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ग्रामीणों की सड़क बनी ‘अयस्क ढुलाई’ का रास्ता, मीना बाजार–पोंगा मार्ग गड्ढों में तब्दील!

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करोड़ों की सड़क का दावा कागजों में, भारी मालवाहक वाहनों ने सारंडा की लाइफलाइन को किया जर्जर

रोज खतरे में ग्रामीणों की जिंदगी, हादसे के बाद भी नहीं चेता तंत्र

रिपोर्ट शैलेश सिंह 

सारंडा। सारंडा के मीना बाजार से पोंगा तक जाने वाली ग्रामीण सड़क इन दिनों अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रही है। जिस सड़क का निर्माण प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सारंडा के ग्रामीणों को प्रखंड, अनुमंडल, थाना, हाट-बाजार, अस्पताल और जिला मुख्यालय से जोड़ने के उद्देश्य से किया गया था, वही सड़क वर्षों से भारी मालवाहक वाहनों की आवाजाही का बोझ झेलते-झेलते अब जगह-जगह टूटकर गड्ढों में तब्दील होती जा रही है।

ग्रामीणों का आरोप है कि सेल की मनोहरपुर ओर माइंस (चिड़िया खदान) से लगातार होने वाली लौह अयस्क ढुलाई ने इस ग्रामीण सड़क की कमर तोड़ दी है। सड़क की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि पैदल, बाइक और छोटे वाहनों से आवागमन भी ग्रामीणों के लिए परेशानी और खतरे का सबब बन गया है।

जिस सड़क पर ग्रामीणों का हक, वहां भारी वाहनों का कब्जा

ग्रामीणों के अनुसार यह सड़क मूल रूप से ग्रामीण आवागमन की सुविधा के लिए बनाई गई थी। लेकिन वर्षों से इस पर भारी मालवाहक वाहनों का निरंतर परिचालन हो रहा है। भारी वाहनों के दबाव और लगातार आवाजाही के कारण सड़क की ऊपरी सतह टूट चुकी है तथा जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि एक ओर सड़क निर्माण ग्रामीणों की सुविधा के लिए किया गया, वहीं दूसरी ओर उसी सड़क का इस्तेमाल भारी औद्योगिक परिवहन के लिए होने लगा। ऐसे में सड़क की मौजूदा स्थिति ने सरकारी योजना के उद्देश्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

फॉरेस्ट रोड बंद हुआ तो ग्रामीण सड़क पर आया अयस्क परिवहन

बताया जाता है कि पहले लौह अयस्क की ढुलाई फॉरेस्ट रोड के माध्यम से होती थी। बाद में वन विभाग द्वारा अपनी सड़क पर अयस्क ढुलाई बंद किए जाने के बाद समस्या बढ़ी। ग्रामीणों ने भी अपनी ग्रामीण सड़क पर भारी वाहनों से अयस्क ढुलाई का विरोध किया था और इसे रोकने की मांग उठाई थी।

इसके बाद पथ निर्माण विभाग, सेल प्रबंधन, संबंधित ठेका कंपनी और ग्रामीण प्रतिनिधियों के बीच बैठक हुई। ग्रामीणों के अनुसार बैठक में यह सहमति बनी थी कि भारी मालवाहक वाहनों के परिचालन के अनुरूप सड़क को मजबूत बनाया जाएगा और इसके लिए सेल प्रबंधन संबंधित विभाग को करोड़ों रुपये उपलब्ध कराएगा।

सहमति हुई, लेकिन सड़क निर्माण आज भी अधर में

ग्रामीणों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि बैठक में करोड़ों रुपये की व्यवस्था और सड़क को मजबूत बनाने की बात हुई थी, लेकिन आज तक सड़क की स्थिति सुधारने की दिशा में अपेक्षित काम क्यों नहीं हुआ?

ग्रामीणों का आरोप है कि अयस्क ढुलाई लगातार जारी है, लेकिन सड़क की मरम्मत और मजबूती का काम जमीन पर नजर नहीं आ रहा। नतीजा यह है कि जिस सड़क से भारी वाहन लगातार गुजर रहे हैं, वही सड़क अब सामान्य ग्रामीण वाहनों के लिए भी मुश्किल बनती जा रही है।

रोज मंडरा रहा हादसे का खतरा

जर्जर सड़क और भारी मालवाहक वाहनों की लगातार आवाजाही ने दुर्घटना का खतरा भी बढ़ा दिया है। सड़क के कई हिस्सों में गड्ढों के कारण छोटे वाहनों और दोपहिया चालकों को भारी वाहनों के बीच से निकलना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की मौजूदा हालत किसी बड़े हादसे को न्योता दे रही है।

कुछ माह पूर्व एक ग्रामीण चिकित्सक की मालवाहक वाहन की चपेट में आने से मौत ने इस खतरे को और गंभीर बना दिया था। घटना के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने घंटों मुख्य सड़क को जाम कर दिया था और अयस्क ढुलाई भी रोक दी थी।

हादसे के बाद भी सवाल जस का तस

ग्रामीण चिकित्सक की मौत के बाद ग्रामीणों में यह उम्मीद जगी थी कि प्रशासन, सेल प्रबंधन और संबंधित विभाग सड़क तथा भारी वाहनों के परिचालन को लेकर ठोस कदम उठाएंगे। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि समय बीतने के बावजूद मूल समस्या जस की तस बनी हुई है।

उनका सवाल है कि जब सड़क पर औद्योगिक परिवहन हो रहा है तो उसकी मजबूती और नियमित रखरखाव की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?

रोजगार का वादा भी अधूरा!

ग्रामीणों की नाराजगी केवल सड़क की बदहाली तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार अयस्क ढुलाई से प्रभावित गांवों के बेरोजगार युवाओं को खदान में रोजगार उपलब्ध कराने की बात भी सामने आई थी, लेकिन आज तक प्रभावित ग्रामीणों को अपेक्षित रोजगार नहीं मिल पाया।

ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ उनकी सड़क टूट रही है, दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को रोजगार का लाभ नहीं मिल रहा। ऐसे में अयस्क परिवहन से उन्हें आखिर क्या हासिल हो रहा है?

ग्रामीणों का दो टूक सवाल—पहले सड़क, फिर ढुलाई

ग्रामीणों ने मांग की है कि मीना बाजार से पोंगा तक सड़क की तत्काल उच्चस्तरीय जांच कराकर इसकी मजबूती और मरम्मत का काम कराया जाए। साथ ही भारी मालवाहक वाहनों के परिचालन को सड़क की क्षमता के अनुरूप नियंत्रित किया जाए।

ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि अयस्क ढुलाई के कारण यदि ग्रामीण सड़क बर्बाद हो रही है तो उसके पुनर्निर्माण और रखरखाव की ठोस जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

सारंडा के ग्रामीण अब यह सवाल उठा रहे हैं कि बैठकों में हुए समझौते और करोड़ों रुपये की प्रस्तावित व्यवस्था का क्या हुआ? सड़क कब बनेगी? प्रभावित गांवों के बेरोजगारों को रोजगार कब मिलेगा? और किसी अगले हादसे से पहले जिम्मेदार विभाग आखिर कब जागेगा?

इन सवालों का जवाब अब ग्रामीण प्रशासन, पथ निर्माण विभाग और सेल प्रबंधन से मांग रहे हैं।

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सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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