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रांजाबुरु खदान में ग्रामीणों का महाजाम! स्क्रीनिंग मशीन घेरकर ठप कराया उत्पादन, अनिश्चितकालीन आंदोलन शुरू

On: August 10, 2026 11:31 AM
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10 अगस्त की सुबह से सारंडा विकास समिति का आर-पार का आंदोलन, सैकड़ों ग्रामीण पारंपरिक हथियारों के साथ पहुंचे खदान

75% स्थानीय रोजगार समेत पूर्व लिखित समझौता लागू कराने की मांग, मांग पूरी होने तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान

रिपोर्ट: शैलेश सिंह

गुवा। स्थानीय रोजगार और पूर्व में हुए लिखित समझौते को लागू कराने की मांग को लेकर सारंडा एक बार फिर आंदोलन की आग में तपने लगा है। सारंडा विकास समिति, जामकुंडिया-दुईया के बैनर तले सारंडा के विभिन्न गांवों के मुंडा, ग्रामीण और बेरोजगार युवाओं ने 10 अगस्त की सुबह से सेल, गुवा खदान में अनिश्चितकालीन आंदोलन सह चक्का जाम शुरू कर दिया।

आंदोलन का नेतृत्व मानकी लागुड़ा देवगम और गंगदा पंचायत के मुखिया राजू सांडिल कर रहे हैं। आंदोलनकारी सैकड़ों की संख्या में पारंपरिक हथियारों के साथ रांजाबुरु खदान क्षेत्र में पहुंचे और स्क्रीनिंग मशीन सहित खदान के विभिन्न संचालन क्षेत्रों को घेरकर जाम कर दिया। आंदोलन के कारण रांजाबुरु खदान से उत्पादन और लौह अयस्क की माल ढुलाई प्रभावित हुई है।

खदान के गेट से स्क्रीनिंग प्लांट तक आंदोलनकारियों का पहरा

ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है कि इस बार आंदोलन केवल धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा। आंदोलनकारियों ने खदान के संचालन को रोकते हुए उत्पादन और डिस्पैच व्यवस्था को ठप कर दिया है।

ग्रामीणों का कहना है कि जब तक पूर्व में हुए लिखित समझौते को जमीन पर पूरी तरह लागू नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन वापस नहीं लिया जाएगा।

“अब समझौता नहीं, सीधी कार्रवाई होगी”

गंगदा पंचायत के मुखिया राजू सांडिल ने आंदोलन स्थल से कड़े तेवर में कहा कि स्थानीय लोगों के धैर्य की सीमा अब समाप्त हो चुकी है।

उन्होंने कहा कि दो-दो बार आंदोलन और खदान बंदी के बावजूद यदि सेल प्रबंधन और ठेका कंपनी ने पूर्व समझौते को लागू नहीं किया, तो इस बार आंदोलन निर्णायक होगा।

राजू सांडिल ने कहा कि स्थानीय लोगों की जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर खनन का असर पड़ता है, लेकिन रोजगार के मामले में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता नहीं मिल रही है। इसी वजह से ग्रामीणों में लगातार आक्रोश बढ़ रहा है।

दो बार खदान बंद हुई, फिर भी नहीं बदली तस्वीर

ग्रामीणों के अनुसार स्थानीय रोजगार को लेकर इससे पहले भी रांजाबुरु खदान में आंदोलन हो चुका है। आंदोलन के दौरान खदान का संचालन कई दिनों तक प्रभावित रहा था।

बाद में मंत्री दीपक बिरुवा, प्रशासन, सेल प्रबंधन और ग्रामीण प्रतिनिधियों के बीच त्रिपक्षीय वार्ता हुई थी। ग्रामीणों का दावा है कि उस बैठक में स्थानीय रोजगार सहित कई मांगों पर लिखित सहमति बनी थी।

लेकिन आंदोलनकारियों का आरोप है कि समझौते के बावजूद जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव नहीं हुआ।

75 प्रतिशत स्थानीय रोजगार बना सबसे बड़ा मुद्दा

ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व समझौते में खदान प्रभावित गांवों के युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने तथा 75 प्रतिशत स्थानीय रोजगार सुनिश्चित करने की बात तय हुई थी।

