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सारंडा का नयागांव-रायडीह पूछ रहा है— “क्या हमारी किस्मत में सिर्फ वोट देना और दर्द सहना लिखा है?” खनिजों से मालामाल झारखंड, लेकिन यह गांव आज भी बदहाल!

On: June 9, 2026 7:37 AM
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79 साल की आजादी, 26 साल का झारखंड, फिर भी पानी के लिए चुआं, मोबाइल चलाने के लिए जलमीनार और इलाज के लिए ओडिशा का सहारा। विकास के सरकारी दावों पर झारखंड का आखिरी गांव बना सबसे बड़ा सवाल।

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

झारखंड… वह राज्य जो लौह अयस्क, मैंगनीज और बेशकीमती वन संपदा से देश की अर्थव्यवस्था को ताकत देता है। वह राज्य जहां की खदानों से निकलने वाला खनिज देश के बड़े-बड़े उद्योगों की सांसें चलाता है। लेकिन इसी झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के सारंडा जंगल के अंतिम छोर पर बसा नयागांव-रायडीह आज भी ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर है, जिसे देखकर लगता है कि विकास यहां आने से पहले ही रास्ता भटक गया।
यह गांव सिर्फ भौगोलिक रूप से झारखंड का आखिरी गांव नहीं है, बल्कि सरकारी उपेक्षा का भी आखिरी पड़ाव बन चुका है।
तीन ओर से ओडिशा की सीमा से घिरा यह गांव मानो सरकार से पूछ रहा है—

“क्या हम झारखंड के नागरिक हैं या सिर्फ चुनावी आंकड़ा?”

नेता आते हैं, वादे बरसाते हैं और फिर गांव को उसके हाल पर छोड़ जाते हैं

हर चुनाव में गांव की पगडंडियों पर नेताओं के काफिले पहुंचते हैं। मंच सजते हैं। विकास के सपने बेचे जाते हैं। बिजली, पानी, सड़क, अस्पताल और रोजगार के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।
लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव फिर उसी अंधेरे में धकेल दिया जाता है, जहां उम्मीदें भी दम तोड़ने लगती हैं।
ग्रामीण नवीन खलको गांव की बदहाली दिखाते हुए कहते हैं—
“चुनाव के समय हम सबके अपने होते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही हम अनाथ हो जाते हैं। कोई यह देखने तक नहीं आता कि हम जिंदा हैं या मर गए।”

ट्रांसफार्मर खड़ा है… लेकिन उसमें सरकार के वादों की तरह करंट नहीं

साल 2018 में गांव में ट्रांसफार्मर लगाया गया। लोगों ने सोचा अब उनके घरों में उजाला आएगा। बच्चों का भविष्य बदलेगा। लेकिन वर्षों बीत गए, ट्रांसफार्मर आज भी मूक दर्शक बना खड़ा है। उसमें बिजली नहीं, बल्कि टूटे हुए सपनों की कहानी बहती है।
रात होते ही गांव अंधेरे के हवाले हो जाता है। बच्चे लालटेन की रोशनी में पढ़ते हैं और कई परिवार अंधेरे के साथ जीने को मजबूर हैं।

डिजिटल इंडिया का सबसे कड़वा सच—एक फोन करने के लिए जलमीनार पर चढ़ना पड़ता है

देश 5जी की बात कर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल क्रांति की चर्चा हो रही है। लेकिन नयागांव-रायडीह के लोगों को एक मोबाइल कॉल करने के लिए दो किलोमीटर दूर ओडिशा सीमा में बनी जलमीनार तक जाना पड़ता है। नेटवर्क पाने के लिए लोग टंकी के ऊपर चढ़ते हैं।
सोचिए… अगर किसी की तबीयत बिगड़ जाए, किसी गर्भवती महिला को तत्काल मदद चाहिए या कोई दुर्घटना हो जाए, तब भी यहां पहले नेटवर्क ढूंढना पड़ता है।
क्या यही डिजिटल भारत है?

