दस अभियंताओं की शिकायत दबाने से लेकर मुख्य अभियंता की छुट्टी तक, अब पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबोंगा ने खोला मोर्चा; बोले— “यह विभाग विकास नहीं, उद्योग बन चुका है”
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
झारखंड सरकार का ग्रामीण कार्य विभाग एक बार फिर विवादों के भंवर में है। 23 जून को होने वाली स्थापना समिति की बैठक से पहले विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग, वसूली, दबाव और भ्रष्टाचार की चर्चाओं ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
इस बार मामला सिर्फ अफसरों की अदला-बदली तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता के गलियारों से जुड़े प्रभावशाली चेहरों, विभागीय दबाव और अभियंताओं की आवाज दबाने तक पहुंच चुका है। इस पूरे मामले को लेकर पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबोंगा ने खुलकर मोर्चा खोल दिया है और साफ कहा है कि जल्द ही वह मुख्यमंत्री Hemant Soren से मिलकर पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करेंगे।
दस अभियंताओं की शिकायत बनी बड़ा विस्फोटक दस्तावेज
ग्रामीण कार्य विभाग का यह विवाद उस समय सुर्खियों में आया था जब रांची स्थित मुख्य अभियंता कार्यालय में विभाग के दस अभियंताओं ने लिखित शिकायत देकर मंत्री Deepika Pandey Singh के करीबी माने जाने वाले बबलू मिश्रा उर्फ “मामा जी” पर गंभीर आरोप लगाए थे।
शिकायत में अभियंताओं ने आरोप लगाया था कि बबलू मिश्रा ने उन्हें धमकी दी, अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और ट्रांसफर-पोस्टिंग से जुड़े मामलों में दबाव बनाया।
यह आवेदन पूरे विभाग में भूचाल की तरह फैल गया था।
विरोध से यू-टर्न तक: क्या दबाव में बदले बयान?
मामले ने जब राजनीतिक रंग पकड़ा तो विपक्ष के नेता Babulal Marandi ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर इसकी जांच की मांग की।
लेकिन आरोप है कि इसके बाद विभागीय दबाव में वही दस अभियंता अपने ही लिखित शिकायत और विरोध से पीछे हट गए। उन्होंने बाद में लिखित रूप से अपने आरोपों को नकार दिया।
यहीं से सवाल उठने लगे— क्या यह यू-टर्न स्वेच्छा से था या दबाव में?
आज तक इस पूरे मामले की कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई।

मुख्य अभियंता हटे, सवाल और गहरे हुए
इस विवाद के तुरंत बाद विभाग के मुख्य अभियंता सरवन कुमार को पद से हटा दिया गया। विभागीय गलियारों में इसे “मामले को दबाने की रणनीति” के रूप में देखा गया।
पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबोंगा का कहना है—
“जब शिकायत करने वाले अभियंता पीछे हटे और मुख्य अभियंता को हटा दिया गया, तब से यह स्पष्ट हो गया कि कहीं न कहीं बड़ा खेल चल रहा है।”

23 जून की बैठक से पहले फिर वसूली की चर्चा
अब 23 जून को ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए स्थापना समिति की बैठक होनी है। लेकिन इससे पहले विभाग में फिर वही पुरानी चर्चाएं तेज हैं— कौन जाएगा, कौन बचेगा और किससे कितनी वसूली होगी?
बोबोंगा का आरोप है कि दो साल का कार्यकाल पूरा कर चुके अभियंताओं को भी हटाने की तैयारी हो रही है, जबकि नियम के मुताबिक सामान्यतः तीन साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद तबादला उचित माना जाता है।
उन्होंने सवाल उठाया—
“जब नियम तीन साल का है, तो दो साल वाले को हटाने की इतनी जल्दी क्यों? क्या यह ट्रांसफर नहीं, कमाई का जरिया बन चुका है?”