आंदोलनकारियों के अनुसार समझौते में मुख्य रूप से ये बिंदु शामिल थे—

  • खदान प्रभावित 18 गांवों के युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता।
  • 75 प्रतिशत रोजगार स्थानीय लोगों को देने की पहल।
  • प्रत्येक प्रभावित गांव के बेरोजगार युवाओं को रोजगार से जोड़ने का प्रयास।
  • जल छिड़काव सहित विभिन्न कार्य स्थानीय समिति को देना।
  • रैक लोडिंग और ट्रांसपोर्टिंग में स्थानीय भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • प्रदूषण नियंत्रण और कारो नदी की सुरक्षा के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करना।

ग्रामीणों का आरोप है कि इन बिंदुओं को अब तक पूरी तरह लागू नहीं किया गया।

मां सरला कंपनी पर बाहरी लोगों को बहाली का आरोप

आंदोलनकारियों ने ठेका कंपनी मां सरला पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि ड्राइवर, खलासी, झंडा दिखाने वाले कर्मियों सहित अन्य कार्यों में बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि खदान प्रभावित गांवों के स्थानीय युवा रोजगार के लिए भटक रहे हैं।

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

दीपक बिरुवा की मौजूदगी में हुआ था समझौता

ग्रामीणों ने कहा कि पूर्व आंदोलन के दौरान मंत्री दीपक बिरुवा स्वयं आंदोलन स्थल पर पहुंचे थे। उनकी मौजूदगी में सेल के अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों और ग्रामीण प्रतिनिधियों के बीच वार्ता हुई थी।

आंदोलनकारियों का दावा है कि उसी वार्ता में स्थानीय रोजगार और क्षेत्रीय विकास से जुड़े कई मुद्दों पर लिखित सहमति बनी थी। अब ग्रामीण उसी समझौते को लागू कराने के लिए फिर से खदान के सामने खड़े हैं।

“धूल-प्रदूषण हम झेलें और रोजगार भी बाहरी लोगों को मिले?”

मुखिया राजू सांडिल ने कहा कि खनन गतिविधियों से होने वाले धूल और प्रदूषण का असर सबसे पहले आसपास के ग्रामीणों को झेलना पड़ता है। इसके बावजूद रोजगार में स्थानीय युवाओं को अपेक्षित अवसर नहीं मिलने से लोगों में भारी नाराजगी है।

उन्होंने कहा कि यह आंदोलन केवल नौकरी पाने की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय अधिकार, सम्मान और रोजगार के सवाल से जुड़ा हुआ है।

मंटू मिश्रा के आंदोलन स्थल पर आने की मांग

राजू सांडिल ने कहा कि जब तक मां सरला ठेका कंपनी के मालिक मंटू मिश्रा आंदोलन स्थल पर आकर ग्रामीणों की सभी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लेते, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल आश्वासन से अब आंदोलन समाप्त नहीं होगा। ग्रामीण लिखित समझौते के अनुरूप जमीन पर कार्रवाई चाहते हैं।

खदान बंदी से बढ़ी प्रबंधन की चुनौती

रांजाबुरु खदान में उत्पादन और माल ढुलाई प्रभावित होने से सेल प्रबंधन के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। आंदोलनकारियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस समाधान नहीं निकलता, तब तक उत्पादन, लौह अयस्क डिस्पैच और ट्रांसपोर्टिंग को अनिश्चितकाल के लिए बंद रखा जाएगा।

आंदोलन स्थल पर जुटे ग्रामीण और जनप्रतिनिधि

आंदोलन में मानकी लागुड़ा देवगम, मुखिया राजू सांडिल, मुंडा बुधराम सिद्धू, मुंडा राजेश टोपनो, मुंडा जानुम सिंह चेरोवा, झामुमो नेता बृंदावन गोप, प्रीतम गोच्छाईत, राजू गोप, श्रीधर गोप सहित विभिन्न गांवों के मुंडा, ग्रामीण और बेरोजगार युवा शामिल हुए।

अब निगाहें प्रबंधन की अगली पहल पर

रांजाबुरु खदान में शुरू हुआ यह आंदोलन आने वाले दिनों में कितना लंबा चलेगा, यह अब सेल प्रबंधन और ग्रामीण प्रतिनिधियों के बीच होने वाली बातचीत पर निर्भर करेगा। फिलहाल ग्रामीणों ने अपने तेवर साफ कर दिए हैं—लिखित समझौते का पूर्ण क्रियान्वयन नहीं हुआ तो खदान बंदी जारी रहेगी।

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