झारखंड मजदूर संघर्ष संघ ने उठाया भेदभाव का मुद्दा, कहा– लौह अयस्क के बिना इस्पात उत्पादन संभव नहीं, फिर खदानों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों?
किरीबुरू। रिपोर्ट शैलेश सिंह
स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) में इस्पात संयंत्रों और लौह अयस्क खदानों के कर्मचारियों के बीच कथित भेदभाव का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। कंपनी के बेहतर वित्तीय प्रदर्शन पर बोकारो इस्पात संयंत्र (BSL) के अधिकारियों और कर्मचारियों को अलग-अलग राशि के गिफ्ट कूपन देने के फैसले के बाद झारखंड खान समूह की खदानों में कार्यरत कर्मचारियों के बीच नाराजगी बढ़ने लगी है। सवाल उठने लगा है कि जब कंपनी के मुनाफे में खदानों से मिलने वाले लौह अयस्क की अहम भूमिका है, तो प्रोत्साहन और लाभांश के मामले में खदानकर्मियों को आखिर क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है?
झारखंड मजदूर संघर्ष संघ, किरीबुरू के महासचिव राजेन्द्र सिंद्रिया ने इस मामले को गंभीरता से उठाते हुए किरीबुरू लौह अयस्क खान के मुख्य महाप्रबंधक समेत केंद्रीय इस्पात मंत्री, सचिव, सेल के चेयरमैन, निदेशक, कार्यपालक निदेशक आदि को पत्र लिखकर सेल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने संयंत्रों और खदानों के बीच कथित दोहरे मापदंड को समाप्त करने, खदान कर्मचारियों को भी लाभांश के अनुरूप प्रोत्साहन देने तथा वर्षों से मिल रही सुविधाओं में बदलाव से पहले श्रमिक संगठनों से वार्ता करने की मांग की है।

बोकारो के कर्मचारियों को 5500, खदानकर्मियों को क्या मिलेगा?
राजेन्द्र सिंद्रिया ने बोकारो से प्रकाशित एक अखबार की खबर का हवाला देते हुए बताया कि वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली और दूसरी तिमाही में कंपनी के बेहतर प्रदर्शन को देखते हुए बोकारो इस्पात संयंत्र प्रबंधन ने अधिकारियों को 5500 रुपये तथा कर्मचारियों को 3300 रुपये के गिफ्ट कूपन देने का निर्णय लिया है। बताया गया है कि ठेका श्रमिकों को भी इस प्रोत्साहन का लाभ दिया जा रहा है।
संघ ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि कर्मचारियों को उनके बेहतर कार्य और कंपनी के प्रदर्शन के आधार पर प्रोत्साहन मिलना निश्चित रूप से मनोबल बढ़ाने वाला कदम है। लेकिन सवाल यह है कि बोकारो संयंत्र को लौह अयस्क उपलब्ध कराने वाली झारखंड खान समूह की खदानों के कर्मचारियों के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या बोकारो संयंत्र के बेहतर प्रदर्शन में किरीबुरू, मेघाहातुबुरू, गुवा और चिड़िया जैसी खदानों का कोई योगदान नहीं है? क्या लौह अयस्क के बिना इस्पात का उत्पादन संभव है? यदि नहीं, तो लाभांश और प्रोत्साहन के समय खदानों को अलग क्यों रखा जाता है?
खदान और संयंत्र एक-दूसरे के पूरक, फिर भेदभाव क्यों?
महासचिव राजेन्द्र सिंद्रिया ने कहा कि सेल के दो महत्वपूर्ण अंग हैं—इस्पात संयंत्र और लौह अयस्क खदानें। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। खदानों से लौह अयस्क की आपूर्ति के बिना संयंत्रों में इस्पात उत्पादन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
खदानों के कर्मचारी कठिन भौगोलिक और कार्य परिस्थितियों में मेहनत कर कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं। इसी लौह अयस्क से संयंत्रों में उत्पादन होता है और कंपनी को लाभ मिलता है। इसके बावजूद जब बेहतर प्रदर्शन का श्रेय और प्रोत्साहन देने की बात आती है, तो खदानों को नजरअंदाज किए जाने की शिकायत सामने आती है।
संघ का सवाल है कि जब कंपनी को नुकसान होता है तो उसका प्रभाव संयंत्र और खदान दोनों पर पड़ता है, फिर मुनाफे के समय खदान कर्मचारियों को बराबरी का भागीदार क्यों नहीं बनाया जाता? एक ही कंपनी के कर्मचारियों के लिए अलग-अलग मापदंड आखिर किस आधार पर अपनाए जा रहे हैं?
1964 से मिल रही सुविधाओं पर भी संकट!
