DC के आदेश पर DDC ने गठित किया जांच दल, सभी प्रखंडों में योजनाओं का होगा भौतिक सत्यापन; 15 दिनों में मांगी गई रिपोर्ट
DMFT सेल के PO-PMU, VBD कंसल्टेंट, ABF और फेलो तक को सौंपी गई जांच की जिम्मेदारी, जियो टैग फोटो के साथ देना होगा अद्यतन प्रतिवेदन
दिसंबर 2026 में योजनाओं को मिल सकती है स्वीकृति, नए साल में धरातल पर काम शुरू होने की उम्मीद
रिपोर्ट शैलेश सिंह
चाईबासा। पश्चिमी सिंहभूम जिले में DMFT (जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट) के तहत ग्रामसभा से पारित एवं जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा पर चयनित विकास योजनाओं को लेकर एक बार फिर प्रशासनिक स्तर पर बड़ी कवायद शुरू हुई है। ग्रामसभा की सहमति, माननीय जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा और संबंधित कार्यपालक अभियंताओं के भौतिक स्थल निरीक्षण के बाद चयनित योजनाओं की उपयोगिता एवं वास्तविक स्थिति जांचने के लिए अब नए सिरे से जांच दल का गठन किया गया है।
उपायुक्त के आदेश के आलोक में उप विकास आयुक्त (DDC) द्वारा जारी पत्र ने DMFT योजनाओं के चयन और तकनीकी सत्यापन की पूरी प्रक्रिया को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जिले के सभी प्रखंडों में चयनित कुल 277 योजनाओं का भौतिक सत्यापन कराया जाएगा। इसके लिए DMFT सेल में अनुबंध पर कार्यरत PO, PMU, VBD कंसल्टेंट, ABF और फेलो को भी जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अतिरिक्त विभिन्न विभागों के जिला स्तरीय पदाधिकारियों को भी जांच दल में शामिल किया गया है।

ग्रामसभा की मुहर के बाद भी योजनाओं की उपयोगिता पर दोबारा पड़ताल
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिन योजनाओं का चयन ग्रामसभा से पारित होने, जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा प्राप्त होने और संबंधित विभागों के स्तर पर प्रक्रिया पूरी होने के बाद किया गया, उनकी उपयोगिता और स्थल की वास्तविक स्थिति की दोबारा जांच की जरूरत क्यों पड़ी?
प्रशासनिक स्तर पर इस जांच का उद्देश्य योजनाओं को विकास एवं जनहित के अनुरूप सुनिश्चित करना बताया गया है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने योजना चयन से लेकर स्थल सत्यापन और तकनीकी आकलन तक की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यदि योजनाओं का चयन पहले ही ग्रामसभा की सहमति और जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा के आधार पर हुआ था, तो अब पुनः जांच के दौरान उनकी उपयोगिता, स्थल की स्थिति और प्रस्तावित कार्यों की जरूरत का नए सिरे से आकलन किन आधारों पर किया जाएगा, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
कार्यपालक अभियंताओं के स्थल निरीक्षण की विश्वसनीयता पर भी सवाल
इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू तकनीकी सत्यापन से जुड़ा है। सामान्यतः विकास योजनाओं के स्थल निरीक्षण, तकनीकी आकलन और प्राक्कलन तैयार करने में संबंधित विभागों के अभियंताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में योजनाओं के चयन के बाद दोबारा जांच दल गठित किए जाने से संबंधित कार्यपालक अभियंताओं के पूर्व के स्थल सत्यापन और भौतिक निरीक्षण की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
हालांकि प्रशासन ने इस पुनः जांच के पीछे किसी अधिकारी की लापरवाही या अनियमितता को लेकर कोई निष्कर्ष नहीं दिया है, लेकिन अब 277 योजनाओं की दोबारा पड़ताल से यह स्पष्ट होगा कि पूर्व में चयनित योजनाएं वास्तव में जनहित और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हैं या नहीं।
