स्थानीय बेरोजगारों को नौकरी और जर्जर सड़क निर्माण की मांग पर ग्रामीणों का आर-पार का ऐलान, मनोहरपुर–बड़बिल/किरीबुरू मार्ग ठप
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
सेल की चिड़िया माइंस से प्रभावित सारंडा के चिड़िया, बिनुआ, अंकुवा, लोडो, टिमरा और सोदा गांवों के ग्रामीणों ने अपनी वर्षों पुरानी मांगों को लेकर आखिरकार आर-पार की लड़ाई छेड़ दी है। संयुक्त ग्रामसभा परिषद के बैनर तले बुधवार (8 जुलाई) की सुबह 8 बजे से मनोहरपुर–बड़बिल/किरीबुरू मुख्य सड़क को चिड़िया-अंकुवा चौक के समीप अनिश्चितकाल के लिए जाम कर दिया गया। सड़क जाम के कारण इस महत्वपूर्ण मार्ग पर वाहनों का आवागमन पूरी तरह ठप हो गया है और दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।

‘हमारे हक का रोजगार दो, नहीं तो आंदोलन जारी रहेगा’
आंदोलन पर बैठे ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि रोजगार चाहिए। उनका कहना है कि सेल की खदानों से सबसे अधिक प्रभावित स्थानीय गांवों के युवाओं को आज भी रोजगार से वंचित रखा गया है, जबकि बाहरी लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन वापस नहीं लिया जाएगा।
ये हैं ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
ग्रामीणों ने आंदोलन के दौरान अपनी मांगों को दोहराते हुए कहा—
* स्थानीय बेरोजगारों को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार दिया जाए।
* सेल चिड़िया माइंस में स्थानीय नियोजन नीति लागू की जाए।
* “हमारे हक का रोजगार हमारा अधिकार” सुनिश्चित किया जाए।
* अंकुवा से चिड़िया तक लगभग पांच किलोमीटर जर्जर सड़क का शीघ्र पक्कीकरण कराया जाए।
‘सांसद, विधायक, सेल प्रबंधन, प्रशासन… सबको पत्र दिया, लेकिन किसी ने नहीं सुनी’
ग्रामीणों का आरोप है कि वे वर्षों से अपनी मांगों को लेकर सांसद, विधायक, सेल प्रबंधन और जिला प्रशासन के दरवाजे खटखटा रहे हैं। कई बार ज्ञापन और आवेदन दिए गए, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला, समाधान नहीं। उनका कहना है कि लगातार उपेक्षा के कारण उन्हें सड़क पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा।
15-20 वर्षों से बदहाल सड़क, हर दिन दुर्घटना का खतरा
ग्रामीणों ने बताया कि अंकुवा से चिड़िया तक लगभग पांच किलोमीटर सड़क पिछले 15 से 20 वर्षों से बेहद जर्जर अवस्था में है। बरसात के दिनों में यह सड़क और भी खतरनाक हो जाती है। आए दिन राहगीर दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं, लेकिन इसके बावजूद प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि वर्षों पहले अधिकारियों ने सड़क की मापी और सर्वे कर ग्रामीणों को भरोसा दिलाया था कि सड़क का निर्माण कराया जाएगा, लेकिन आज तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार कौन है—सरकार, प्रशासन या जनप्रतिनिधि?
पारंपरिक हथियारों के साथ आंदोलन में डटे ग्रामीण
आंदोलन में विभिन्न गांवों के पारंपरिक ग्राम प्रधान (मुंडा) और ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हैं। इनमें टिमरा के मुंडा गाजी सुरीन, सोदा के नाथु मुंडा, लोडो के मुंडा मंगल सुरीन, बिनुआ के मुंडा सोमा चेरवा, चिड़िया के मुंडा विजय सिंह लागुरी, अंकुवा के मुंडा बलभद्र जामूदा के अलावा अमर सिंह सिद्धू सहित दर्जनों ग्रामीण मौजूद हैं। कई ग्रामीण पारंपरिक हथियारों के साथ आंदोलन स्थल पर डटे हुए हैं और अपनी मांगों को लेकर एकजुटता का प्रदर्शन कर रहे हैं।

प्रशासन और सेल प्रबंधन की परीक्षा
यह आंदोलन अब केवल रोजगार की मांग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि स्थानीय अधिकार, विकास और वर्षों से चली आ रही उपेक्षा के खिलाफ जनआक्रोश का रूप ले चुका है। अब सबकी निगाहें सेल प्रबंधन और जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वे आंदोलनकारियों से वार्ता कर समस्या का समाधान निकालते हैं या यह आंदोलन और व्यापक रूप लेता है।












