डॉक्टरों की कमी, रेफरल में मनमानी और ठेका मजदूरों की उपेक्षा पर झारखंड मजदूर संघर्ष संघ ने सौंपा मांग पत्र
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
झारखंड मजदूर संघर्ष संघ, मेघाहातुबुरु इकाई के महासचिव अफताब आलम ने अपने यूनियन सदस्यों इंतखाब आलम, दयानंद कुमार, शहनाज, चंद्रकला पान, आनंद हेस्सा पूर्ति, अमित राउत आदि साथ सेल की मेघाहातुबुरु खदान का निरीक्षण करने पहुंचे Steel Authority of India Limited के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक Dr. Ashok Kumar Panda से मुलाकात की। इस दौरान यूनियन की ओर से भगवान बुद्ध की प्रतिमा एवं पौधा भेंट कर उनका स्वागत किया गया और क्षेत्र की गंभीर समस्याओं से संबंधित एक विस्तृत मांग पत्र सौंपा गया।
यूनियन ने साफ शब्दों में कहा कि मजदूरों और उनके आश्रितों की बुनियादी सुविधाएं लगातार बदहाल हो रही हैं और अब यह स्थिति चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है।

अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी, इलाज व्यवस्था ठप
यूनियन ने अपने पत्र में सबसे प्रमुख मुद्दा किरीबुरू जनरल अस्पताल की बदहाल चिकित्सा व्यवस्था को बताया। कहा गया कि यह अस्पताल पूरे क्षेत्र का रेफरल सेंटर है, जहां सेल कर्मियों, उनके आश्रितों और स्थानीय नागरिकों का इलाज होता है। लेकिन डॉक्टरों की भारी कमी के कारण यहां स्वास्थ्य सेवाएं लगभग ठप हो चुकी हैं।
संघ ने मांग की कि अस्पताल में तत्काल योग्य चिकित्सकों की नियुक्ति की जाए, ताकि मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके।
रेफरल प्रक्रिया में जटिलता बनी कर्मचारियों की मुसीबत
मांग पत्र में कहा गया कि जब तक अस्पताल में डॉक्टरों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं हो जाती, तब तक कर्मियों और उनके परिवारों को सूचीबद्ध अस्पतालों में रेफर करने की प्रक्रिया सरल बनाई जाए।
यूनियन का आरोप है कि वर्तमान में रेफरल डॉक्टरों की व्यक्तिगत इच्छा पर निर्भर हो गया है, जो चिकित्सा नैतिकता के खिलाफ है। इससे गंभीर मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल रहा।
दो लाख की सीमा हटे, ‘ठीक होने तक इलाज’ नीति हो बहाल
संघ ने इलाज के दौरान लागू दो लाख रुपये की सीमा को समाप्त करने की मांग की है। यूनियन ने कहा कि पहले “जब तक मरीज ठीक न हो जाए” तब तक इलाज की सुविधा मिलती थी, लेकिन नई व्यवस्था ने मरीजों और उनके परिवारों को आर्थिक और मानसिक संकट में डाल दिया है।
मजदूर नेताओं का कहना है कि बीमारी पैसे देखकर नहीं आती, इसलिए इलाज पर सीमा तय करना अमानवीय है।

आपातकाल में तुरंत रेफरल की हो व्यवस्था
यूनियन ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए कहा कि छुट्टी पर रहने वाले कर्मचारियों के साथ अगर कोई दुर्घटना हो जाए या उन्हें अचानक गंभीर बीमारी हो जाए तो तत्काल रेफरल लेटर की सुविधा मिलनी चाहिए।
संघ ने बताया कि आरएमडी काल में यह सुविधा उपलब्ध थी, लेकिन अब इसे समाप्त कर दिया गया है। इसे पुनः बहाल करने की मांग की गई।

ठेका मजदूरों के लिए भी स्वास्थ्य सुविधा की मांग
संघ ने ठेका मजदूरों के हितों को भी प्रमुखता से उठाया। कहा गया कि ठेका मजदूर नियमित कर्मचारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उत्पादन में योगदान देते हैं, लेकिन उन्हें समान चिकित्सा सुविधा नहीं मिलती।
यूनियन ने इसे अन्यायपूर्ण बताते हुए ठेका मजदूरों को भी स्वास्थ्य सुविधाओं के दायरे में लाने की मांग की।
अल्ट्रासाउंड मशीन धूल फांक रही, टेक्नीशियन नहीं
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि किरीबुरू अस्पताल में अल्ट्रासोनोग्राफी मशीन उपलब्ध है, लेकिन तकनीशियन की कमी के कारण वह वर्षों से निष्क्रिय पड़ी है।
संघ ने कहा कि लाखों रुपये की मशीन बेकार पड़ी रहना प्रबंधन की लापरवाही को दर्शाता है।
लैब रिपोर्ट की गुणवत्ता पर सवाल, अपग्रेड की जरूरत
मजदूर नेताओं ने अस्पताल की लैब व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि इलाज की बुनियाद सही जांच रिपोर्ट होती है, लेकिन वर्तमान लैब व्यवस्था उच्च स्तर की नहीं है।
गलत रिपोर्ट के आधार पर गलत इलाज का खतरा बना रहता है। इसलिए लैब को आधुनिक और उन्नत तकनीक से लैस करने की मांग की गई।
मैनपावर की कमी से बढ़ रहा काम का दबाव
संघ ने कहा कि खदानों में कर्मचारियों की कमी के कारण मौजूदा कर्मियों पर काम का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इससे उत्पादन प्रभावित होने के साथ-साथ कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
यूनियन ने नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की मांग रखी।

“मजदूरों की समस्याएं वास्तविक हैं, जल्द हो कार्रवाई”
अफताब आलम ने कहा कि यूनियन द्वारा उठाए गए सभी मुद्दे जमीनी हकीकत पर आधारित हैं और पूरी तरह जायज हैं। उन्होंने नई दिल्ली स्थित सेल प्रबंधन से इन मांगों पर शीघ्र कार्रवाई करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि मजदूरों की जान और स्वास्थ्य के साथ समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। अब समय आ गया है कि प्रबंधन इन गंभीर मुद्दों पर संवेदनशीलता दिखाए और त्वरित निर्णय ले।