“ग्रामीण कार्य विभाग अब उद्योग-धंधा बन चुका है”
मंगल सिंह बोबोंगा ने सीधे शब्दों में कहा—
“ग्रामीण कार्य विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग अब उद्योग-धंधा बन चुका है। यहां विकास कम और सेटिंग-जुगाड़ ज्यादा दिखती है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि टेंडर मैनेजमेंट, आवंटन विमुक्ति और संवेदकों से सांठगांठ कर बड़े पैमाने पर आर्थिक खेल चल रहा है।
यह आरोप सीधे विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
डेप्युटी सेक्रेटरी विजय कुमार भगत पर भी निगाह
बोबोंगा ने कहा कि विभाग के अवर सचिव विजय कुमार भगत की गतिविधियों पर भी कई लोग नजर बनाए हुए हैं।
उनका कहना है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग और विभागीय फाइलों के संचालन में उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया अब तक सामने नहीं आई है।
केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग होगी
पूर्व विधायक बोबोंगा ने कहा कि दस अभियंताओं की शिकायत और उसके बाद के घटनाक्रम की जांच राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि केंद्रीय उच्च स्तरीय एजेंसी से होनी चाहिए।
उनका कहना है—
“अगर फेस टाइम, कॉल रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन की जांच हो जाए तो पूरा खेल सामने आ जाएगा।”
यह बयान साफ संकेत है कि विपक्ष इस मुद्दे को जल्द ही बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
हेमंत सोरेन की नाराजगी की चर्चा
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद ग्रामीण कार्य विभाग में लगातार उठ रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से नाराज हैं।
हाल के दिनों में उन्होंने बीडीओ ट्रांसफर-पोस्टिंग की जिम्मेदारी अपने कार्मिक विभाग से सीधे संभालकर संकेत दे दिया है कि वे अब प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर गंभीर हैं।
बोबोंगा का कहना है कि मुख्यमंत्री को ग्रामीण कार्य विभाग की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया जाएगा।
दीपिका पांडेय सिंह पर बढ़ेगा दबाव
मंत्री दीपिका पांडेय सिंह के खिलाफ विपक्ष अब ज्यादा आक्रामक होता दिख रहा है।
बबलू मिश्रा उर्फ मामा जी का नाम सीधे इस पूरे विवाद में सामने आने के बाद मंत्री की भूमिका और जिम्मेदारी पर भी सवाल उठ रहे हैं।
बोबोंगा ने साफ कहा—
“अगर मंत्री के नजदीकी लोग विभागीय अफसरों को धमका रहे हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि पूरे सिस्टम का सवाल है।”
अंदरखाने का असंतोष: ‘पैसे के खेल’ से विभाग में सीनियर-जूनियर का संतुलन बिगड़ा?
ग्रामीण कार्य विभाग के भीतर एक और गंभीर असंतोष की चर्चा अब खुलकर सामने आने लगी है। विभागीय गलियारों में यह आरोप जोर पकड़ रहा है कि मंत्री Deepika Pandey Singh के कार्यकाल में ट्रांसफर-पोस्टिंग और पदस्थापन के दौरान कथित तौर पर पैसे के बल पर पूरी वरिष्ठता व्यवस्था को उलट-पुलट किया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि कई जगहों पर जूनियर अभियंताओं को महत्वपूर्ण और प्रभावशाली जिम्मेदारियां देकर सीनियर अधिकारियों को किनारे लगाया जा रहा है। वहीं कुछ मामलों में वरिष्ठ पदों पर ऐसे चेहरों की तैनाती की गई है जिनकी सेवा अवधि और अनुभव अपेक्षाकृत कम है। इससे वर्षों से विभाग में काम कर रहे वरिष्ठ अभियंताओं के बीच गहरी नाराजगी पनप रही है।
विभागीय सूत्रों और पूर्व विधायक मंगल सिंह बोबोंगा का कहना है कि यह सिर्फ प्रशासनिक विसंगति नहीं, बल्कि विभाग की पेशेवर गरिमा और सेवा नियमों पर सीधा प्रहार है। बोबोंगा का आरोप है कि अगर योग्यता और वरिष्ठता की जगह आर्थिक प्रभाव और पहुंच को प्राथमिकता मिलेगी, तो इससे पूरी व्यवस्था चरमरा जाएगी।
सबसे बड़ी बात यह है कि अब तक जो वरिष्ठ अधिकारी चुप्पी साधे हुए थे, वे भी अब अपनी पीड़ा सार्वजनिक मंचों, बैठकों और निजी बातचीत में खुलकर जाहिर करने लगे हैं। कई अधिकारी इसे “मर्यादा तोड़ने वाली व्यवस्था” बता रहे हैं।
बोबोंगा ने कहा—
“जब विभाग में मेहनत, अनुभव और वरिष्ठता का सम्मान खत्म हो जाए और पैसा ही पद का पैमाना बन जाए, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि प्रशासनिक ढांचे की हत्या है।”
इस बढ़ते असंतोष ने ग्रामीण कार्य विभाग की अंदरूनी स्थिति को और ज्यादा विस्फोटक बना दिया है। माना जा रहा है कि अगर इस पर जल्द नियंत्रण नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में यह असंतोष बड़ा संगठनात्मक और राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है।
23 जून की बैठक पर सबकी नजर
अब पूरा राजनीतिक और प्रशासनिक महकमा 23 जून की स्थापना समिति की बैठक पर नजर टिकाए बैठा है।
यह बैठक सिर्फ ट्रांसफर की सूची नहीं तय करेगी, बल्कि यह भी बताएगी कि सरकार भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना चाहती है या पुराने खेल को जारी रखना चाहती है।
सवाल यही है—
* क्या मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस विभाग में “सर्जिकल स्ट्राइक” करेंगे?
* क्या दस अभियंताओं की शिकायत फिर खुलेगी?
* क्या बबलू मिश्रा उर्फ मामा जी की भूमिका की जांच होगी?
* और सबसे बड़ा सवाल— क्या ग्रामीण कार्य विभाग विकास का इंजन बनेगा या ट्रांसफर-पोस्टिंग की मंडी?
23 जून की बैठक इन सभी सवालों का जवाब तय कर सकती है। फिलहाल झारखंड की राजनीति में यह मुद्दा तेजी से विस्फोटक रूप लेता जा रहा है।














