मजदूर और छोटे दुकानदार से कथित करोड़ों के साम्राज्य तक का सफर—स्क्रैप चोरी से लौह अयस्क के कथित खेल तक पहुंची जांच
जिसके नाम से कांपते थे छोटे कारोबारी, अब उसी के ठिकानों पर प्रशासन की सील
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
24 घंटे के अंदर सभी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं तो होगा झारखंड बंद – मधु कोड़ा
कभी मजदूरी और छोटे-मोटे कारोबार से अपनी पहचान बनाने वाला एक व्यक्ति आखिर देखते ही देखते बड़ाजामदा और आसपास के लौह अयस्क क्षेत्र में इतना प्रभावशाली कैसे बन गया कि उसके नाम की चर्चा कथित स्क्रैप चोरी से लेकर लौह अयस्क के अवैध कारोबार तक होने लगी?
यह सवाल आज बड़ाजामदा की गलियों से निकलकर पुलिस और प्रशासन के सामने खड़ा है।
नाम है—दिवाकर उर्फ दीपू सिंह।
स्थानीय स्तर पर लंबे समय से उसे कथित तौर पर स्क्रैप और लौह अयस्क कारोबार के बड़े नाम के रूप में देखा जाता रहा है। अब उसकी गिरफ्तारी, प्रतिष्ठानों की सीलिंग और उसके कथित सहयोगियों की तलाश ने वर्षों से चली आ रही चर्चाओं को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।
स्थानीय लोगों के आरोपों की मानें तो यह कहानी महज एक स्क्रैप कारोबारी की नहीं, बल्कि एक ऐसे कथित नेटवर्क की है, जिसने स्क्रैप चोरी, खनिज कारोबार, वाहनों, संपत्तियों और प्रभाव के सहारे अपना दायरा बढ़ाया।
हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

एक छोटे कारोबारी से ‘माफिया’ तक कैसे पहुंचा?
दीपू सिंह के अतीत को लेकर स्थानीय स्तर पर कई तरह की बातें सामने आती रही हैं।
सूत्रों के अनुसार वह मूल रूप से बिहार के छपरा अथवा सिवान जिले के रसूलपुर थाना क्षेत्र के तरैया गांव का निवासी बताया जाता है। उसके पिता का नाम शिव शंकर सिंह बताया गया है।
वर्ष 2005 के आसपास उसके बड़ाजामदा और बड़बिल क्षेत्र में आने की बात कही जाती है।
उसके शुरुआती दिनों को लेकर अलग-अलग दावे हैं।
कुछ लोगों के अनुसार वह एक ट्रक लेकर आया था, जिसे बाद में कटवाकर बेच दिया गया।
कुछ लोगों का कहना है कि उसने बड़ाजामदा के बालाजी के आसपास राशन की छोटी दुकान से कारोबार शुरू किया।
वहीं कुछ लोगों के अनुसार उसकी शुरुआती पहचान छोटे स्क्रैप कारोबारी के रूप में बनी।
लेकिन सवाल यह है कि उस छोटी शुरुआत के बाद आखिर ऐसा क्या हुआ कि कारोबार लगातार फैलता गया?
‘कबाड़’ से शुरू हुआ खेल कथित तौर पर करोड़ों तक पहुंचा
स्थानीय लोगों के अनुसार दीपू सिंह ने धीरे-धीरे स्क्रैप के कारोबार में पैर जमाया।
छोटे स्तर से शुरू हुआ यह कारोबार आगे बढ़ते-बढ़ते कथित रूप से बड़े नेटवर्क में बदल गया।
आरोप है कि झारखंड और ओड़िशा के विभिन्न खनन क्षेत्रों में उसके संपर्क बढ़ते गए और स्क्रैप खरीदने वालों तथा कबाड़ कारोबारियों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार हुआ।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभिन्न संस्थानों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से चोरी होने वाला स्क्रैप उसके नेटवर्क तक पहुंचता था।
इन आरोपों में सेल, टाटा स्टील, रेलवे और अन्य संस्थानों के नाम भी स्थानीय स्तर पर लिए जाते हैं।
यदि ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो सवाल सिर्फ चोरी का नहीं, बल्कि चोरी के माल की खरीद, परिवहन और खपत के पूरे नेटवर्क का होगा।
‘चोरी का माल किसके भरोसे चलता था?’