पानी के लिए महिलाओं का संघर्ष, सरकार के दावों पर तमाचा

गांव की महिलाएं रोज सिर पर बर्तन रखकर प्राकृतिक चुआं से पानी लाती हैं। बरसात में किसी तरह काम चल जाता है, लेकिन गर्मियों में यही चुआं सूख जाता है और तब पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष शुरू हो जाता है। हर घर जल योजना के पोस्टर भले दीवारों पर लगे हों, लेकिन नयागांव-रायडीह की महिलाओं के कंधों पर आज भी पानी का बोझ है।

बीमार पड़ना मतलब भगवान भरोसे जिंदगी

यहां स्वास्थ्य सुविधा का हाल इतना खराब है कि गंभीर मरीजों को कई किलोमीटर दूर ले जाना पड़ता है। इलाज के लिए लोगों को ओडिशा पर भरोसा करना पड़ता है। ग्रामीण कहते हैं कि अगर रात में कोई गंभीर रूप से बीमार पड़ जाए तो सबसे पहले यही डर सताता है कि कहीं अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी सांसें न थम जाएं।

झारखंड में गांव, लेकिन जिंदगी पूरी तरह ओडिशा के भरोसे

बाजार जाना हो, बस पकड़नी हो, इलाज कराना हो या संचार सुविधा का उपयोग करना हो—ग्रामीणों को ओडिशा का रुख करना पड़ता है।
यह कैसी विडंबना है कि झारखंड का अंतिम गांव अपनी जरूरतों के लिए दूसरे राज्य पर निर्भर है?

कभी नक्सलियों का डर था, अब उपेक्षा का आतंक है

यह गांव कभी नक्सल प्रभावित इलाकों में गिना जाता था। सुरक्षा बलों ने अभियान चलाकर सारंडा को काफी हद तक नक्सल मुक्त कर दिया।
लेकिन अब ग्रामीण कहते हैं कि गोलियों का डर तो खत्म हो गया, मगर सरकारी उपेक्षा का डर अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहा।

बच्चों के सपनों का भी हो रहा पलायन

बिजली नहीं, नेटवर्क नहीं, बेहतर शिक्षा नहीं और रोजगार की कोई ठोस व्यवस्था नहीं। ऐसे में गांव के युवा अपना भविष्य बचाने के लिए पलायन करने को मजबूर हैं। जो बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर या अधिकारी बनने का सपना देखते हैं, वे संसाधनों के अभाव में शुरुआत में ही पिछड़ जाते हैं।

ग्रामीणों की सात मांगें, जो किसी उपकार की नहीं बल्कि अधिकार की हैं

गांव में स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना।
● हर घर तक स्वच्छ पेयजल।
● तत्काल बिजली आपूर्ति।
● मोबाइल टावर और बेहतर नेटवर्क।
● मजबूत सड़क और परिवहन व्यवस्था।
● गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सुविधा।
● स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार।

सरकार से सीधा सवाल

* जिस धरती का खनिज देश को समृद्ध बना रहा है, क्या उस धरती के लोगों को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार नहीं?
* क्या विकास की गंगा सिर्फ शहरों तक बहेगी?
* क्या झारखंड का आखिरी गांव हमेशा ओडिशा के भरोसे ही जिएगा?
* क्या यहां के बच्चे अंधेरे में ही अपना भविष्य तलाशते रहेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल…

पेड़ पर मोबाइल रख नेटवर्क खोजने की तस्वीर

क्या नयागांव-रायडीह के लोग सिर्फ चुनावी मौसम में याद किए जाने वाले वोटर हैं, या फिर वे भी इस लोकतंत्र के बराबर के नागरिक हैं?

ग्रामीण नवीन खलको की आवाज आज पूरे गांव की आवाज बन चुकी है—
“हमें किसी की दया नहीं चाहिए, हमें हमारा हक चाहिए। अगर सरकार हमें झारखंड का नागरिक मानती है तो झारखंड की बुनियादी सुविधाएं भी हमारे गांव तक पहुंचनी चाहिए।”
अब फैसला सरकार और प्रशासन को करना है कि इतिहास उन्हें विकास करने वाली व्यवस्था के रूप में याद रखेगा या उस व्यवस्था के रूप में, जिसने राज्य के आखिरी गांव को उसके हाल पर छोड़ दिया।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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