ग्रामीण कार्य विभाग में ‘मामा राज’ का महाघोटाला !
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
झारखंड सरकार का ग्रामीण कार्य विभाग इन दिनों भ्रष्टाचार, टेंडर मैनेजमेंट, कमीशनखोरी, फर्जी शिकायत पत्र और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों में बुरी तरह घिर चुका है। विभाग की कार्यशैली पर अब केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी सवाल उठने लगे हैं। मामला अब रांची से निकलकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुका है। विभाग के अंदर चल रहे कथित “मामा राज” को लेकर सरकार की छवि पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सूत्रों की मानें तो ग्रामीण कार्य विभाग में वर्षों से चल रहे टेंडर खेल, कमीशन सिस्टम और मनमानी पोस्टिंग की परतें अब धीरे-धीरे खुलने लगी हैं। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी द्वारा मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन को भेजे गए शिकायत पत्र के बाद यह मामला और अधिक गर्मा गया है। वहीं झारखंड हाईकोर्ट में दायर रिट याचिका संख्या 6153/2025 ने पूरे मामले को कानूनी मोर्चे पर भी बड़ा झटका दे दिया है।

ग्रामीण कार्य विभाग बना ‘कमिशन कलेक्शन सेंटर’?
राज्य में चर्चा है कि ग्रामीण कार्य विभाग अब विकास कार्यों से ज्यादा टेंडर मैनेजमेंट और कमीशन नेटवर्क के लिए चर्चित हो चुका है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, मंत्री दीपिका पांडेय सिंह के बेहद करीबी माने जाने वाले बबलू मिश्रा उर्फ “मामा जी” का विभाग में जबरदस्त हस्तक्षेप बताया जा रहा है। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया से लेकर अभियंताओं की पोस्टिंग तक हर बड़े निर्णय में “मामा जी” की भूमिका प्रभावशाली रही है।
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब ग्रामीण कार्य विभाग के मुख्य अभियंता कार्यालय से जुड़े दस अभियंताओं द्वारा बबलू मिश्रा के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराए जाने की खबर सामने आई। शिकायत में विभागीय दबाव, टेंडर हस्तक्षेप और कथित भ्रष्टाचार का उल्लेख बताया गया। लेकिन कहानी ने अचानक मोड़ ले लिया।
दस अभियंता क्यों पलट गए?
दबाव, मैनेजमेंट या डर का खेल?
सूत्रों के अनुसार, शिकायत सामने आने के बाद मंत्रालय स्तर पर भारी दबाव बनाया गया। इसके बाद वही अभियंता अपने ही शिकायत पत्र से पीछे हटते दिखाई दिए। बताया जा रहा है कि मुख्य अभियंता सरवन कुमार के स्तर से पूरे मामले को “मैनेज” किया गया और अभियंताओं से नया पत्र लिखवाया गया, जिसमें पहले की शिकायत से इनकार कर दिया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि शिकायत फर्जी थी तो फिर दस-दस अभियंताओं ने हस्ताक्षर कैसे किए? और यदि शिकायत सही थी तो अचानक यू-टर्न क्यों लिया गया?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी अब इस पूरे मामले में अभियंताओं के हस्ताक्षर की फोरेंसिक जांच कराने की तैयारी में हैं। यदि ऐसा होता है तो ग्रामीण कार्य विभाग की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

सरवन कुमार के कार्यकाल पर गंभीर सवाल
ग्रामीण कार्य विभाग के मुख्य अभियंता सरवन कुमार का नाम अब विवादों के केंद्र में आ चुका है। संवेदक सूत्रों का आरोप है कि जूनियर अधिकारी को सीनियर पद पर बैठाकर पूरे विभाग में टेंडर और कमीशन का खेल संचालित किया जा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि सरवन कुमार के कार्यकाल में कई बड़े टेंडरों को जानबूझकर लंबित रखा गया। एक वर्ष से अधिक समय तक टेंडर प्रक्रिया को रोककर रखा गया ताकि “मैनेजमेंट” के लिए समय मिल सके। बीड वैलिडिटी समाप्त होने के बाद संवेदकों से दोबारा आवेदन लेकर बीड वैलिडिटी बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की गई, जिसे कई संवेदक नियम विरुद्ध और संदिग्ध बता रहे हैं।
विपक्ष का आरोप है कि योग्य संवेदकों को तकनीकी आधार पर अयोग्य घोषित कर चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। भाजपा अब इस पूरे मामले को केंद्रीय एजेंसी तक ले जाने की तैयारी में बताई जा रही है।
हाईकोर्ट पहुंचा ‘जूनियर को सीनियर बनाने’ का मामला
इसी बीच झारखंड हाईकोर्ट में दायर रिट याचिका संख्या 6153/2025 ने विभागीय कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। याचिकाकर्ता कन्हाई प्रसाद ने आरोप लगाया है कि वरिष्ठता की खुलेआम अनदेखी कर कनिष्ठ अधिकारियों को प्रभारी मुख्य अभियंता और अभियंता प्रमुख जैसे उच्च पदों पर बैठाया गया।
याचिका में कहा गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 309 का उल्लंघन है और पूरी प्रक्रिया मनमानी, पक्षपातपूर्ण तथा राजनीतिक प्रभाव से प्रेरित है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि—
* संबंधित अधिसूचनाएं रद्द की जाएं,
* उच्च पदों पर पोस्टिंग हेतु उच्चस्तरीय समिति गठित हो,
* वरिष्ठता के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लिया जाए,
* तथा प्रभारी अधिकारियों द्वारा वित्तीय लेन-देन और टेंडर प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।

हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, सरकार को नोटिस
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत में हुई। अदालत ने निजी प्रतिवादी संख्या 7 से 11 को नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि नोटिस की तामिला सुनिश्चित की जाए।
अदालत ने निजी प्रतिवादियों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने की स्वतंत्रता भी दी है। मामले की अगली सुनवाई 30 जून 2026 को तय की गई है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अदालत ने प्रारंभिक स्तर पर ही गंभीरता दिखाई है तो आने वाले दिनों में विभागीय फैसलों की गहन जांच संभव है।
“मामा जी” का कॉल डिटेल बनेगा सबसे बड़ा हथियार?
सूत्रों के अनुसार विपक्ष अब मंत्री के करीबी बबलू मिश्रा उर्फ “मामा जी” के कॉल डिटेल और फेस टाइम रिकॉर्ड की जांच की मांग कर सकता है। आरोप है कि विभाग के कई कार्यपालक अभियंताओं से लगातार संपर्क में रहकर टेंडर और पोस्टिंग को प्रभावित किया गया।
यदि जांच एजेंसी ने कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल बातचीत की जांच शुरू की तो कई बड़े नामों का खुलासा होने की संभावना जताई जा रही है।
विधानसभा तक पहुंच चुका है मामला
ग्रामीण कार्य विभाग में टेंडर निष्पादन पर मौखिक रोक का मामला विधानसभा तक पहुंच चुका है। विपक्ष का आरोप है कि नियम विरुद्ध तरीके से टेंडर प्रक्रिया रोककर विशेष लोगों को लाभ पहुंचाने की साजिश की गई।
पूर्व में हटिया विधायक द्वारा मुख्य अभियंता सरवन कुमार के कार्यालय का घेराव और प्रदर्शन भी किया जा चुका है। यह विरोध केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता पक्ष के भीतर भी नाराजगी बढ़ती दिखाई दे रही है।
कांग्रेस के भीतर भी बढ़ रही बेचैनी
सूत्रों के अनुसार कांग्रेस पार्टी के कई विधायक पहले ही मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और उनके करीबी लोगों की कार्यशैली को लेकर पार्टी आलाकमान से शिकायत कर चुके हैं। अब जैसे-जैसे भ्रष्टाचार के आरोप सार्वजनिक हो रहे हैं, कांग्रेस के भीतर भी असंतोष खुलकर सामने आने लगा है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस कोटे के दो मंत्रियों में बदलाव संभव है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ग्रामीण कार्य विभाग की बढ़ती बदनामी को इसकी बड़ी वजह माना जा रहा है।
हेमन्त सरकार की छवि पर बड़ा दाग?
झामुमो सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन स्वयं विभागों की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। ग्रामीण कार्य विभाग से जुड़े लगातार विवाद सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि ग्रामीण सड़क, पुल और विकास योजनाओं से जुड़ा विभाग अब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हुआ है। यदि जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं तो इसका राजनीतिक असर आगामी चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
पहले भी जेल जा चुके हैं विभाग के बड़े चेहरे
ग्रामीण कार्य विभाग का भ्रष्टाचार से पुराना रिश्ता रहा है। पूर्व में मुख्य अभियंता वीरेंद्र राम भ्रष्टाचार के मामले में जेल जा चुके हैं। इसके बाद दूसरी पारी में पूर्व मंत्री आलमगीर आलम और संजीव कुमार लाल भी जेल पहुंच चुके हैं।
अब राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि “तीसरी पारी” में आखिर किस पर गाज गिरने वाली है?
सूत्रों का दावा है कि यदि फोरेंसिक जांच, कॉल डिटेल और टेंडर फाइलों की तकनीकी जांच हुई तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं।

भ्रष्टाचार की जड़ में ‘पोस्टिंग पॉलिटिक्स’?
पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी “पोस्टिंग पॉलिटिक्स” मानी जा रही है। आरोप है कि वरिष्ठ अधिकारियों को दरकिनार कर पसंदीदा अधिकारियों को ऊंचे पदों पर बैठाया गया ताकि टेंडर और वित्तीय फैसलों पर नियंत्रण रखा जा सके।
यही कारण है कि अब हाईकोर्ट तक यह सवाल पहुंच चुका है कि क्या सरकार नियमों के अनुसार काम कर रही है या फिर विभाग को “प्रभावशाली नेटवर्क” के जरिए संचालित किया जा रहा है?
अब आगे क्या?
30 जून 2026 को हाईकोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई पर पूरे राज्य की नजर टिकी हुई है। विपक्ष केंद्रीय जांच एजेंसी की मांग की तैयारी में है, वहीं सत्ता पक्ष के भीतर भी बेचैनी बढ़ रही है।
यदि अदालत ने कठोर टिप्पणी की या जांच के आदेश दिए तो ग्रामीण कार्य विभाग का यह मामला झारखंड की राजनीति में बड़ा भूचाल ला सकता है।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि ग्रामीण कार्य विभाग में चल रही कथित “टेंडर राजनीति” और “मामा नेटवर्क” अब जनता, अदालत और विपक्ष — तीनों के निशाने पर आ चुका है।














