इको टूरिज्म के नाम पर तालाब की खुदाई से बढ़ा जोखिम, सुरक्षा के नाम पर नहीं है कोई इंतजाम
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
किरीबुरू शहर के बीच स्थित लेक गार्डन तालाब में की गई गहरी खुदाई अब लोगों के लिए जानलेवा खतरा बनती जा रही है। तालाब के बीचों-बीच लगभग 8 से 10 फीट गहरा तथा करीब 40×40 फीट क्षेत्रफल का गड्ढा बना दिया गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह खुदाई वन विभाग अथवा वन विभाग के अधीन कार्य कर रही ठेका एजेंसी द्वारा कराई गई है। सबसे गंभीर बात यह है कि इतने बड़े और गहरे गड्ढे के बावजूद वहां न तो कोई सुरक्षा घेरा बनाया गया है और न ही किसी प्रकार का चेतावनी बोर्ड लगाया गया है।

इको टूरिज्म परियोजना के लिए निकाली जा रही है मिट्टी
जानकारी के अनुसार, वन विभाग सारंडा में इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लेक गार्डन के सामने मंगलाहाट की पहाड़ी तथा वन विभाग कार्यालय के नीचे की पहाड़ी पर क्रमशः 6 और 10 कमरों वाले आधुनिक कॉटेज का निर्माण करा रहा है। बताया जा रहा है कि इन परियोजनाओं में भराई के लिए आवश्यक मिट्टी इसी तालाब से जेसीबी मशीन द्वारा निकाली जा रही है। लगातार खुदाई के कारण तालाब के भीतर ही एक नया और अत्यंत गहरा तालाबनुमा गड्ढा बन गया है।
बरसात में बढ़ा खतरा, पहचानना होगा मुश्किल
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले इस हिस्से में पानी अपेक्षाकृत कम रहता था। बच्चे, महिलाएं और ग्रामीण वर्षों से यहां मछली, घोंघा और केकड़ा पकड़ने आते रहे हैं। उन्हें तालाब की गहराई का अनुमान रहता था। लेकिन अब बरसात के दौरान पूरा तालाब पानी से भर जाने पर यह नया गहरा गड्ढा दिखाई नहीं देगा। ऐसे में जो लोग तैरना नहीं जानते, उनके अचानक गहरे पानी में चले जाने का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
हर दिन जान जोखिम में डाल रहे हैं बच्चे
ग्रामीणों के अनुसार, प्रतिदिन कई बच्चे इस तालाब में नहाने और मछली पकड़ने पहुंचते हैं। उन्हें इस नए गहरे हिस्से की जानकारी नहीं होती। यदि कोई बच्चा या ग्रामीण अचानक इस गहरे गड्ढे में चला जाए तो उसके डूबने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सुरक्षा के उपाय नहीं किए गए तो कभी भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है।
सुरक्षा के नाम पर कुछ भी नहीं
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी गहरी खुदाई के बाद भी वन विभाग या संबंधित ठेकेदार द्वारा न तो बैरिकेडिंग कराई गई, न चेतावनी बोर्ड लगाए गए और न ही आम लोगों के प्रवेश पर कोई रोक लगाई गई। इससे स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी है।
दुर्घटना हुई तो जिम्मेदार कौन होगा?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि भविष्य में इस गहरे पानी में किसी बच्चे या ग्रामीण की डूबने से मौत होती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या इसके लिए वन विभाग जिम्मेदार होगा, ठेकेदार या फिर संबंधित प्रशासनिक अधिकारी? लोगों का कहना है कि ऐसी स्थिति में जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

डोभा दुर्घटनाओं से नहीं लिया गया सबक?
ग्रामीणों का कहना है कि झारखंड में पूर्व में विभिन्न योजनाओं के तहत हजारों डोभा खोदे गए थे, जिनमें डूबने से कई बच्चों और ग्रामीणों की मौत की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इसके बावजूद सार्वजनिक स्थल पर इस प्रकार का गहरा गड्ढा बनाकर उसे असुरक्षित छोड़ देना गंभीर लापरवाही माना जा रहा है।
प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों ने वन विभाग, जिला प्रशासन और पुलिस से मांग की है कि संभावित दुर्घटना को रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से गहरे हिस्से की बैरिकेडिंग कराई जाए, चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं तथा आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। लोगों का कहना है कि किसी मासूम की जान जाने के बाद कार्रवाई करने से बेहतर है कि समय रहते खतरे को खत्म किया जाए।














