मेघाहातुबुरु खदान में स्ट्राइक, उत्पादन पूरी तरह ठप
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
आखिरकार वर्षों से धूल, प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे सेल, मेघाहातुबुरु खदान के श्रमिकों का धैर्य जवाब दे गया। 3 जून की अहले सुबह लगभग 6 बजे पहली पाली के सेल कर्मियों और ठेका श्रमिकों ने खदान गेट के अंदर ही जोरदार स्ट्राइक शुरू कर दी। देखते ही देखते स्क्रीनिंग, क्रशिंग और लोडिंग विभाग का पूरा कामकाज ठप हो गया तथा लौह अयस्क उत्पादन पर पूरी तरह ब्रेक लग गया।
श्रमिकों का कहना है कि जब तक उनकी स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी मांगों पर ठोस एवं स्थायी समाधान नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

लौह चूर्ण बन रहा श्रमिकों का ‘साइलेंट किलर’
खदान में कार्यरत श्रमिकों का आरोप है कि गर्मी के मौसम में लौह अयस्क की धूल और लौह चूर्ण इतनी मात्रा में उड़ता है कि काम करना मुश्किल हो जाता है। यह धूल आंख, नाक और मुंह के रास्ते शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों सहित अन्य अंगों को प्रभावित कर रही है।
श्रमिकों का कहना है कि कई बार प्रबंधन को नियमित पानी छिड़काव की मांग की गई, लेकिन हर बार सिर्फ खानापूर्ति की गई। जब विरोध होता है तो एक-दो दिन पानी का छिड़काव कर दिया जाता है और फिर स्थिति जस की तस हो जाती है।
मुनाफे की चिंता ज्यादा, मजदूरों की सेहत की कम?
श्रमिकों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये का उत्पादन करने वाली खदान में श्रमिकों के स्वास्थ्य को आखिर प्राथमिकता क्यों नहीं दी जा रही है?
श्रमिकों का आरोप है कि सुरक्षा उपकरणों की भी भारी कमी है। पर्याप्त मात्रा में मास्क, सुरक्षा चश्मा और अन्य आवश्यक सुरक्षा संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं। कई बार श्रमिकों को खुद ही प्रबंध करने के लिए कह दिया जाता है।
खदान में कार्यरत मजदूरों का कहना है कि जब धूलकणों से फेफड़े खराब होंगे और आंखों की रोशनी प्रभावित होगी, तब उत्पादन का आंकड़ा किसी काम का नहीं रहेगा। इसलिए पहले श्रमिकों का स्वास्थ्य सुरक्षित होना चाहिए।
कर्मयोगी प्रशिक्षण बना मजाक, सैकड़ों श्रमिक रह गए वंचित
आंदोलनरत श्रमिकों ने कर्मयोगी प्रशिक्षण व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि 28 मई को प्रशिक्षण संबंधी नोटिस जारी किया गया और 31 मई को उसे समाप्त भी कर दिया गया।
मजदूर नेता अफताब आलम ने कहा कि सभी श्रमिक पढ़े-लिखे नहीं हैं और न ही सभी के पास मोबाइल फोन उपलब्ध हैं। ऐसे में अल्प समय के नोटिस पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना केवल औपचारिकता साबित हुआ। बड़ी संख्या में श्रमिक प्रशिक्षण से वंचित रह गए।
अस्पताल की बदहाल व्यवस्था भी बनी आंदोलन की वजह
श्रमिकों के अनुसार सेल अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाएं लगातार कमजोर होती जा रही हैं। बेहतर चिकित्सा सुविधा के अभाव में कर्मचारियों और उनके परिवारों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
आंदोलनकारी श्रमिकों का कहना है कि खदान में काम करने वाले कर्मचारियों का स्वास्थ्य पहले से ही जोखिम में रहता है। ऐसे में अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक, पर्याप्त दवाइयां और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रबंधन की जिम्मेदारी है, लेकिन इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
अफताब आलम बोले—‘सिर्फ आश्वासन नहीं, स्थायी समाधान चाहिए’
मजदूर नेता अफताब आलम ने कहा कि स्ट्राइक शुरू होने के बाद प्रबंधन की ओर से पानी छिड़काव शुरू करने की बात कही जा रही है। लेकिन अब श्रमिक केवल अस्थायी उपायों से संतुष्ट नहीं होंगे।
उन्होंने कहा कि हर बार आंदोलन के बाद कुछ दिनों तक व्यवस्था सुधरती है और फिर पुरानी स्थिति लौट आती है। इसलिए इस बार जिम्मेदार अधिकारी स्वयं मौके पर आकर लिखित एवं स्थायी समाधान का भरोसा दें।
अफताब आलम ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि श्रमिकों की सेहत से खिलवाड़ अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और जब तक ठोस निर्णय नहीं होता, आंदोलन जारी रहेगा।
उत्पादन ठप, प्रबंधन के सामने बड़ी चुनौती
खदान के प्रमुख विभागों में कार्य बंद होने से लौह अयस्क उत्पादन और डिस्पैच व्यवस्था प्रभावित हो गई है। यदि आंदोलन लंबा खिंचता है तो इसका सीधा असर उत्पादन लक्ष्य और कंपनी के राजस्व पर पड़ सकता है।
वहीं श्रमिकों का कहना है कि उत्पादन बाद में भी हो सकता है, लेकिन स्वास्थ्य बिगड़ जाने के बाद उसकी भरपाई संभव नहीं है। इसलिए प्रबंधन को उत्पादन के आंकड़ों से पहले श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक कार्य वातावरण सुनिश्चित करना चाहिए।
स्वास्थ्य से समझौता नहीं, यही है आंदोलन का संदेश
मेघाहातुबुरु खदान में शुरू हुआ यह आंदोलन केवल वेतन या सुविधा का मामला नहीं है, बल्कि सैकड़ों श्रमिकों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा मुद्दा बन गया है। खदान की उड़ती धूल, सुरक्षा संसाधनों की कमी और चिकित्सा सुविधाओं की बदहाली के खिलाफ उठी यह आवाज अब प्रबंधन के लिए बड़ी चेतावनी बन चुकी है।
श्रमिकों का साफ कहना है कि “लौह अयस्क का उत्पादन बाद में होगा, पहले मजदूरों की सांसें बचाई जाएं।” यही संदेश लेकर मेघाहातुबुरु खदान में आंदोलन की आग फिलहाल लगातार सुलग रही है।












