बायोमेट्रिक विवाद के बीच 40 साल बाद दिखी मजदूरों की एकता, संवाद से बच गई सेल की खदानों की पारिवारिक संस्कृति
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
सेल की मेघाहातुबुरु, किरीबुरू, गुवा और चिड़िया लौह अयस्क खदानों में बायोमेट्रिक प्रणाली से हाजिरी अनिवार्य किए जाने को लेकर पिछले दिनों जो विवाद खड़ा हुआ, उसका सुखद अंत केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि आपसी विश्वास, संवाद और दशकों पुराने मानवीय रिश्तों की जीत के रूप में देखा जा रहा है।
15 जून को चारों खदानों के श्रमिकों ने संयुक्त यूनियन के नेतृत्व में जिस एकजुटता के साथ अपना विरोध दर्ज कराया, उसके बाद कई दौर की बातचीत हुई और अंततः प्रबंधन ने फिलहाल अपना आदेश वापस ले लिया। इस निर्णय का स्वागत न केवल श्रमिकों ने किया, बल्कि खदान क्षेत्र के बुद्धिजीवी और आम लोग भी इसे मजदूर और प्रबंधन के बीच भरोसे को बनाए रखने वाला सकारात्मक कदम मान रहे हैं।

न प्रबंधन हारा, न यूनियन जीती…
इस पूरे घटनाक्रम को जीत और हार के नजरिए से देखना शायद उचित नहीं होगा। क्योंकि बायोमेट्रिक प्रणाली कोई स्थायी रूप से समाप्त हुआ विषय नहीं है। बदलते समय और तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप आने वाले दिनों में यह व्यवस्था किसी न किसी रूप में लागू हो सकती है।
लेकिन इस बार सबसे बड़ी बात यह रही कि दोनों पक्षों ने टकराव की जगह बातचीत का रास्ता चुना। संवाद ने उस दूरी को खत्म कर दिया, जो किसी भी औद्योगिक क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होती है।
यही कारण है कि लोग कह रहे हैं कि इस संघर्ष में किसी की पराजय नहीं हुई, बल्कि रिश्तों की रक्षा हुई है।
चार दशक बाद दिखी मजदूरों की चट्टानी एकता
करीब 40 वर्षों के बाद पहली बार मेघाहातुबुरु, किरीबुरू, गुवा और चिड़िया की चारों खदानों के श्रमिक एक साझा मंच पर इतने मजबूत तरीके से खड़े दिखाई दिए। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो संयुक्त यूनियन के नेतृत्व में मजदूरों ने जिस अनुशासन और एकता का परिचय दिया, वह खदान क्षेत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया।
इस एकता ने यह संदेश दिया कि जब श्रमिकों के अधिकारों और सम्मान की बात आती है तो विभिन्न विचारधाराओं वाले संगठन भी एक साथ खड़े हो सकते हैं।

यह केवल उद्योग नहीं, एक बड़ा परिवार है
सेल की इन खदानों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां प्रबंधन और श्रमिकों का रिश्ता केवल कामकाज तक सीमित नहीं है।
यहां अधिकारी और कर्मचारी वर्षों से एक साथ रहते हैं। एक ही बाजार में मिलते हैं, एक ही मैदान में खेलते हैं, एक-दूसरे के घरों में सुख-दुख के सहभागी बनते हैं। त्योहारों की खुशियां साझा होती हैं और कठिन समय में एक-दूसरे का हाथ थामने की परंपरा भी रही है।
देश के अनेक औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक और प्रबंधन के बीच दूरी देखने को मिलती है, लेकिन सेल की इन खदानों की पहचान हमेशा से एक बड़े परिवार की रही है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत और विरासत है।
संवैधानिक अधिकार भी, आपसी सम्मान भी
अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना श्रमिकों का अधिकार है। उसी तरह संस्थान की कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाना प्रबंधन की जिम्मेदारी होती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मतभेद मनभेद में न बदलें, यही सबसे बड़ी चुनौती होती है। इस मामले में दोनों पक्षों ने अंततः संयम और परिपक्वता का परिचय दिया।
संवाद की मेज पर बैठकर समाधान तलाशने की यह परंपरा भविष्य के लिए भी एक सकारात्मक संदेश देती है।

विश्वास बचा रहेगा तो समाधान भी निकलता रहेगा
बायोमेट्रिक हाजिरी का मुद्दा शायद आने वाले समय में फिर सामने आए। लेकिन अब यह उम्मीद जगी है कि इसे आपसी विश्वास और पारदर्शी बातचीत के माध्यम से लागू करने का रास्ता निकाला जा सकता है।
तकनीक जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है वह भरोसा, जिसके सहारे कोई भी औद्योगिक संस्थान आगे बढ़ता है।
खदानों की असली पूंजी मशीनें नहीं, इंसानी रिश्ते हैं
लौह अयस्क की ये खदानें केवल उत्पादन का केंद्र नहीं हैं। यहां पीढ़ियों ने साथ काम किया है, साथ जीवन जिया है और एक साझा संस्कृति को आगे बढ़ाया है। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह एहसास कराया कि संस्थान की असली ताकत केवल मशीनें, खदानें और उत्पादन के आंकड़े नहीं होते, बल्कि वे लोग होते हैं जो मिलकर उसे परिवार की तरह आगे बढ़ाते हैं।
अगर यह विश्वास और आत्मीयता बनी रही, तो आने वाले समय में हर विवाद का समाधान बातचीत से निकलेगा और सेल की यह ऐतिहासिक कार्य संस्कृति आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मिसाल बनी रहेगी।