स्थानीय लोगों का सबसे बड़ा आरोप यही है कि कथित चोरी का स्क्रैप लदे वाहन विभिन्न थाना क्षेत्रों से होकर गुजरते थे, लेकिन उन पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती थी।
लोगों का आरोप है कि कथित तौर पर कुछ स्थानों पर पुलिस संरक्षण मिलता था और इसके बदले नियमित रकम पहुंचने की चर्चा थी।
यह आरोप बेहद गंभीर है।
यदि पुलिस जांच में ऐसा कोई नेटवर्क सामने आता है तो सवाल यह होगा कि क्या कोई बड़ा अवैध कारोबार बिना स्थानीय स्तर पर संरक्षण के इतने वर्षों तक चल सकता है?
कौन संरक्षण देता था?
किसके इशारे पर कार्रवाई रुकती थी?
किसके पास हर महीने कथित रकम पहुंचती थी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या इस कथित नेटवर्क में सिर्फ कारोबारी थे या वर्दी और प्रभावशाली लोगों की भी भूमिका थी?
इन सवालों का जवाब जांच एजेंसियों को देना होगा।
दूसरे स्क्रैप कारोबारियों के लिए कथित ‘नो एंट्री’
स्थानीय लोगों के अनुसार दीपू सिंह का प्रभाव बढ़ने के साथ-साथ दूसरे छोटे स्क्रैप कारोबारियों के सामने मुश्किलें बढ़ती गईं।
आरोप है कि उसके प्रभाव वाले क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से स्क्रैप कारोबार करना आसान नहीं था।
स्थानीय चर्चा के अनुसार आसपास के क्षेत्रों में चोरी अथवा संदिग्ध स्रोत से प्राप्त स्क्रैप को उसके नेटवर्क के माध्यम से खपाने का दबाव रहता था।
यानी कथित तौर पर बाजार भी वही, खरीददार भी वही और नियंत्रण भी उसी का।
अगर जांच में यह बात साबित होती है तो यह सामान्य स्क्रैप कारोबार नहीं बल्कि संगठित नेटवर्क की ओर संकेत करेगा।
पुरानी हाईवा से कथित खेल—चेचिस और नंबर बदलने के आरोप
दीपू सिंह के कथित कारोबार का एक और पहलू पुराने भारी वाहनों से जुड़ा बताया जाता है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार उसने कई पुरानी हाईवा खरीदीं।
आरोप है कि कुछ वाहनों के चेचिस और रजिस्ट्रेशन नंबर में कथित हेरफेर कर उन्हें खनन क्षेत्रों में लौह अयस्क ढुलाई के लिए लगाया गया।
बाद में इन वाहनों को कटवाकर बेचने की भी चर्चा है।
इन आरोपों की सच्चाई परिवहन विभाग, पुलिस और खनन विभाग के रिकॉर्ड से सामने आ सकती है।
अगर नंबर और चेचिस से छेड़छाड़ की पुष्टि होती है तो यह जांच का बेहद महत्वपूर्ण सिरा होगा।
टॉरियन प्लॉट का विशाल स्क्रैप यार्ड बना चर्चा का केंद्र
कारोबार बढ़ा तो यार्ड भी बढ़ता गया।
स्थानीय लोगों के अनुसार टॉरियन प्लॉट में दीपू सिंह ने बड़ा स्क्रैप यार्ड खड़ा किया।
आरोप है कि यहां बड़े पैमाने पर स्क्रैप की खरीद, कटिंग और परिवहन होता था।
लोगों का दावा है कि यहां से रोजाना लाखों रुपये के कारोबार की गतिविधियां होती थीं।
अब सवाल यह है कि यार्ड में आने वाले स्क्रैप का स्रोत क्या था?
क्या हर माल के पास वैध खरीद दस्तावेज थे?
क्या बिल, चालान और परिवहन कागजात मौजूद थे?
क्या स्क्रैप का स्टॉक सरकारी रिकॉर्ड से मेल खाता था?
