था पर पकड़ जैसे कई गंभीर सवाल एक साथ खड़े हो गए हैं।
एक तरफ झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन विधायक से माफी, उसके खिलाफ कार्रवाई और गिरफ्तारी की मांग को लेकर मुखर है। दूसरी ओर जयराम महतो इसे पुलिस की कथित मनमानी और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का रूप देने में जुटे हैं। इसी बीच विपक्षी राजनीति भी सक्रिय हो चुकी है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि सरकार पुलिस के दबाव में कार्रवाई करती है तो क्या जयराम के समर्थक सड़कों पर उतरेंगे? और यदि सरकार पुलिस एसोसिएशन की मांग को नजरअंदाज करती है तो क्या पुलिस महकमे में असंतोष और बढ़ेगा?
गाली किसने दी, इसकी जांच हो—लेकिन कानून की गाली न बने
लोकतंत्र में सबसे पहले मर्यादा आती है।
यदि विधायक जयराम महतो ने थाना प्रभारी को गाली दी है तो यह किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। विधायक जनता का प्रतिनिधि होता है। उसके शब्दों में राजनीतिक वजन होता है। उसे पुलिस अधिकारी से असहमति जताने, सवाल पूछने और कार्रवाई की मांग करने का पूरा अधिकार है, लेकिन अपशब्द बोलने का अधिकार नहीं।
लेकिन यही कसौटी पुलिस पर भी लागू होनी चाहिए।
यदि थाना प्रभारी या किसी पुलिसकर्मी ने विधायक अथवा आम नागरिक के साथ गाली-गलौज, धमकी या अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया है तो पुलिस की वर्दी भी उसे संरक्षण नहीं दे सकती।
विधायक कानून से ऊपर नहीं और पुलिस भी कानून से ऊपर नहीं।
यही इस विवाद की सबसे बड़ी सच्चाई है।

आम आदमी थाने पहुंचे तो क्या उसे सम्मान मिलेगा?
यह सवाल जयराम महतो के विवाद से कहीं बड़ा है।
झारखंड के गांवों और कस्बों में आम आदमी के लिए थाना आज भी न्याय की पहली उम्मीद है। लेकिन यदि उसी थाने में शिकायत लेकर पहुंचने वाला व्यक्ति अपमानित हो, गाली सुने, धमकी महसूस करे या उसे यह लगे कि प्रभावशाली लोगों के लिए अलग कानून और सामान्य नागरिक के लिए अलग कानून है, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होती है।
पुलिस के पास कानून लागू करने की शक्ति है, लेकिन यह शक्ति नागरिकों को अपमानित करने का लाइसेंस नहीं है।
अगर पुलिसकर्मी गलत करता है तो उसके खिलाफ शिकायत, जांच और कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए।
वर्दी सम्मान की हकदार है, लेकिन वर्दी जवाबदेही से मुक्त नहीं है।
बालू, कोयला और खनिज की चोरी पर भी हो खुली जांच
झारखंड की राजनीति में बालू और कोयले का कारोबार नया मुद्दा नहीं है। खनिज संपदा से भरपूर राज्य में अवैध खनन और अवैध परिवहन को लेकर समय-समय पर पुलिस, प्रशासन, कारोबारी और राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगते रहे हैं।
यदि जयराम महतो या कोई अन्य जनप्रतिनिधि पुलिस पर बालू, कोयला अथवा अन्य खनिजों की चोरी करवाने या संरक्षण देने जैसे आरोप लगाता है तो सरकार को इसे केवल राजनीतिक बयान मानकर खारिज नहीं करना चाहिए।
जांच कराइए।
जहां से माल निकलता है, वहां से लेकर परिवहन, भंडारण और बिक्री तक पूरी कड़ी की जांच होनी चाहिए। यदि किसी पुलिसकर्मी की संलिप्तता प्रमाणित होती है तो कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोप झूठे निकलते हैं तो आरोप लगाने वाले से भी जवाब मांगा जाना चाहिए।
कानून का यही संतुलन लोकतंत्र को मजबूत करता है।

जयराम महतो के लिए यह विवाद राजनीतिक ऑक्सीजन भी बन सकता है
जयराम महतो की राजनीति का सबसे बड़ा आधार युवा और छात्र वर्ग है। उनकी राजनीति में स्थानीय अधिकार, रोजगार, भाषा और युवाओं से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे हैं।
ऐसे में पुलिस से सीधा टकराव उनके समर्थकों के बीच एक अलग तरह का राजनीतिक संदेश पैदा कर सकता है।
यदि जयराम यह नैरेटिव बनाने में सफल होते हैं कि “सत्ता और पुलिस की ताकत एक तरफ है और आम युवा दूसरी तरफ”, तो यह विवाद उनके लिए नुकसान के बजाय राजनीतिक विस्तार का अवसर बन सकता है।
यही वजह है कि सरकार के लिए यह मामला बेहद संवेदनशील है।
गिरफ्तारी हुई तो सड़क पर उतर सकता है छात्र-युवा आक्रोश!
