यूनियन का दावा— श्रम कानून में संशोधन के बिना खदानों में बायोमेट्रिक लागू नहीं किया जा सकता
प्रबंधन की ओर से अधिकारी अनुपस्थित, अगली सुनवाई में जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत करने का निर्देश
रिपोर्ट शैलेश सिंह
किरीबुरू। सेल की खदानों में प्रस्तावित बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को लेकर 6 अगस्त 2026 को केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण (CGIT) में महत्वपूर्ण सुनवाई संपन्न हुई। सुनवाई के दौरान झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ, किरीबुरू ने अपने पक्ष में 12 प्रकार के दस्तावेजी साक्ष्य (Evidence), प्रमाण एवं कानूनी आधार न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। यूनियन का दावा है कि वर्तमान श्रम कानूनों में आवश्यक संशोधन किए बिना खदानों में बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू नहीं की जा सकती।
यूनियन के अनुसार, उसने न्यायालय के समक्ष ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं, जो यह साबित करते हैं कि बिना विधिक प्रक्रिया अपनाए बायोमेट्रिक प्रणाली लागू करना श्रम कानूनों के अनुरूप नहीं है। साथ ही यूनियन ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर बहस (Arguments) के दौरान और भी दस्तावेज एवं साक्ष्य न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे।
प्रबंधन की ओर से कोई अधिकारी नहीं पहुंचा
सुनवाई के दौरान सेल प्रबंधन की ओर से कोई भी अधिकारी न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ। हालांकि प्रबंधन के अधिवक्ता ने यूनियन द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों को प्राप्त किया।
यूनियन का कहना है कि प्रबंधन यह स्पष्ट करने में असफल रहा कि वह किस कानूनी प्रावधान के तहत बिना संशोधन किए बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू करना चाहता है। न्यायालय ने प्रबंधन को अगली सुनवाई में अपना पक्ष एवं संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
यूनियन का आरोप— जानबूझकर मामले में हो रही देरी
झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ ने आरोप लगाया कि सेल प्रबंधन जानबूझकर मामले को लंबित रखने की रणनीति अपना रहा है। यूनियन का कहना है कि एक ओर मामला न्यायालय में विचाराधीन है, वहीं दूसरी ओर समय-समय पर सर्कुलर जारी कर बायोमेट्रिक प्रणाली को लागू करने का प्रयास किया जा रहा है।
यूनियन ने यह भी आरोप लगाया कि उसने इस संबंध में जो शिकायत (Complaint Case) दायर की है, उसका भी प्रबंधन की ओर से अब तक कोई जवाब न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया है। न्यायालय ने इस मामले में भी अगली तिथि पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

हाई कोर्ट जाने की चर्चा
यूनियन के अनुसार, सुनवाई के बाद न्यायालय परिसर के बाहर प्रबंधन पक्ष के अधिवक्ता ने बताया कि सेल प्रबंधन इस मामले में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहा है।
इस पर यूनियन के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे ने कहा कि उच्च न्यायालय जाना प्रबंधन का संवैधानिक अधिकार है और यूनियन उसका सम्मान करती है। उन्होंने कहा कि यदि प्रबंधन रिट याचिका दायर करता है, तब भी जब तक उच्च न्यायालय की ओर से CGIT की कार्यवाही पर स्थगन (Stay) नहीं दिया जाता, तब तक केंद्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण में सुनवाई जारी रहेगी।
उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय भी यह देखेगा कि CGIT में मामले की क्या स्थिति है। यदि न्यायाधिकरण का अंतिम निर्णय नहीं आया होगा, तो न्यायालय अपने विवेक से आगे की कार्रवाई करेगा।

दोनों अदालतों में लड़ाई के लिए तैयार यूनियन
केंद्रीय अध्यक्ष रमा पाण्डे ने कहा कि झारखंड मज़दूर संघर्ष संघ CGIT और आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय— दोनों स्तरों पर कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने यूनियन के पदाधिकारियों को हाई कोर्ट की संभावित सुनवाई को देखते हुए सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार रखने का निर्देश दिया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सेल प्रबंधन वास्तव में इस विवाद का समाधान चाहता, तो त्रिपक्षीय समझौते (Tripartite Settlement) के अनुरूप आवश्यक संशोधन कर बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू कर चुका होता। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, जिससे कर्मचारियों में आशंका और असंतोष बना हुआ है।
‘कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए लड़ाई जारी रहेगी’
यूनियन का दावा है कि प्रस्तावित बायोमेट्रिक व्यवस्था में कई ऐसी खामियां हैं, जिनसे कर्मचारियों को आर्थिक एवं मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है। यूनियन का कहना है कि उसने इन बिंदुओं को पहचानकर न्यायालय के समक्ष रखा है और अब कर्मचारी भी पूरे मामले को समझ चुके हैं।
यूनियन ने कहा कि अब सभी की निगाहें CGIT के आगामी निर्णय पर टिकी हैं और कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई आगे भी जारी रहेगी।