प्रशासनिक जांच में इन सवालों का जवाब बेहद अहम होगा।
स्क्रैप के बाद लौह अयस्क—क्या बढ़ गया था खेल का दायरा?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि समय के साथ दीपू सिंह का नेटवर्क कथित लौह अयस्क कारोबार तक पहुंच गया।
लौह अयस्क वाले इलाकों में प्रभाव बढ़ने के साथ कथित रूप से उसकी आर्थिक ताकत भी बढ़ती गई।
स्थानीय लोगों के अनुसार इसके बाद बड़ाजामदा के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी उसकी संपत्ति और कारोबारी गतिविधियां बढ़ीं।
एक छोटा स्क्रैप कारोबारी इतनी तेजी से इतना बड़ा कैसे बना—यही सवाल अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
कहां से आया इतना पैसा? संपत्तियां भी अब सवालों के घेरे में
स्थानीय लोगों का दावा है कि दीपू सिंह ने बड़ाजामदा, नाल्दा, जमशेदपुर समेत कई स्थानों पर जमीन, मकान और फ्लैट खरीदे।
फॉरच्यूनर, डस्टर समेत कई छोटी-बड़ी गाड़ियों की खरीद की चर्चा भी स्थानीय स्तर पर होती रही है।
बड़ाजामदा में आलीशान मकान, उसके नीचे बड़ी हार्डवेयर एवं हाउस मैटेरियल दुकान और ऊपर लॉज का संचालन किए जाने की बात कही जा रही है।
अब बड़ा सवाल है—
क्या इन संपत्तियों की खरीद उसकी घोषित आय के अनुरूप है?
यदि हां, तो दस्तावेज सब कुछ साफ कर देंगे।
यदि नहीं, तो आय के स्रोत और संपत्ति की खरीद की जांच आवश्यक होगी।

शिव शक्ति ट्रेडर्स भी जांच के दायरे में
बड़ाजामदा स्थित शिव शक्ति ट्रेडर्स को लेकर भी स्थानीय स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं।
दुकान के साथ मकान और लॉज का निर्माण किया गया है।
स्थानीय लोगों ने प्रशासन के समक्ष जमीन को लेकर भी गंभीर शिकायतें की हैं।
आरोप है कि जिस जमीन पर यह निर्माण हुआ है, वह आदिवासी जमीन हो सकती है।
अगर ऐसा है तो जमीन का हस्तांतरण कैसे हुआ?
क्या रजिस्ट्री वैध है?
क्या जमीन की प्रकृति बदली गई?
किसके नाम पर जमीन थी?
किसके नाम पर हस्तांतरण हुआ?
इन तमाम सवालों का जवाब राजस्व रिकॉर्ड से ही मिलेगा।
अब कहानी में आया शाहबाज का नाम
मझगांव से बड़ाजामदा तक कथित लौह अयस्क नेटवर्क?
दीपू सिंह के मामले ने उस समय और गंभीर रूप ले लिया जब बड़ाजामदा में प्रदर्शन कर रहे लोगों ने मझगांव क्षेत्र के कथित लौह अयस्क कारोबारी शाहबाज और उसके सहयोगियों का नाम सामने रखा।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि शाहबाज और उसके कुछ कथित गुर्गे पिछले लगभग एक वर्ष से दीपू सिंह के प्रभाव वाले स्थान पर रहकर गतिविधियां चला रहे थे।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जांच का विषय है।
लेकिन सवाल यह जरूर उठ रहा है कि अगर दोनों के बीच वास्तव में कारोबारी या आपराधिक संबंध थे तो उनका नेटवर्क कितना बड़ा था?
नाबालिग से जुड़े आरोप ने हिला दिया बड़ाजामदा
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू नाबालिग लड़की से जुड़ा बताया जा रहा है।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि दो दिन पहले शाहबाज के एक कथित सहयोगी ने नाबालिग लड़की को जबरन दीपू सिंह के घर ले जाकर उसके साथ गलत किया।
यह आरोप बेहद गंभीर है और इसकी जांच संवेदनशील तरीके से किए जाने की आवश्यकता है।
यदि आरोप सत्य पाए जाते हैं तो मामला केवल अवैध कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि नाबालिग की सुरक्षा और गंभीर आपराधिक धाराओं से भी जुड़ जाएगा।
विरोध करने वालों पर चाकू से हमला?