संघ ने किरीबुरू खदान का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया है कि वर्ष 1964 से कर्मचारियों को मिल रही कुछ सुविधाओं को बिना स्थानीय श्रमिक संगठनों से चर्चा किए समाप्त करने अथवा उनमें बदलाव करने का प्रयास किया जा रहा है।
राजेन्द्र सिंद्रिया का कहना है कि संयंत्रों और खदानों की भौगोलिक परिस्थितियां, कार्यप्रणाली और कर्मचारियों की समस्याएं अलग-अलग हैं। ऐसे में संयंत्रों के नियम-कानून और कार्य संस्कृति को बिना स्थानीय परिस्थितियों का आकलन किए खदानों में लागू करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि वर्षों से चली आ रही सुविधाओं में किसी भी प्रकार का बदलाव करने से पहले स्थानीय श्रमिक संगठनों से बातचीत और सहमति की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। प्रबंधन को एकतरफा निर्णय लेने के बजाय संवाद के माध्यम से समस्याओं का समाधान करना चाहिए। अन्यथा कर्मचारियों में असंतोष और मनोबल में गिरावट का असर उत्पादन एवं उत्पादकता पर पड़ सकता है।
NJCS में खदानों को प्रतिनिधित्व देने की मांग
झारखंड मजदूर संघर्ष संघ ने नेशनल ज्वाइंट कमेटी फॉर स्टील (NJCS) में भी खदानों को समुचित प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाई है।
संघ का आरोप है कि NJCS की बैठकों में मुख्य रूप से इस्पात संयंत्रों से जुड़े प्रतिनिधियों की भागीदारी रहती है, जबकि खदानों की विशिष्ट समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए अलग प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है। परिणामस्वरूप संयंत्रों में लिए गए निर्णय खदानों पर भी लागू कर दिए जाते हैं, जबकि दोनों की कार्य परिस्थितियां और चुनौतियां अलग हैं।
राजेन्द्र सिंद्रिया ने कहा कि खदानों की समस्याओं से सीधे जुड़े प्रतिनिधियों को NJCS में स्थान मिलना चाहिए, ताकि खदानकर्मियों की आवाज भी राष्ट्रीय स्तर पर सुनी जा सके और उनकी समस्याओं का व्यावहारिक समाधान निकल सके।
प्रबंधन के सामने संघ की प्रमुख मांगें
झारखंड मजदूर संघर्ष संघ ने सेल प्रबंधन से मांग की है कि—
- संयंत्रों की तरह खदान कर्मचारियों को भी कंपनी के बेहतर वित्तीय प्रदर्शन पर गिफ्ट कूपन और प्रोत्साहन राशि का लाभ दिया जाए।
- लाभांश और बेहतर उत्पादन प्रदर्शन के पुरस्कार में खदानों की भूमिका को उचित मान्यता मिले।
- वर्ष 1964 से मिल रही सुविधाओं में किसी भी बदलाव से पहले स्थानीय श्रमिक संगठनों से वार्ता की जाए।
- संयंत्रों के नियमों को खदानों में लागू करने से पहले वहां की भौगोलिक और कार्य परिस्थितियों का आकलन किया जाए।
- NJCS में झारखंड खान समूह की खदानों को भी समुचित प्रतिनिधित्व मिले।
- कर्मचारियों के साथ किसी भी प्रकार का दोहरा मापदंड और भेदभावपूर्ण व्यवहार बंद किया जाए।
मनोबल टूटेगा तो उत्पादन पर भी पड़ेगा असर
राजेन्द्र सिंद्रिया ने किरीबुरू के मुख्य महाप्रबंधक से आग्रह किया है कि सेल में समानता की नीति अपनाते हुए खदान कर्मचारियों को भी संयंत्रकर्मियों के समान सम्मान और प्रोत्साहन दिया जाए। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों का मनोबल ही उत्पादन और उत्पादकता की सबसे बड़ी ताकत है। यदि मेहनत करने वाले कर्मचारियों को लगातार उपेक्षित महसूस कराया जाएगा और उनकी सुविधाओं में एकतरफा कटौती की जाएगी, तो इसका प्रतिकूल असर औद्योगिक वातावरण और उत्पादन पर पड़ना स्वाभाविक है।
उन्होंने प्रबंधन को आगाह करते हुए कहा कि खदानों के साथ बार-बार दोहरे मापदंड अपनाने की नीति पर रोक लगनी चाहिए। खदानों के योगदान को नजरअंदाज कर सेल के समग्र विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए प्रबंधन को समय रहते इन मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए, ताकि खदानकर्मियों का विश्वास और कार्य के प्रति उत्साह बना रहे।
संघ का स्पष्ट संदेश है कि जब सेल एक है, उत्पादन की जिम्मेदारी साझा है और मुनाफा भी कंपनी का साझा है, तो फिर सुविधाओं और प्रोत्साहन के मामले में खदानों के साथ अलग व्यवहार क्यों?