DMFT सेल से लेकर जिला स्तरीय अधिकारियों तक को मिली जिम्मेदारी
DDC द्वारा गठित जांच दल में DMFT सेल के PO, PMU, VBD कंसल्टेंट के साथ ABF और फेलो को भी शामिल किया गया है। वहीं जिला कृषि पदाधिकारी, जिला उद्यान पदाधिकारी, भूमि संरक्षण पदाधिकारी, LRDC, जिला खाद्य सुरक्षा पदाधिकारी और जिला कल्याण पदाधिकारी को भी योजनाओं की जांच का दायित्व सौंपा गया है।
जांच दल को अपने-अपने निर्धारित क्षेत्रों में योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता, स्थल की स्थिति और प्रस्तावित कार्यों की जरूरत का आकलन करना होगा। सभी 277 योजनाओं की जांच के बाद विस्तृत प्रतिवेदन प्रशासन को उपलब्ध कराना है।
15 दिनों में रिपोर्ट, जियो टैग फोटो भी अनिवार्य
उपायुक्त के निर्देश पर DDC द्वारा जारी पत्र में जांच दल को निर्धारित 15 दिनों के अंदर जांच प्रतिवेदन सौंपने का निर्देश दिया गया है। पूर्व की प्रक्रिया की तरह इस बार भी प्रत्येक योजना के संबंध में जियो टैग फोटो और स्थल की अद्यतन भौतिक स्थिति की रिपोर्ट उपलब्ध करानी होगी।
इससे प्रशासन को यह पता चल सकेगा कि प्रस्तावित योजना का स्थल वास्तविक रूप से उपयुक्त है या नहीं और वहां संबंधित कार्य की कितनी आवश्यकता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की स्वीकृति एवं प्राक्कलन तैयार करने की प्रक्रिया बढ़ाई जाएगी।
पांच कार्यकारी एजेंसियों को सौंपी जाएगी योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी
जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद चयनित एवं उपयुक्त पाई गई योजनाओं का प्राक्कलन तैयार करने और क्रियान्वयन के लिए विभिन्न विभागीय एजेंसियों को जिम्मेदारी दी गई है। इनमें ग्रामीण कार्य विभाग, चाईबासा प्रमंडल, ग्रामीण कार्य विभाग, चक्रधरपुर प्रमंडल, ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, लघु सिंचाई प्रमंडल तथा NREP चाईबासा शामिल हैं।
इन कार्यकारी एजेंसियों को जांच के आधार पर योजनाओं का प्राक्कलन तैयार कर आगे की प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति की प्रक्रिया में सहयोग करना होगा।
दिसंबर में स्वीकृति, नए साल में शुरू हो सकता है विकास कार्य
प्रशासन की इस पूरी कवायद के बाद अब जिले के विभिन्न प्रखंडों में चयनित 277 योजनाओं के भविष्य पर निगाहें टिकी हैं। यदि निर्धारित समय सीमा में जांच प्रतिवेदन प्राप्त हो जाता है और प्राक्कलन तैयार करने की प्रक्रिया समय पर पूरी होती है, तो दिसंबर 2026 के अंतिम महीने में इन योजनाओं को स्वीकृति मिलने की संभावना है। इसके बाद नए साल 2027 में धरातल पर विकास कार्य शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है।
अब जांच रिपोर्ट खोलेगी योजनाओं के चयन और सत्यापन की असल तस्वीर
DMFT की इन 277 योजनाओं की पुनः जांच केवल भौतिक सत्यापन तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ग्रामसभा के प्रस्ताव, जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा, तकनीकी निरीक्षण और योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता के बीच सामंजस्य की भी पड़ताल होगी।
अब देखना यह होगा कि जांच रिपोर्ट में कितनी योजनाएं पूर्ववत सही पाई जाती हैं, कितनी योजनाओं में संशोधन की जरूरत सामने आती है और कितनी योजनाएं स्थल अथवा उपयोगिता के आधार पर अनुपयुक्त पाई जाती हैं। जांच के नतीजे ही तय करेंगे कि DMFT की विकास योजनाओं को धरातल पर उतारने की अगली राह कितनी आसान या चुनौतीपूर्ण होगी।









