झारखंड पुलिस का अब तक का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक वार, माओवादी संगठन को लगा करारा झटका
रिपोर्ट शैलेश सिंह, (28 जुलाई 2026)
झारखंड में माओवाद के खिलाफ चल रहे निर्णायक अभियान ने मंगलवार को एक और ऐतिहासिक सफलता दर्ज की। झारखंड पुलिस, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (कोबरा) और झारखंड जगुआर की लगातार रणनीतिक कार्रवाई, सुरक्षाबलों की चौतरफा घेराबंदी तथा राज्य सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के प्रभाव से भाकपा (माओवादी) संगठन के 16 शीर्ष कमांडरों एवं दस्ता सदस्यों ने अपने हथियार डाल दिए। यह आत्मसमर्पण केवल 16 नक्सलियों का मुख्यधारा में लौटना नहीं है, बल्कि कोल्हान, सारंडा और लातेहार क्षेत्र में माओवादी संगठन की कमर टूटने का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
इन नक्सलियों ने कुल 11 हथियार और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इनमें संगठन के रीजनल कमेटी, जोनल कमेटी, सब-जोनल कमेटी, एरिया कमेटी के कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं।

महानिदेशक के नेतृत्व में निर्णायक अभियान
महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक, झारखंड के निर्देशन में राज्यभर में नक्सलवाद के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया जा रहा है। झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन और झारखंड जगुआर संयुक्त रूप से जंगलों, पहाड़ों और दुर्गम इलाकों में लगातार ऑपरेशन चला रहे हैं।
लगातार बढ़ते दबाव, आधुनिक रणनीति, सटीक खुफिया सूचना और प्रभावी कार्रवाई के कारण अब माओवादी संगठन अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। दूसरी ओर झारखंड सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति उन भटके युवाओं के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आई है, जिन्होंने वर्षों तक बंदूक के सहारे जिंदगी गुजारी।
ऑपरेशन “नवजीवन-II” बना माओवाद के ताबूत की आखिरी कील
ऑपरेशन “नवजीवन-II” के तहत आत्मसमर्पण करने वाले सभी 16 नक्सली भाकपा (माओवादी) के सबसे प्रभावशाली नेटवर्क से जुड़े रहे हैं। ये सभी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ सागर जी तथा केंद्रीय कमेटी सदस्य असीम मंडल के नेतृत्व वाले दस्ते का हिस्सा थे।
इनमें कोल्हान और सारंडा के दुर्गम जंगलों की भौगोलिक जानकारी रखने वाले अनुभवी कमांडर शामिल हैं, जो वर्षों तक सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने रहे। लातेहार में सक्रिय दो माओवादी भी इसी अभियान के तहत मुख्यधारा में लौटे।
कौन-कौन शामिल हैं आत्मसमर्पण करने वालों में
कुल 16 माओवादी सदस्यों में—
* 01 रीजनल कमेटी सदस्य (RCM)
* 03 जोनल कमेटी सदस्य (ZCM)
* 03 सब-जोनल कमेटी सदस्य (SZCM)
* 06 एरिया कमेटी सदस्य (ACM)
* 03 दस्ता सदस्य
इनमें 11 पुरुष तथा 5 महिला नक्सली शामिल हैं।
हथियारों का जखीरा भी किया पुलिस के हवाले
आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों ने केवल हथियार ही नहीं छोड़े बल्कि हिंसा की विचारधारा से भी खुद को अलग कर लिया।
उन्होंने पुलिस को सौंपे—
* कुल 11 हथियार
* 1,562 जिंदा गोलियां
यह बरामदगी सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

