वन विभाग की नामजद शिकायत पर शाहबाज का पलटवार—साजिश के तहत फंसाने का आरोप
रिपोर्ट शैलेश सिंह
जोजो कैंप। टाटा स्टील के लीज क्षेत्र से सटे एमएन घोष हाटिंग के समीप जोजो कैंप स्थित वर्षों से बंद खिरवाल माइंस में कथित बड़े पैमाने पर लौह अयस्क की अवैध खुदाई और चोरी का मामला अब नया मोड़ ले चुका है। वन विभाग के अनुसार खदान से करीब 39,984 सीएफटी लौह अयस्क की अवैध खुदाई किए जाने का आकलन किया गया है। मामले में जिस शाहबाज के खिलाफ नामजद शिकायत किए जाने की बात सामने आई है, उसने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

शाहबाज का दावा—“चोरी से मेरा दूर-दूर तक संबंध नहीं”
शाहबाज ने कहा कि उक्त खदान से अयस्क चोरी की घटना में उसका स्वयं या उसके किसी साथी का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। उसने दावा किया कि अयस्क तस्करी अथवा अवैध खनन में वर्तमान समय में उसका कहीं कोई हाथ या गतिविधि नहीं है।
उसका कहना है कि यदि वन विभाग को कोई पोकलेन मशीन संदिग्ध स्थिति में मिली है तो उसे जब्त कर उसकी जांच और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल संदेह के आधार पर उसका नाम मामले में जोड़ना उचित नहीं है।
“साजिश के तहत मेरा नाम घसीटा जा रहा”
शाहबाज ने आरोप लगाया कि उसका नाम एक साजिश के तहत इस मामले में फंसाया जा रहा है। उसने वन विभाग से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और वास्तविक दोषियों की पहचान कर कार्रवाई करने की मांग की है।
तीन हाइवा सामने से निकले, फिर सवालों की बौछार
मामले में वन विभाग के अनुसार गुप्त सूचना पर टीम गृह रक्षा वाहिनी के जवानों के साथ जोजो कैंप पहुंची थी। टीम को देखते ही कथित रूप से तीन हाइवा में लदा अयस्क रास्ते में गिराकर चालक वाहन लेकर फरार हो गए।
यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है। यदि वन विभाग की टीम मौके पर मौजूद थी तो तीन हाइवा के चालक आखिर किस तरह वहां से भाग निकले? क्या वाहनों की पहचान की गई? क्या उनके नंबर दर्ज किए गए? क्या उनका पीछा किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण—यदि खदान में भारी मशीनों से लगातार खुदाई चल रही थी, तो इसकी जानकारी संबंधित निगरानी तंत्र को पहले क्यों नहीं मिली?
112 फीट का गड्ढा, 39,984 सीएफटी अयस्क चोरी का आकलन
सोमवार को वन विभाग ने खदान की मापी की। विभाग के अनुसार करीब 112 फीट लंबा, 21 फीट चौड़ा और 17 फीट गहरा गड्ढा मिला। इसी आधार पर करीब 39,984 सीएफटी लौह अयस्क की अवैध खुदाई का आकलन किया गया है।
पहले 20 हजार टन चोरी का भी मामला
बताया गया है कि इसी स्थान से पूर्व में भी करीब 20 हजार टन लौह अयस्क चोरी होने का मामला सामने आया था। ऐसे में सवाल सिर्फ एक रात की कथित चोरी तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि आखिर बंद खदान में लंबे समय से अयस्क की अवैध खुदाई और निकासी किसके संरक्षण या नेटवर्क के जरिए होती रही?
वन विभाग, खनन विभाग और टास्क फोर्स की निगरानी पर सवाल
हजारों टन अयस्क की चोरी के आरोप और भारी मशीनों के इस्तेमाल की बात सामने आने के बाद वन विभाग, खनन विभाग, जिला टास्क फोर्स और स्थानीय पुलिस की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
यदि आरोप सही हैं, तो इतनी बड़ी मात्रा में अयस्क निकालने के लिए मशीनें पहुंचीं, खदान में गहरी खुदाई हुई, अयस्क हाइवा में लादा गया और परिवहन की कोशिश हुई—फिर संबंधित विभागों को इसकी भनक आखिर कब लगी?
“अयस्क गया कहां?”—जांच का सबसे बड़ा सवाल
अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि शाहबाज का दावा है कि उसका और उसके साथियों का इस चोरी से कोई संबंध नहीं है, तो आखिर हजारों टन अयस्क किसने निकाला?
अयस्क कहां से निकाला गया, किसने मशीनें लगाईं, किसने हाइवा उपलब्ध कराए, अयस्क कहां ले जाने की तैयारी थी और इस पूरे नेटवर्क में कौन-कौन शामिल था—इन सवालों का जवाब केवल मौके की प्राथमिकी से नहीं, बल्कि विस्तृत जांच से ही सामने आ सकता है।
ऊंचस्तरीय जांच से ही खुलेगा पूरा खेल
मामले में एक ओर वन विभाग द्वारा प्राथमिकी की कार्रवाई की बात सामने आ रही है, वहीं नामजद बताए जा रहे शाहबाज ने खुद को निर्दोष बताते हुए आरोपों से पल्ला झाड़ लिया है। ऐसे में किसका दावा सही है और वास्तविक दोषी कौन हैं, इसका फैसला निष्पक्ष जांच के बाद ही संभव है।
फिलहाल बंद खदान से कथित अयस्क चोरी का मामला कई सवाल छोड़ गया है—मशीन किसकी थी? अयस्क किसने निकाला? हाइवा किसके थे? चालक कौन थे? अयस्क कहां जाना था और इतनी बड़ी गतिविधि की भनक जिम्मेदार विभागों को क्यों नहीं लगी?
इन सभी सवालों की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच ही इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकती है।