सबसे बड़ा राजनीतिक बारूद यहीं छिपा है।
यदि जयराम महतो की गिरफ्तारी होती है और उनके समर्थकों के बीच यह धारणा बनती है कि कार्रवाई राजनीतिक दबाव में हुई है, तो छात्र और युवा संगठनों का आक्रोश सड़क पर उतर सकता है।
मुख्यमंत्री आवास के घेराव से लेकर जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन, धरना, पुतला दहन, सड़क जाम और राज्यव्यापी आंदोलन तक की परिस्थितियां बन सकती हैं।
हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि गिरफ्तारी के बाद निश्चित रूप से राज्यव्यापी आंदोलन होगा, लेकिन जयराम के राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए सरकार इस संभावना को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
एक गिरफ्तारी कभी-कभी एक नेता को आरोपी से आंदोलन का चेहरा बना देती है।
लेकिन आंदोलन हिंसक हुआ तो कहानी पलट जाएगी
जयराम समर्थकों के सामने भी बड़ी चुनौती होगी।
यदि विरोध शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक रहता है तो राजनीतिक समर्थन बढ़ सकता है। लेकिन यदि प्रदर्शन हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी या पुलिस से टकराव में बदलता है तो सरकार को कानून-व्यवस्था के नाम पर सख्ती करने का आधार मिल जाएगा।
यानी जयराम के लिए भी यह दोधारी तलवार है।
सड़क पर भीड़ जुटाना आसान है, लेकिन भीड़ को कानून की सीमा में रखना राजनीतिक नेतृत्व की असली परीक्षा है।

पुलिस एसोसिएशन का आंदोलन—सरकार के लिए दूसरी बड़ी चुनौती
दूसरी तरफ पुलिस मेंस एसोसिएशन का रुख भी सरकार के लिए कम गंभीर नहीं है।
यदि पुलिसकर्मी अपने ही राज्य के निर्वाचित विधायक की गिरफ्तारी की मांग को लेकर आंदोलन पर उतरते हैं तो यह अभूतपूर्व राजनीतिक और प्रशासनिक स्थिति पैदा कर सकता है।
पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। यदि पुलिस संगठन ही आंदोलनकारी भूमिका में आ जाए तो कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठेंगे।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि पुलिसकर्मियों की शिकायतों का समाधान संस्थागत तरीके से हो और पुलिस बल की अनुशासनात्मक संरचना भी कमजोर न पड़े।
हेमंत सोरेन सरकार के सामने तीन रास्ते
हेमंत सोरेन सरकार के सामने मोटे तौर पर तीन रास्ते हैं।
पहला—पुलिस के दबाव में कठोर कार्रवाई।
इससे पुलिस एसोसिएशन शांत हो सकता है, लेकिन जयराम समर्थकों में राजनीतिक आक्रोश बढ़ने की संभावना रहेगी।
दूसरा—जयराम को राहत देकर मामला शांत करना।
इससे पुलिस संगठन के भीतर नाराजगी बढ़ सकती है और सरकार पर पुलिस के साथ भेदभाव का आरोप लग सकता है।
तीसरा—निष्पक्ष जांच और उसके आधार पर कार्रवाई।
राजनीतिक रूप से यही सबसे सुरक्षित और लोकतांत्रिक रास्ता दिखाई देता है।
ऑडियो-वीडियो या अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की तकनीकी जांच हो। दोनों पक्षों के बयान लिए जाएं। घटना का पूरा क्रम सामने आए। इसके बाद कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
न विधायक के दबाव में, न पुलिस के दबाव में।
विपक्ष के हाथ लगा बड़ा मुद्दा
भाजपा और एनडीए के लिए यह सरकार को घेरने का बड़ा अवसर है।
कानून-व्यवस्था, पुलिस की कार्यशैली, अवैध खनन, राजनीतिक हस्तक्षेप और जनप्रतिनिधियों के सम्मान जैसे मुद्दों को एक साथ उठाकर विपक्ष सरकार पर दबाव बना सकता है।