छत्तीसगढ़ में भी संगठन को लगा समानांतर झटका
झारखंड में 16 नक्सलियों के आत्मसमर्पण के साथ-साथ इसी दस्ते के 8 अन्य कमांडर एवं सदस्य भी छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण कर रहे हैं।
इनमें—
* 3 पुरुष
* 5 महिला नक्सली
शामिल हैं।
इस तरह एक ही नेटवर्क से जुड़े कुल 24 माओवादी संगठन छोड़ रहे हैं, जिससे माओवादी नेतृत्व की रणनीतिक क्षमता पर गंभीर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
इन जिलों से जुड़े थे आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली
आत्मसमर्पण करने वाले 16 सदस्यों में—
15 झारखंड के विभिन्न जिलों के निवासी हैं—
* पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा)
* लातेहार
* लोहरदगा
* हजारीबाग
* खूंटी
* बोकारो
* रांची
* सरायकेला-खरसावां
* गिरिडीह
* जबकि एक सदस्य ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले का निवासी है।
इन सभी को वर्षों पहले माओवादी संगठन ने अपने दस्तों में शामिल किया था।
लगातार सफलताओं से टूट रहा माओवादी नेटवर्क
झारखंड पुलिस की कार्रवाई पिछले कुछ महीनों में लगातार ऐतिहासिक रही है।
21 मई 2026 को—
27 माओवादी कमांडर एवं सदस्य आत्मसमर्पण कर चुके हैं।
इनमें—
* 7 एसजेडसीएम
* 7 एसीएम
* 13 दस्ता सदस्य
शामिल थे।
इसके बाद—
13 जुलाई 2026 को 20 लाख रुपये के इनामी शीर्ष कमांडर रविंद्र गंझु (RCM) की गिरफ्तारी हुई।
17 जुलाई 2026 को 25 लाख रुपये के इनामी शीर्ष कमांडर अजय महतो उर्फ टाइगर (SAC) गिरफ्तार हुआ।
इसी दौरान बबिता उर्फ अनिता किस्कू (ACM) ने भी आत्मसमर्पण किया।
इन लगातार सफल अभियानों ने माओवादी संगठन की कमर तोड़ दी है।
2026 में नक्सल विरोधी अभियान के चौंकाने वाले आंकड़े
झारखंड पुलिस द्वारा वर्ष 2026 में अब तक—
* 93 नक्सली गिरफ्तार
* 45 नक्सलियों का आत्मसमर्पण
* 22 नक्सली पुलिस मुठभेड़ में ढेर
अब 16 नए आत्मसमर्पण के बाद यह संख्या और अधिक मजबूत उपलब्धि के रूप में दर्ज होगी।
आखिर क्यों टूट रहा माओवादी संगठन?
पुलिस अधिकारियों के अनुसार इसके पीछे कई बड़े कारण हैं।
सबसे महत्वपूर्ण कारण हैं—
* संगठन के भीतर बढ़ता शोषण।
* निचले स्तर के कैडरों का मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न।
* नेतृत्व का भय और दमन।
* सुरक्षा बलों की लगातार बढ़ती घेराबंदी।
* आधुनिक तकनीक आधारित अभियान।
* आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति से मिलने वाला सम्मानजनक जीवन।
यही वजह है कि बड़ी संख्या में नक्सली अब बंदूक छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं।
कोल्हान और सारंडा में अब खत्म हो रहा लाल आतंक
एक समय ऐसा था जब सारंडा और कोल्हान का नाम सुनते ही माओवादी हिंसा की तस्वीर सामने आ जाती थी।
घने जंगल, कठिन पहाड़ियां और सीमावर्ती इलाकों का फायदा उठाकर माओवादी वर्षों तक यहां अपनी समानांतर सत्ता चलाते रहे।
लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है।
सुरक्षाबलों के लगातार अभियानों ने माओवादी संगठन की रसद, हथियार, जनाधार और नेतृत्व—चारों स्तरों पर गहरी चोट पहुंचाई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन शीर्ष कमांडरों के आत्मसमर्पण के बाद कोल्हान और सारंडा क्षेत्र में माओवादी गतिविधियां लगभग समाप्ति के अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं।
सरकार की पुनर्वास नीति बनी नई जिंदगी का रास्ता
झारखंड सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति ने हिंसा छोड़ने वाले नक्सलियों के लिए नई राह खोली है।
इस नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वालों को पुनर्वास, प्रशिक्षण, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की दिशा में सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
यही कारण है कि लगातार नक्सली इस नीति पर भरोसा जता रहे हैं और हथियार छोड़ रहे हैं।
झारखंड अब विकास की नई उड़ान की ओर
दशकों तक नक्सलवाद और हिंसा से जूझता रहा झारखंड अब तेजी से बदल रहा है।
जहां कभी गोलियों की आवाज गूंजती थी, वहां अब विकास योजनाएं पहुंच रही हैं।
सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, संचार और रोजगार के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं।
सुरक्षाबलों की सफलता ने विकास कार्यों को नई गति प्रदान की है।

शेष माओवादियों से झारखंड पुलिस की अपील
झारखंड पुलिस ने जंगलों में सक्रिय शेष माओवादी सदस्यों से अपील की है कि वे हिंसा, भय और उगाही का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट आएं।
सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति उनके लिए सम्मानजनक जीवन का अवसर लेकर आई है।
पुलिस का कहना है कि बंदूक से केवल विनाश मिलता है, जबकि विकास और लोकतंत्र का रास्ता समाज को आगे बढ़ाता है।
बदलते झारखंड की नई तस्वीर
ऑपरेशन “नवजीवन-II” ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि झारखंड में अब माओवाद का अंत निकट है। लगातार आत्मसमर्पण, बड़े इनामी कमांडरों की गिरफ्तारी, मुठभेड़ों में माओवादियों के सफाए और संगठन के भीतर बढ़ती टूट ने लाल आतंक की जड़ों को कमजोर कर दिया है।
16 और माओवादियों के आत्मसमर्पण ने यह साबित कर दिया है कि बंदूक की राजनीति अब दम तोड़ रही है और विकास, विश्वास तथा लोकतंत्र की राह मजबूत हो रही है। आने वाले समय में यदि इसी तरह अभियान जारी रहा तो झारखंड पूरी तरह नक्सलवाद मुक्त राज्य बनने की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर सकता है।














