सारंडा की धरती से उठा संदेश — अपनी जड़ों से जुड़ेंगे युवा, तो संस्कृति भी बचेगी और रोजगार भी मिलेगा
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
किरीबुरू-मेघाहातुबुरु की वादियों में दो दिनों तक आदिवासी संस्कृति, परंपरा, प्रकृति प्रेम और सामुदायिक जीवन की ऐसी अद्भुत छटा बिखरी कि पूरा क्षेत्र मांदर की थाप, लोकगीतों और पारंपरिक रंगों से जीवंत हो उठा।
सेल किरीबुरू प्रबंधन की सीएसआर योजना तथा आदिवासी कल्याण केंद्र किरीबुरू-मेघाहातुबुरु-प्रोस्पेक्टिंग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित आदिवासी जनजातीय पारंपरिक खेल सह प्रदर्शनी “उनुरूम 3.0” का भव्य समापन सीजीएम पी. एम. शिरपुरकर एवं महिला समिति की अध्यक्ष स्वाति शिरपुरकर की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ।
दो दिवसीय इस आयोजन ने केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का रूप नहीं लिया, बल्कि यह आदिवासी सभ्यता, सामाजिक एकता, प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली और पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सशक्त अभियान बन गया।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में महाप्रबंधक नवीन कुमार सोनकुश्रे, सहायक महाप्रबंधक सी. के. बिस्वाल, सहायक प्रबंधक बी. बासा, राजकुमार यादव, मुखिया लिपि मुंडा, मुंडा राजेश समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

सारंडा की मिट्टी में आज भी जिंदा है परंपरा की खुशबू
सामुदायिक भवन परिसर में आयोजित “उनुरूम 3.0” में जैसे ही मांदर और नगाड़ों की आवाज गूंजी, वैसे ही पूरा परिसर आदिवासी संस्कृति के रंग में रंग गया।
कार्यक्रम में गांवों से पहुंचे महिला-पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में नजर आए। महिलाओं के सिर पर पारंपरिक फूल, रंग-बिरंगे वस्त्र और पुरुषों के हाथों में तीर-धनुष आदिवासी अस्मिता की पहचान बनकर उभरे।
कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण यह रहा कि यहां आधुनिकता की अंधी दौड़ से दूर अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश हर गतिविधि में दिखाई दिया।
चाहे पारंपरिक खेल हों, लोकगीत हों, हस्तकला हो या पारंपरिक भोजन — हर चीज में प्रकृति और समुदाय के प्रति सम्मान साफ दिखाई दिया।

पारंपरिक खेलों में दिखी जंगल और जीवन की झलक
कार्यक्रम के पहले दिन आयोजित पारंपरिक खेलों ने लोगों को वर्षों पुरानी जनजातीय जीवनशैली की याद दिला दी।
यह केवल खेल नहीं थे, बल्कि जंगल आधारित जीवन, श्रम, कौशल और सामूहिकता की पहचान थे।
मुर्गा पकड़ प्रतियोगिता ने जहां ग्रामीण जीवन की सहजता को दर्शाया, वहीं महिलाओं के लिए आयोजित किता गलंग (चटाई बनाना) प्रतियोगिता ने आदिवासी महिलाओं की कलात्मक क्षमता को सामने रखा।
पुरुषों के लिए आयोजित बडचोम उईज (घास से रस्सी बुनना) प्रतियोगिता ने जंगल आधारित जीवन की उपयोगी कला को जीवित रखा।
तीरंदाजी प्रतियोगिता में युवाओं ने अपने पारंपरिक कौशल का शानदार प्रदर्शन किया।
इसके अलावा महिलाओं के लिए चिटकी-पू-बई (पत्ते से पत्तल बनाना) और चाटु दुपिल (मिट्टी की हांडी में पानी डालकर चलना) प्रतियोगिता आयोजित हुई, जिसने ग्रामीण जीवन की मेहनत और संतुलन को प्रदर्शित किया।
पुरुषों के लिए आयोजित सेंगेल गुरतुई (लकड़ी रगड़कर आग जलाना) प्रतियोगिता सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र बनी।
इस प्रतियोगिता ने यह संदेश दिया कि आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर आत्मनिर्भर जीवन जीता आया है।

