किरीबुरू और गुवा में अलग-अलग कार्यक्रमों में दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि, विश्व आदिवासी दिवस की तैयारियों पर भी हुई चर्चा
किरीबुरू : वारंग क्षिति लिपि के जनक को दी श्रद्धांजलि
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
आदिवासी समाज की भाषा, संस्कृति और पहचान को नई दिशा देने वाले महान साहित्यकार एवं वारंग क्षिति लिपि के अन्वेषक लाको बोदरा की 40वीं पुण्यतिथि पर आदिवासी कल्याण केन्द्र किरीबुरू परिसर में भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

वक्ताओं ने कहा कि ओत गुरु लाको बोदरा ने आदिवासी हो भाषा को पहचान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने वर्ष 1940 में वारंग क्षिति लिपि की खोज कर उसे समाज के बीच स्थापित किया, जिससे हो समाज को अपनी अलग भाषाई पहचान मिली। उनके इस योगदान को आदिवासी समाज आज भी बड़े गर्व और सम्मान के साथ याद करता है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि लाको बोदरा का जीवन केवल भाषा और साहित्य तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने आदिवासी समाज के सामाजिक उत्थान और सांस्कृतिक जागरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज उनकी विचारधारा नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।
इस मौके पर आदिवासी कल्याण केन्द्र किरीबुरू के सहसचिव सतीश कुमार बोयपाई, सहकोषाध्यक्ष बलभद्र बिरुली, आदिवासी कल्याण केन्द्र मेघाहातुबुरू के संगठन सचिव बीरबल गुड़िया, कोषाध्यक्ष सेरगेया अंगारिया, प्रॉस्पेक्टिंग इकाई के उपाध्यक्ष माधव चन्द्र कोड़ा, आदिवासी हो समाज युवा महासभा केंद्रीय समिति के संगठन सचिव गोपी लागुरी, श्याम बिरुवा, प्रदीप चतर, आजाद सिंकु, सिकन्दर बोयपाई एवं संजीव चंपिया समेत कई लोग मौजूद थे।
गुवा : फुटबॉल मैदान में सादगीपूर्ण माहौल में मनाई गई पुण्यतिथि
रिपोर्ट: संदीप गुप्ता
गुवा के गुवासाई फुटबॉल मैदान में सोमवार देर शाम वारंग क्षिति लिपि के जनक लाको बोदरा की 40वीं पुण्यतिथि श्रद्धा और सादगी के साथ मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता गुवासाई के देवरी सुशील पूर्ति ने की।
इस अवसर पर वक्ताओं ने ओत गुरु कोल लाको बोदरा के जीवन, संघर्ष और उनके सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लाको बोदरा ने आदिवासी समाज की भाषा, लिपि और परंपराओं को संरक्षित करने के लिए जो कार्य किए, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर हैं।

वक्ताओं ने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी मातृभाषा, संस्कृति और परंपराओं को बचाने के लिए आगे आएं और ओत गुरु के सपनों को साकार करें। उन्होंने कहा कि अगर समाज अपनी भाषा और लिपि को भूल गया तो उसकी पहचान भी कमजोर हो जाएगी।
पुण्यतिथि कार्यक्रम के उपरांत आगामी विश्व आदिवासी दिवस की तैयारियों को लेकर एक बैठक भी आयोजित की गई। बैठक में निर्णय लिया गया कि इस वर्ष 9 अगस्त को घर-घर जाकर लोगों को जागरूक किया जाएगा और आदिवासी समाज की संस्कृति, भाषा एवं परंपराओं के संरक्षण का संदेश फैलाया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझ सके और उसे संजो कर रखे।
इस कार्यक्रम में देवरी सुशील पूर्ति, सारंडा पीढ़ मानकी सुरेश चाम्पिया, लंकेश पूर्ति, अजय लकड़ा, मंगलदास पूर्ति, मंगल बिरुवा, चांदमनी लागुरी, जानों चातर सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।














