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महारत्न सेल के मजदूरों की मेहनत का ‘इनाम’! ड्यूटी में पहनते ही फट रहा रेनकोट

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गुवा सेल प्रबंधन पर घटिया रेनकोट खरीद में भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप, 1200 श्रमिकों में आक्रोश

झारखंड मजदूर संघर्ष संघ ने मांगी उच्चस्तरीय जांच, दोषी अधिकारियों पर निलंबन-बर्खास्तगी की कार्रवाई की चेतावनी

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

गुवा। जिस श्रमिक के खून-पसीने से यानी सेल को महारत्न कंपनी का दर्जा मिला, आज वही श्रमिक बारिश से बचने के लिए प्रबंधन से मिले रेनकोट की गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े करने को मजबूर हैं। गुवा सेल प्रबंधन द्वारा सेल कर्मियों और सप्लाई मजदूरों को वर्षा से बचाव के लिए उपलब्ध कराया गया रेनकोट पहनते ही जगह-जगह से फटने का मामला सामने आया है। रेनकोट की यह स्थिति देख श्रमिकों में भारी नाराजगी और आक्रोश व्याप्त है।

बारिश से बचाने के बजाय खुद दे रहा धोखा

श्रमिकों का कहना है कि खदान और प्लांट क्षेत्र में बारिश के दौरान ड्यूटी करना पहले से ही चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में बारिश से बचाव के लिए दिए गए रेनकोट से सुरक्षा की उम्मीद थी। लेकिन रेनकोट पहनने के साथ ही उसके फटने की शिकायत सामने आने लगी। कहीं सिलाई उधड़ रही है तो कहीं कपड़ा फट जा रहा है।

श्रमिकों के लिए यह महज एक रेनकोट के खराब होने का मामला नहीं है, बल्कि यह उनकी सुरक्षा और उनके प्रति प्रबंधन की गंभीरता पर सवाल खड़ा कर रहा है।

खून-पसीना श्रमिकों का, सुविधा के नाम पर फटा रेनकोट!

झारखंड मजदूर संघर्ष संघ के केंद्रीय अध्यक्ष रामा पाण्डे ने इस मामले को गंभीर बताते हुए सेल गुवा प्रबंधन पर रेनकोट की खरीद में भारी भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सेल को महारत्न कंपनी का दर्जा यूं ही नहीं मिला है। इसके पीछे देशभर के सेल संयंत्रों और खदानों में काम करने वाले लाखों श्रमिकों की वर्षों की मेहनत, संघर्ष, जोखिम और खून-पसीना शामिल है।

उन्होंने कहा कि श्रमिक अपनी जान जोखिम में डालकर लौह अयस्क निकालते हैं, उत्पादन बढ़ाते हैं और कंपनी की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं। लेकिन जब उन्हीं श्रमिकों को बारिश से बचाने की बारी आती है तो ऐसा रेनकोट दिया जाता है, जो पहनते ही फटने लगे। इससे अधिक विडंबना और क्या हो सकती है।

‘महारत्न’ कंपनी में ऐसी खरीद पर उठे सवाल

रामा पाण्डे ने आरोप लगाया कि रेनकोट की खरीद में गुणवत्ता की अनदेखी की गई है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि रेनकोट निर्धारित गुणवत्ता के मानकों के अनुरूप खरीदे गए थे, तो वे श्रमिकों के इस्तेमाल में आते ही फट क्यों रहे हैं?

उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले की जांच केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। रेनकोट की खरीद प्रक्रिया, टेंडर, सप्लायर, गुणवत्ता जांच और भुगतान से जुड़े तमाम दस्तावेजों की जांच होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आखिर किस स्तर पर लापरवाही हुई।

1200 श्रमिकों की सुरक्षा से जुड़ा मामला

रामा पाण्डे के अनुसार करीब 1200 श्रमिकों को रेनकोट उपलब्ध कराया गया है। संगठन की मांग है कि सभी रेनकोट को तत्काल वापस मंगाया जाए और उनकी गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि रेनकोट मानक के अनुरूप नहीं पाए जाते हैं तो श्रमिकों को बेहतर गुणवत्ता वाले नए रेनकोट उपलब्ध कराए जाएं।

रामा पाण्डे ने कहा कि श्रमिकों को कोई एहसान नहीं चाहिए। वे कंपनी के उत्पादन में अपना योगदान देते हैं और बदले में उन्हें सुरक्षित कार्य वातावरण तथा जरूरी सुरक्षा उपकरण मिलना उनका अधिकार है।

दोषी अधिकारियों पर हो कड़ी कार्रवाई

झारखंड मजदूर संघर्ष संघ ने रेनकोट खरीद मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। संगठन का कहना है कि यदि जांच में खरीद प्रक्रिया में अनियमितता, लापरवाही या भ्रष्टाचार सामने आता है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ निलंबन से लेकर बर्खास्तगी तक की कार्रवाई होनी चाहिए।

संघ का आरोप है कि श्रमिकों की सुरक्षा से जुड़े उपकरणों में यदि गुणवत्ता से समझौता किया गया है तो यह सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि गंभीर मामला है। ऐसे मामलों में जिम्मेदारी तय किए बिना व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है।

‘श्रमिकों की मेहनत का यही सम्मान है?’

रेनकोट को लेकर उठे विवाद ने श्रमिकों के बीच एक भावनात्मक सवाल भी खड़ा कर दिया है—जिस कंपनी को ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए मजदूरों ने अपना जीवन खपा दिया, क्या उनकी सुरक्षा के बदले उन्हें ऐसा घटिया रेनकोट मिलना ही उनकी मेहनत का सम्मान है?

दिन-रात खदानों में कठिन परिस्थितियों में काम करने वाला श्रमिक बारिश, धूप, धूल और जोखिम के बीच उत्पादन जारी रखता है। उसकी मेहनत से कंपनी का उत्पादन और मुनाफा बढ़ता है। लेकिन जब उसी श्रमिक को बारिश से बचाने के लिए दिया गया सुरक्षा उपकरण पहली ही बारिश में जवाब देने लगे तो स्वाभाविक रूप से उसके मन में उपेक्षा और आक्रोश पैदा होना लाजिमी है।

अब चुप नहीं बैठेंगे श्रमिक

रामा पाण्डे ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि रेनकोट वापस लेकर श्रमिकों को बेहतर गुणवत्ता के रेनकोट उपलब्ध नहीं कराए गए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो श्रमिक संगठन आंदोलन का रास्ता अपनाएगा।

उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ी तो मामले की शिकायत सेल के चेयरमैन और केंद्रीय इस्पात मंत्री तक की जाएगी तथा उच्चस्तरीय जांच की मांग की जाएगी।

आंदोलन की चेतावनी से प्रबंधन पर बढ़ा दबाव

संघ के इस रुख के बाद गुवा सेल प्रबंधन के सामने अब सबसे बड़ा सवाल श्रमिकों की नाराजगी दूर करने और उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करने का है। मामला केवल रेनकोट के फटने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसकी गुणवत्ता, खरीद प्रक्रिया और जिम्मेदारी तय करने की मांग तक पहुंच चुका है।

श्रमिकों का कहना है कि बारिश में ड्यूटी करने वाले कर्मचारियों के लिए रेनकोट कोई विलासिता नहीं, बल्कि जरूरी सुरक्षा उपकरण है। यदि यही उपकरण उपयोग के दौरान फट जाए तो यह श्रमिकों को बारिश से नहीं बचा सकता।

अब देखना होगा कि गुवा सेल प्रबंधन इस गंभीर शिकायत पर क्या कदम उठाता है—क्या खराब रेनकोट वापस लेकर श्रमिकों को गुणवत्तापूर्ण रेनकोट दिए जाते हैं, या फिर श्रमिकों को अपने अधिकार और सुरक्षा के लिए आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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