लोक व्यंजनों की खुशबू ने मोहा हर किसी का मन
कार्यक्रम के दूसरे दिन पारंपरिक व्यंजनों की प्रदर्शनी ने लोगों को आदिवासी खानपान की समृद्ध परंपरा से परिचित कराया।
यहां प्रदर्शित हर व्यंजन केवल स्वाद नहीं बल्कि जंगल, खेती और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली की कहानी कह रहा था।
लेटो (खिचड़ी), हाउ यानी लाल चींटी की चटनी, फुटकल अचार, मड़ुआ रोटी, मटकम पाटू (महुआ लड्डू), जिलु (चिकन), डियांग, चिकन पत्ता पोड़ा, बम्बू चिकन और केकड़ा सूप लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे।
लोगों ने बड़े उत्साह से इन व्यंजनों का स्वाद लिया और आदिवासी भोजन परंपरा की सराहना की।
विशेष रूप से लाल चींटी की चटनी और बम्बू चिकन को देखने और चखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।

हस्तकला और सोहराय पेंटिंग में दिखी जनजातीय कला की आत्मा
कार्यक्रम में लगाई गई हस्तकला और पारंपरिक कला प्रदर्शनी ने भी लोगों को खूब आकर्षित किया।
सोहराय पेंटिंग, प्राकृतिक रंगों से बनी कलाकृतियां, बांस और जंगल उत्पादों से तैयार सामग्री ने यह साबित कर दिया कि आदिवासी समाज कला और सृजनशीलता में कितना समृद्ध है।
महिलाओं द्वारा बनाए गए हस्तनिर्मित उत्पादों ने यह संदेश दिया कि यदि इन्हें बाजार और उचित मंच मिले तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं।

धान रोपाई से मछली पकड़ने तक — नृत्य में दिखा पूरा आदिवासी जीवन
विभिन्न गांवों से पहुंचे महिला और पुरुष कलाकारों ने सामूहिक लोक नृत्य प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया।
इन नृत्यों में केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि आदिवासी जीवन का पूरा दर्शन दिखाई दिया।
धान रोपाई, फसल कटाई, अनाज को घर तक लाना, जंगल जाना, नदी में मछली पकड़ना और सामूहिक श्रम जैसे दृश्य नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किए गए।
चाईबासा से आए राष्ट्रीय स्तर के पारंपरिक आदिवासी लोक नृत्य कलाकारों की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए।
मांदर की थाप पर थिरकते कलाकारों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

बच्चों की रैंप वॉक ने दिखाई नई पीढ़ी की सांस्कृतिक पहचान
कार्यक्रम में बच्चों की पारंपरिक रैंप वॉक भी आकर्षण का केंद्र रही।
पारंपरिक परिधानों में सजे बच्चों ने यह संदेश दिया कि नई पीढ़ी भी अपनी संस्कृति और पहचान को गर्व के साथ आगे बढ़ा रही है।
कार्यक्रम में मौजूद बुजुर्गों ने कहा कि यही बच्चे आने वाले समय में आदिवासी संस्कृति के असली वाहक बनेंगे।
सीजीएम पी. एम. शिरपुरकर ने दिया बड़ा संदेश
मुख्य अतिथि सीजीएम पी. एम. शिरपुरकर ने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी समाज की कला, संस्कृति, भाषा, परंपरा और जीवनशैली केवल झारखंड की नहीं बल्कि पूरे देश की धरोहर है।
उन्होंने कहा कि जो समाज अपनी संस्कृति को बचाकर रखता है, वही समाज भविष्य में मजबूत पहचान बनाता है।
उन्होंने युवाओं से अपनी जड़ों से जुड़े रहने की अपील करते हुए कहा कि आधुनिकता अपनाना गलत नहीं है, लेकिन अपनी संस्कृति भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी।
सीजीएम शिरपुरकर ने आदिवासी व्यंजन, हस्तकला और पारंपरिक उत्पादों की जमकर सराहना की।
उन्होंने कहा कि इन उत्पादों का व्यवसायीकरण कर ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को बड़े स्तर पर रोजगार से जोड़ा जा सकता है।

