पीड़ित का दावा– कोर्ट से रिलीज ऑर्डर मिलने के बावजूद वाहन देने से इनकार, ओपी प्रभारी पर मनमानी और आर्थिक शोषण के गंभीर आरोप
रिपोर्ट शैलेश सिंह
सारंडा/चिड़िया। सारंडा के चिड़िया ओपी क्षेत्र में पुलिस की कार्यशैली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। चिड़िया ओपी प्रभारी वाहिद अंसारी पर एक ग्रामीण ने आर्थिक शोषण, मनमानी और न्यायालय के आदेश की अनदेखी करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ित का दावा है कि न्यायालय से मोटरसाइकिल रिलीज करने का स्पष्ट आदेश मिलने के बावजूद ओपी प्रभारी वाहन छोड़ने को तैयार नहीं हैं और इसके एवज में 20 हजार रुपये की मांग कर रहे हैं।

कोर्ट का रिलीज ऑर्डर, फिर भी थाने से नहीं मिल रही बाइक!
चिड़िया निवासी सत्यम तांती के अनुसार, उनकी बजाज पल्सर मोटरसाइकिल (नंबर JH06U-3942) अप्रैल 2025 में एक दुर्घटना का शिकार हो गई थी। इस मामले में चिड़िया ओपी (मनोहरपुर थाना) में GR Case No. 112/2025 दर्ज हुआ था।
मामले में सुनवाई के बाद ACJM, चक्रधरपुर न्यायालय ने 21 अक्टूबर 2026 को मोटरसाइकिल रिलीज करने का आदेश जारी किया। सत्यम तांती का कहना है कि न्यायालय का आदेश पत्र लेकर वह लगातार चिड़िया ओपी प्रभारी वाहिद अंसारी के पास जा रहे हैं और अपनी मोटरसाइकिल सुपुर्द करने का आग्रह कर रहे हैं।
लेकिन पीड़ित के आरोप के मुताबिक, उन्हें हर बार कथित तौर पर यही जवाब दिया जा रहा है कि जब तक 20 हजार रुपये नहीं दोगे, मोटरसाइकिल थाने से नहीं छूटेगी। पीड़ित का कहना है कि न्यायालय के आदेश के बावजूद उन्हें अपने ही वाहन को प्राप्त करने के लिए परेशान किया जा रहा है।
नक्सलवाद के दौर से भी बदतर पुलिसिया व्यवहार?
सारंडा के ग्रामीणों में इस कथित कार्यशैली को लेकर नाराजगी बताई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब सारंडा क्षेत्र नक्सलवाद की गंभीर चुनौती से जूझ रहा था, तब भी पुलिस और ग्रामीणों के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिलता था।
ग्रामीणों के मुताबिक, उस दौर में तैनात ओपी प्रभारी और पुलिसकर्मी आम जनता तथा पीड़ितों के साथ मित्रवत व्यवहार करते थे। ग्रामीण अपनी समस्याएं लेकर पुलिस के पास जाते थे और उनके समाधान के लिए सहयोग मिलता था।
लेकिन वर्तमान ओपी प्रभारी के कार्यकाल को लेकर कुछ ग्रामीणों ने असंतोष जताते हुए आरोप लगाया है कि अब पुलिस-जनता के बीच सहयोग की जगह भय और आर्थिक दबाव का माहौल बनता जा रहा है।

हर दिन किसी न किसी ग्रामीण को परेशान करने का आरोप
क्षेत्र के कुछ लोगों का आरोप है कि चिड़िया ओपी में आम ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के बजाय उन्हें अनावश्यक रूप से परेशान किया जा रहा है। लोगों ने दबी जुबान में पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि ग्रामीणों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए भी परेशानी झेलनी पड़ रही है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन न्यायालय के आदेश के बावजूद वाहन रिलीज नहीं होने और 20 हजार रुपये मांगने के आरोप ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।
एसपी और पुलिस के वरीय अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग
अब सवाल यह उठता है कि यदि न्यायालय ने विधिवत वाहन रिलीज करने का आदेश जारी कर दिया है, तो पीड़ित को मोटरसाइकिल प्राप्त करने में परेशानी क्यों हो रही है? क्या न्यायालय के आदेश के अनुपालन में किसी प्रकार की कानूनी बाधा है? और यदि 20 हजार रुपये मांगने का आरोप सही है, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
ग्रामीणों ने पुलिस के वरीय अधिकारियों से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने, पीड़ित की मोटरसाइकिल न्यायालय के आदेश के अनुरूप रिलीज कराने तथा चिड़िया ओपी की कार्यशैली की समीक्षा करने की मांग की है।
कानून का राज स्थापित करने वाली पुलिस व्यवस्था में न्यायालय के आदेश का सम्मान और आम जनता के साथ निष्पक्ष व्यवहार सर्वोपरि होना चाहिए। यदि एक ग्रामीण को न्यायालय का आदेश मिलने के बाद भी अपना वाहन पाने के लिए कथित आर्थिक मांग का सामना करना पड़ता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि पुलिस की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल है।










