भ्रष्टाचार नक्सल खदान
अपराध राजनीति खेल समस्या स्वास्थ्य कार्यक्रम शिक्षा दुर्घटना सांस्कृतिक मनोरंजन मौसम कृषि ज्योतिष काम

नक्सलियों के नाम पर रंगदारी की दुकान सजाने वालों में मचा हड़कंप

On: May 20, 2026 4:23 PM
Follow Us:
---Advertisement---

सारंडा-कोल्हान में नक्सल नेटवर्क ढहते ही बेनकाब हो रहे “फर्जी क्रांतिकारी”, अब बंद होने लगी भय और उगाही की काली कमाई

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

पश्चिम सिंहभूम जिले के सारंडा, कोल्हान और पोड़ाहाट जंगल में नक्सली नेटवर्क लगातार कमजोर पड़ने के साथ ही अब उन अपराधियों और असामाजिक तत्वों की भी नींद उड़ गई है, जो वर्षों से नक्सलियों के नाम पर भय का कारोबार चला रहे थे। कभी मोबाइल फोन से ठेकेदारों को धमकी, तो कभी लाल स्याही से लिखे फर्जी पत्र भेजकर लाखों की रंगदारी मांगने वाले गिरोह अब खुद डर और संकट में जीने लगे हैं।
सुरक्षाबलों के लगातार अभियान, बड़े नक्सलियों के मारे जाने और आत्मसमर्पण की बढ़ती घटनाओं ने इन तथाकथित “नक्सली एजेंटों” की दुकानदारी पर ताला लगाना शुरू कर दिया है। जंगलों में अब बंदूक की आवाज से ज्यादा पुलिस कैंपों की गतिविधियां सुनाई दे रही हैं, जिससे फर्जी उगाही करने वाले गिरोहों की कमर टूटती नजर आ रही है।

नक्सलियों का नाम, लेकिन खेल सिर्फ पैसे का

सारंडा, कोल्हान और पोड़ाहाट क्षेत्र में वर्षों से कुछ अपराधी नक्सल संगठन का नाम लेकर कारोबारियों, माइंस संचालकों, ट्रांसपोर्टरों और सरकारी ठेकेदारों को निशाना बनाते रहे। मोबाइल कॉल, व्हाट्सएप मैसेज और फर्जी पत्रों के जरिए कहा जाता था कि “लेवी नहीं दी तो अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो।”
भय के माहौल में कई लोग चुपचाप रकम पहुंचाते रहे, क्योंकि उन्हें जान-माल का खतरा सताता था। लेकिन हकीकत यह थी कि इन मामलों में कई बार असली नक्सली नहीं, बल्कि स्थानीय अपराधी गिरोह सक्रिय रहते थे, जिन्होंने नक्सलवाद को कमाई का सबसे आसान हथियार बना लिया था।

पुलिस कार्रवाई ने खोली फर्जी नेटवर्क की परतें

पूर्व में पुलिस ने ऐसे कई गिरोहों का खुलासा किया था, जो नक्सलियों के नाम पर उगाही कर रहे थे। कई अपराधी जेल भेजे गए, जबकि कुछ को खुद नक्सलियों ने “जन अदालत” लगाकर मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि वे संगठन का नाम इस्तेमाल कर निजी वसूली कर रहे थे।
इसके बावजूद जंगल और सीमावर्ती इलाकों में ऐसे तत्व लगातार सक्रिय बने रहे। इनका मकसद सिर्फ एक था—लोगों में डर पैदा करो और पैसों की उगाही करो।

अब खत्म हो रही “भय की अर्थव्यवस्था”

सुरक्षाबलों की बढ़ती पकड़ और नक्सली संगठनों की कमजोर होती स्थिति ने इन गिरोहों की आर्थिक रीढ़ तोड़नी शुरू कर दी है। लगातार हो रहे एनकाउंटर, आधुनिक तकनीक से निगरानी और नक्सलियों के आत्मसमर्पण ने जंगल की तस्वीर बदल दी है।
अब ठेकेदार और कारोबारी भी पहले की तरह आसानी से डर नहीं रहे। पुलिस सत्यापन और जांच के बाद यह साफ हो रहा है कि कई धमकी भरे कॉल और पत्र सिर्फ फर्जी गैंगों की करतूत थे।

क्रांति” के नाम पर अपराध का साम्राज्य

स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ अपराधियों ने नक्सलवाद को विचारधारा नहीं, बल्कि “धंधा” बना लिया था। लाल आतंक का डर दिखाकर ये लोग गांवों से लेकर खदान क्षेत्रों तक अपनी पकड़ बनाए हुए थे।
कई मामलों में देखा गया कि जिन लोगों का नक्सल संगठन से कोई लेना-देना नहीं था, वे भी “एरिया कमांडर” और “दस्ता सदस्य” बनकर लोगों को धमका रहे थे। इससे आम जनता में दहशत का माहौल बना रहता था।

नक्सल सफाये के साथ अपराधियों पर भी शिकंजा जरूरी

क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि सिर्फ नक्सलियों का सफाया काफी नहीं है। उन सफेदपोश और आपराधिक चेहरों पर भी कार्रवाई जरूरी है, जिन्होंने वर्षों तक नक्सलवाद की आड़ में काली कमाई की।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ऐसे फर्जी उगाही नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त किया जाए, ताकि जंगलों में भय नहीं बल्कि विकास की पहचान बने।

बदलते सारंडा की नई तस्वीर

कभी गोलियों और धमकियों से दहशत में जीने वाला सारंडा अब धीरे-धीरे विकास, सड़क, रोजगार और पर्यटन की ओर बढ़ रहा है। यही बदलाव उन अपराधियों को सबसे ज्यादा बेचैन कर रहा है, जिनकी रोजी-रोटी डर और बंदूक की छाया पर टिकी हुई थी।
जंगल से नक्सल नेटवर्क खत्म होने का मतलब सिर्फ सुरक्षा बहाली नहीं, बल्कि उस पूरे “भय उद्योग” का अंत भी है, जिसने वर्षों तक कोल्हान और सारंडा की पहचान को बदनाम किया।

SINGHBHUMHALCHAL NEWS

सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

Join WhatsApp

Join Now

Leave a Comment