चार सूत्री मांगों पर अड़े ग्रामीण, उत्पादन और लौह अयस्क ढुलाई आठवें दिन भी ठप; “हक लिए बिना नहीं हटेंगे”
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
ग्राम सभा दुबिल के बैनर तले चल रहा “हातु-आबुआ राज, ग्राम स्वराज अभियान” अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। सेल की मनोहरपुर ओर माइंस (चिड़िया-दुबिल माइंस) के खिलाफ शुरू हुआ यह जनआंदोलन शुक्रवार 3 जुलाई को आठवें दिन भी पूरी मजबूती के साथ जारी रहा। लगातार बारिश, कठिन परिस्थितियों और जंगल के बीच डटे रहने के बावजूद आंदोलनकारी ग्रामीण पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
आंदोलन का सीधा असर खदान के उत्पादन और लौह अयस्क की ढुलाई पर पड़ा है, जो लगातार आठवें दिन भी पूरी तरह ठप रही। इससे प्रबंधन की चिंता बढ़ती जा रही है, लेकिन अब तक कोई समाधान निकलता नहीं दिख रहा।

शाम में पहुंचे दो डीजीएम, वार्ता फिर बेनतीजा
शुक्रवार शाम करीब 4:30 बजे चिड़िया खदान के उप महाप्रबंधक एस.एस. राव और रतन पात्री आंदोलन स्थल पहुंचे और आंदोलनकारियों से वार्ता की कोशिश की। ग्रामीणों के अनुसार, वार्ता केवल पेयजल संकट और उसके समाधान तक सीमित रही।
ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी सबसे अहम मांग—स्थानीय बेरोजगार युवाओं को रोजगार और खदान संचालन से लाल मिट्टी व मुरूम की वजह से बंजर हुई रैयती जमीन का मुआवजा—पर अधिकारियों ने कोई स्पष्ट बात नहीं की।
इससे नाराज आंदोलनकारियों ने साफ कहा कि केवल पानी की बात से आंदोलन खत्म नहीं होगा।
चौथे दिन भी हुई थी वार्ता, तब भी नहीं निकला हल
इससे पहले 29 जून को आंदोलन के चौथे दिन भी सेल प्रबंधन की ओर से सहायक महाप्रबंधक रवि रंजन, अन्य अधिकारी और ठेका कंपनी के प्रतिनिधि आंदोलन स्थल पहुंचे थे। कई घंटों तक चली उस बातचीत में भी कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकला था।
उस दौरान प्रबंधन ने साफ शब्दों में कहा था कि फिलहाल रोजगार देना संभव नहीं है। अधिकारियों ने यह भी बताया था कि वर्ष 2022 से अब तक किसी को रोजगार नहीं दिया गया है और आगे हैंड माइनिंग की भी कोई योजना नहीं है।
प्रबंधन की ओर से सिर्फ सीएसआर के तहत पानी की समस्या हल करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन रोजगार, मुआवजा और जमीन विवाद जैसे मूल मुद्दों पर चुप्पी बनी रही।
यही वजह है कि आंदोलनकारियों का गुस्सा और अविश्वास लगातार बढ़ता जा रहा है।
“अब लड़ाई नौकरी की नहीं, अस्तित्व की है”
ग्रामीणों ने दो टूक कहा है कि यह लड़ाई सिर्फ नौकरी की नहीं, बल्कि जमीन, सम्मान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि वर्षों से सिर्फ आश्वासन मिलता रहा, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं हुआ। अब गांव ने तय कर लिया है कि जब तक अधिकार नहीं मिलेगा, तब तक आंदोलन खत्म नहीं होगा।
एक आंदोलनकारी ने कहा—
“अब भरोसे की राजनीति नहीं चलेगी। अब हमें हमारा हक चाहिए।”
महिलाएं, बुजुर्ग और युवा बने आंदोलन की ताकत
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत गांव के हर वर्ग की भागीदारी है। महिलाएं, बुजुर्ग और युवा बड़ी संख्या में आंदोलन स्थल पर डटे हुए हैं।
बारिश के बीच प्लास्टिक के अस्थायी तंबुओं में रहकर, जंगल में चूल्हा जलाकर खाना बनाकर और खुले आसमान के नीचे रात गुजारते हुए भी ग्रामीणों का मनोबल कमजोर नहीं पड़ा है।
यह अब किसी एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे गांव की सामूहिक लड़ाई बन चुकी है।
ग्रामसभा की चार मांगें जस की तस
ग्रामसभा ने अपनी चार सूत्री मांगों को एक बार फिर स्पष्ट किया है—
पहली मांग:
दुबिल गांव के 200 बेरोजगार युवाओं को खतियान आधारित प्राथमिकता के साथ रोजगार दिया जाए।
दूसरी मांग:
अधिग्रहित जमीन का उचित मुआवजा दिया जाए और प्रभावित परिवारों को नौकरी मिले।
तीसरी मांग:
सरना स्थल, कब्रिस्तान और रैयती जमीन पर लगाए गए कथित अवैध पिलर हटाए जाएं।
चौथी मांग:
गांव में चार नए चापाकल और आठ जलमीनार लगाए जाएं ताकि पेयजल संकट दूर हो सके।

“हातु-आबुआ राज” के नारों से गूंज रहा जंगल
दुबिल की पहाड़ियों में लगातार गूंज रहे नारे अब इस आंदोलन की पहचान बन चुके हैं—
“हातु-आबुआ राज, हमारा गांव हमारा राज!”
यह नारा अब सिर्फ आवाज नहीं, बल्कि ग्रामीण अस्मिता, अधिकार और स्वशासन की मांग का प्रतीक बन गया है।
सेल प्रबंधन और प्रशासन के लिए बढ़ी चुनौती
आठ दिनों से उत्पादन बंद रहना और लौह अयस्क की ढुलाई ठप होना सेल प्रबंधन के लिए आर्थिक और प्रशासनिक दबाव बढ़ा रहा है। वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों का बढ़ता जनसमर्थन प्रशासन के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या प्रबंधन चार सूत्री मांगों पर कोई ठोस फैसला लेता है या यह आंदोलन और उग्र रूप लेगा।
फिलहाल दुबिल की धरती पर संघर्ष जारी है और ग्रामीणों का संदेश साफ है—
“हक लिए बिना नहीं हटेंगे।”