उन्होंने कहा —
“सारंडा आने वाले समय में देश-दुनिया के पर्यटकों का बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। जब यहां पर्यटक आएंगे तो वे केवल जंगल देखने नहीं आएंगे, बल्कि यहां की संस्कृति, भोजन, कला और परंपरा को भी जानना चाहेंगे। ऐसे में आदिवासी व्यंजन, हस्तकला और पारंपरिक उत्पादों की मांग बड़े स्तर पर बढ़ेगी। यह रोजगार और आत्मनिर्भरता का बड़ा माध्यम बन सकता है।”
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति के सबसे बड़े संरक्षक हैं और दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का असली संदेश आदिवासी जीवनशैली से ही मिलता है।
अतिथि सत्कार और सामुदायिक एकता ने जीता दिल
कार्यक्रम में आए अतिथियों और कलाकारों का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया।
अंग वस्त्र पहनाकर सम्मानित करने की परंपरा ने आदिवासी समाज की अतिथि सत्कार संस्कृति को जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम के दौरान गांवों के लोग सामूहिक रूप से एक-दूसरे की मदद करते दिखाई दिए।
कहीं महिलाएं भोजन तैयार कर रही थीं, तो कहीं युवा मंच व्यवस्था संभाल रहे थे।
यही सामुदायिक एकता आदिवासी समाज की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई।

विजेताओं को किया गया सम्मानित
विभिन्न पारंपरिक खेल प्रतियोगिताओं के विजेताओं को मुख्य एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा पुरस्कृत किया गया।
प्रतिभागियों के उत्साह ने यह साबित कर दिया कि आज भी गांवों में पारंपरिक खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति गहरा लगाव मौजूद है।

आयोजन को सफल बनाने में इनकी रही अहम भूमिका
कार्यक्रम को सफल बनाने में सलाहकार समिति के रोया राम चांपिया, संदीप तियु, महेंद्र आल्डा, जूनास केराई, हीरालाल सुण्डी, रमेश लागुरी, दशरथ लागुरी, महेश्वर नाथ लागुरी एवं शुभनाथ हेम्ब्रम की अहम भूमिका रही।
इसके अलावा अध्यक्ष विवेकानन्द सुण्डी, उपाध्यक्ष सुदाम चरण नायक, सचिव जॉन पूर्ति, नीलम सुण्डी पूर्ति, संयोजक प्रदीप चातर, गोपी लागुरी, अनीता लागुरी, सह संयोजक बीरबल गुड़िया, सेरगेया अंगरिया, बलभद्र बिरुली, राजेश मुण्डा एवं माधव चन्द्र कोड़ा ने आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय योगदान दिया।
खेल एवं सांस्कृतिक प्रबंधन में नीलिमा पूरती, गीता लागुरी, बिलाची सुण्डी, ढेजी रानी नायक, अंजली बिरुवा, पदमिनी लागुरी, श्याम सुंदर बिरुवा एवं लालतेंदु हेम्ब्रम की भूमिका सराहनीय रही।
मीडिया एवं सोशल मीडिया प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी विश्वनाथ सुण्डी, आजाद सिंकू एवं अजय बनरा ने संभाली।

“उनुरूम 3.0” बना सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मंच
“उनुरूम 3.0” ने यह साबित कर दिया कि आदिवासी संस्कृति केवल किताबों या संग्रहालयों की चीज नहीं, बल्कि आज भी लोगों की सांसों में जिंदा है।
जरूरत केवल उसे मंच देने और नई पीढ़ी से जोड़ने की है।
सारंडा की धरती से उठा यह सांस्कृतिक संदेश अब दूर तक जाएगा —
कि जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन हैं।
परंपरा केवल अतीत नहीं, बल्कि भविष्य की पहचान है।
और आदिवासी संस्कृति केवल एक समुदाय की धरोहर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है।