स्थानीय लोगों के अनुसार जब कुछ युवकों ने कथित घटना का विरोध किया तो बड़ाजामदा के दो युवकों पर चाकू और अन्य हथियारों से हमला किया गया।
इस हमले को लेकर भी प्राथमिकी दर्ज किए जाने और पुलिस द्वारा जांच शुरू करने की बात सामने आई है।
यानी एक के बाद एक घटनाओं ने बड़ाजामदा के लोगों के गुस्से को सड़क पर ला दिया।
30 अगस्त को फूटा जनता का गुस्सा
थाना घेरकर लोगों ने कहा—अब नहीं चलेगा कथित माफिया राज
30 अगस्त को बड़ाजामदा में स्थिति उस समय बेहद तनावपूर्ण हो गई जब बड़ी संख्या में महिलाएं और आम नागरिक थाना पहुंचे।
पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, पूर्व सांसद गीता कोड़ा, पूर्व जिला परिषद सदस्य शंभू हाजरा, अशोक दास, राजा तिर्की, अजीत सिंह समेत कई लोग भी मौके पर पहुंचे। मधु कोड़ा ने कहा कि 24 घंटे के अंदर सभी आरोपी गिरफ्तार नहीं हुए तो पूरे झारखंड को बंद कराया जाएगा। यह एक नाबालिक लड़की के साथ गलत किए जाने से जुड़ा गंभीर मामला है।
लोगों ने पुलिस प्रशासन के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की और आरोपियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की।
लोगों की मांग थी कि मामले में केवल एक व्यक्ति को गिरफ्तार करके खानापूर्ति न की जाए।
पूरे नेटवर्क की जांच हो और जो भी दोषी मिले, उसके खिलाफ कार्रवाई हो।

दीपू सिंह गिरफ्तार—प्रशासन ने कसी नकेल
दुकान, लॉज और अन्य प्रतिष्ठानों पर प्रशासन की सील
जनाक्रोश के बीच पुलिस प्रशासन ने दीपू सिंह को गिरफ्तार कर लिया।
इसके साथ ही प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में उसके दुकान, लॉज तथा अन्य संबंधित प्रतिष्ठानों को सील किए जाने की कार्रवाई की गई।
यह कार्रवाई इस मामले को सामान्य विवाद से कहीं आगे ले जाती है।
अब जांच एजेंसियों के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि इन प्रतिष्ठानों में संचालित गतिविधियों की वास्तविक प्रकृति क्या थी।
श्री बालाजी मैटेलिक क्रेशर भी सील !
बड़ाजामदा स्थित श्री बालाजी मैटेलिक क्रेशर को लेकर भी प्रदर्शनकारियों ने गंभीर आरोप लगाए हैं।
आरोप है कि शाहबाज इस क्रेशर को खरीद अथवा किराये पर लेकर कथित रूप से लौह अयस्क तस्करी का काम कर रहा था।
प्रशासन द्वारा क्रेशर को सील किए जाने और मामले की उच्चस्तरीय जांच की बात कही गई है।
अब क्रेशर के स्वामित्व, लीज, किराये, स्टॉक, खनिज स्रोत, परिवहन और दस्तावेजों की जांच अहम होगी।
झारखंड से ओड़िशा तक फैले नेटवर्क की होगी तलाश
अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी
मामले से जुड़े अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए झारखंड और ओड़िशा में अलग-अलग पुलिस टीमों द्वारा छापेमारी किए जाने की जानकारी सामने आई है।
अगर जांच आगे बढ़ती है तो पुलिस को कथित नेटवर्क से जुड़े लोगों, वाहनों, मोबाइल संपर्क, बैंक लेनदेन, संपत्तियों और कारोबार की भी पड़ताल करनी होगी।
क्योंकि कथित माफिया नेटवर्क केवल एक व्यक्ति से नहीं चलता। उसके पीछे लोग, पैसा, परिवहन और संरक्षण की पूरी व्यवस्था होती है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या ‘माफिया साम्राज्य’ अकेले खड़ा हुआ?
दीपू सिंह के खिलाफ लगे आरोपों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है।
यदि वह वास्तव में वर्षों से इतने बड़े स्तर पर अवैध गतिविधियां चला रहा था तो—
क्या उसे किसी का संरक्षण प्राप्त था?
क्या उसकी गतिविधियों की जानकारी स्थानीय प्रशासन को नहीं थी?
क्या कथित चोरी का माल बिना किसी नेटवर्क के बिक सकता था?
क्या वाहन बिना जांच के अलग-अलग थाना क्षेत्रों से गुजर सकते थे?
क्या इतनी बड़ी संपत्तियां बिना किसी रिकॉर्ड के बनाई जा सकती हैं?
क्या अवैध लौह अयस्क कारोबार में अकेला कोई व्यक्ति इतना बड़ा नेटवर्क बना सकता है?