लेकिन विपक्ष के सामने भी चुनौती है।
यदि वह केवल जयराम के समर्थन में खड़ा दिखाई देता है तो सत्ता पक्ष इसे राजनीतिक अवसरवाद बता सकता है। यदि वह पुलिस की हर कार्रवाई का समर्थन करता है तो युवा वर्ग के बीच उसका संदेश कमजोर पड़ सकता है।
इसलिए विपक्ष के लिए सबसे प्रभावी लाइन होगी—“दोषी जो भी हो, निष्पक्ष जांच हो और कानून सब पर समान रूप से लागू हो।”
झामुमो के सामने भी आसान नहीं है रास्ता
सत्ता पक्ष के लिए जयराम महतो को केवल विपक्षी नेता की तरह देखना राजनीतिक भूल हो सकती है।
जयराम का प्रभाव खासकर युवा और छात्र राजनीति के बीच है। यदि विवाद लंबा खिंचता है तो यह सत्ता के खिलाफ व्यापक युवा असंतोष का रूप ले सकता है।
झामुमो को यह तय करना होगा कि वह जयराम के खिलाफ राजनीतिक हमला करे या पूरे मामले को कानूनी प्रक्रिया पर छोड़ दे।
क्योंकि राजनीतिक बयानबाजी जितनी बढ़ेगी, जयराम को उतना ही बड़ा मंच मिल सकता है।
अब झारखंड पूछ रहा है—किसकी चलेगी?
यह विवाद आखिरकार एक मूल प्रश्न पर आकर टिकता है—
क्या झारखंड में कानून चलेगा या दबाव?
* क्या विधायक पुलिस को गाली देकर निकल जाएगा?
* क्या पुलिस आम आदमी को गाली देकर बच जाएगी?
* क्या बालू-कोयले की चोरी के आरोप केवल राजनीतिक भाषणों में रहेंगे?
* क्या पुलिस और राजनेताओं के बीच सत्ता की लड़ाई में आम नागरिक फिर किनारे खड़ा रहेगा?
इन सवालों का जवाब सरकार को देना होगा।

पांच बड़े सवाल, जिनसे भाग नहीं सकती सरकार
पहला— बरवाअड्डा की पूरी घटना की निष्पक्ष और तकनीकी जांच कब होगी?
दूसरा— यदि विधायक ने गाली दी है तो क्या कानून के अनुसार कार्रवाई होगी?
तीसरा— यदि पुलिस अधिकारी ने अभद्रता की है तो क्या उसके खिलाफ भी कार्रवाई होगी?
चौथा— बालू, कोयला और अन्य खनिजों के अवैध कारोबार में पुलिस संरक्षण के आरोपों की स्वतंत्र जांच होगी या नहीं?
पांचवां— यदि जयराम की गिरफ्तारी होती है और राज्य में छात्र-युवा आंदोलन भड़कता है तो सरकार की रणनीति क्या होगी?
अब लड़ाई सिर्फ बरवाअड्डा की नहीं
बरवाअड्डा की घटना ने झारखंड की राजनीति के उस संवेदनशील हिस्से को छू दिया है जहां पुलिस, राजनीति, खनिज कारोबार और युवा आक्रोश एक-दूसरे से टकराते हैं।
एक तरफ पुलिस अपनी प्रतिष्ठा और अनुशासन की लड़ाई लड़ रही है। दूसरी तरफ जयराम महतो अपने राजनीतिक अस्तित्व और समर्थकों के बीच अपनी छवि की लड़ाई लड़ रहे हैं। सत्ता इस आग को नियंत्रित करना चाहती है और विपक्ष इसे राजनीतिक मुद्दे में बदलने की कोशिश कर रहा है।
लेकिन इस पूरी लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण किरदार आम नागरिक है।
उसे न पुलिस की गाली चाहिए, न विधायक की गाली।
उसे चाहिए—सम्मान, सुरक्षा और निष्पक्ष कानून।
झारखंड की जनता यह भी देख रही है कि सत्ता किसके सामने झुकती है और कानून किस पर लागू होता है।
क्योंकि लोकतंत्र में असली ताकत न वर्दी की होती है, न विधायक की कुर्सी की—असली ताकत संविधान और जनता की होती है।
और यदि सरकार ने इस विवाद को निष्पक्ष तरीके से नहीं संभाला तो बरवाअड्डा की एक घटना आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति के लिए ऐसी चिंगारी बन सकती है, जिसकी आग थाना, विधानसभा और मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच सकती है।