इन सवालों का जवाब जांच में सामने आना जरूरी है।
अब सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, ‘मनी ट्रेल’ की जरूरत
अगर प्रशासन वास्तव में इस पूरे मामले की तह तक जाना चाहता है तो केवल गिरफ्तारी और सीलिंग से आगे बढ़ना होगा।
दीपू सिंह की संपत्तियों का सत्यापन होना चाहिए।
उसकी जमीनों की जांच होनी चाहिए।
वाहनों के दस्तावेज खंगाले जाने चाहिए।
स्क्रैप खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए।
बैंक लेनदेन और कारोबारी खातों की जांच होनी चाहिए।
लौह अयस्क कारोबार से जुड़े दस्तावेजों की पड़ताल होनी चाहिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—पैसा कहां से आया और कहां गया, इसकी पूरी कड़ी जोड़ी जानी चाहिए।
अगर पुलिस संरक्षण के आरोप सही हैं तो वर्दी भी जांच के घेरे में आए
स्थानीय लोगों द्वारा लगाए गए पुलिस संरक्षण के आरोपों को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।
यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि किसी पुलिसकर्मी अथवा अधिकारी ने अवैध कारोबार को संरक्षण दिया, तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
क्योंकि कोई भी अवैध कारोबार सिर्फ कारोबारी के दम पर लंबे समय तक नहीं चलता।
जहां अपराधी मजबूत होता है, वहां अक्सर किसी न किसी स्तर पर व्यवस्था की कमजोरी या मिलीभगत का सवाल उठता है।
हालांकि, बिना प्रमाण किसी पुलिसकर्मी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
बड़ाजामदा में अभी शांत नहीं हुआ आक्रोश
दीपू सिंह की गिरफ्तारी के बावजूद बड़ाजामदा का जनाक्रोश पूरी तरह शांत नहीं हुआ है।
लोग चाहते हैं कि नाबालिग से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच हो।
चाकूबाजी के आरोपियों की गिरफ्तारी हो।
शाहबाज और उसके कथित सहयोगियों की भूमिका सामने आए।
क्रेशर की गतिविधियों की जांच हो।
दीपू सिंह की संपत्तियों की जांच हो।
और अगर किसी अधिकारी अथवा प्रभावशाली व्यक्ति ने अवैध कारोबार को संरक्षण दिया है तो उसकी भी पहचान हो।
अब देखना है—कार्रवाई कितनी गहराई तक जाती है
बड़ाजामदा की मौजूदा घटना ने वर्षों से चल रही चर्चाओं को जांच की कसौटी पर ला खड़ा किया है।
एक तरफ गिरफ्तार दीपू सिंह है।
दूसरी तरफ शाहबाज और उसके कथित सहयोगियों पर लगे गंभीर आरोप हैं।
बीच में नाबालिग से जुड़ा संवेदनशील मामला है।
चाकूबाजी का आरोप है।
स्क्रैप कारोबार से जुड़े पुराने आरोप हैं।
लौह अयस्क के कथित अवैध कारोबार की शिकायतें हैं।
जमीन और संपत्तियों को लेकर सवाल हैं।
और पुलिस संरक्षण के गंभीर आरोप हैं।
अब जनता की नजर इस बात पर है कि जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहती है या बड़ाजामदा में कथित अवैध कारोबार की जड़ तक पहुंचती है।

‘दीपू अकेला नहीं तो कौन-कौन साथ?’—यही है सबसे बड़ा सवाल
बड़ाजामदा आज एक व्यक्ति की गिरफ्तारी से ज्यादा बड़े सवाल का जवाब मांग रहा है।
अगर दीपू सिंह पर लगाए गए आरोप सही हैं, तो उसके पीछे कौन था?
किसने उसे ताकत दी?
किसने उसका कारोबार बढ़ने दिया?
किसने कथित चोरी के माल को बाजार दिया?
किसने वाहनों को चलने दिया?
किसने कथित अवैध खनिज कारोबार को सहारा दिया?
और सबसे अहम—
क्या अब उस कथित नेटवर्क के हर चेहरे तक पुलिस पहुंचेगी?
बड़ाजामदा की जनता की नजर अब इसी पर टिकी है।
दीपू सिंह की गिरफ्तारी से एक अध्याय जरूर खुला है, लेकिन पूरी कहानी अभी बाकी है।
अगर जांच निष्पक्ष, गहरी और दस्तावेज आधारित हुई तो आने वाले दिनों में कई ऐसे नाम और तथ्य सामने आ सकते हैं, जो अब तक पर्दे के पीछे थे।
फिलहाल बड़ाजामदा में प्रशासन की सील लगी है, पुलिस की निगरानी बढ़ी है और जनता की निगाह जांच पर टिकी है।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि ‘दीपू सिंह कौन है?’













