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सारंडा के हक पर बाहरी मजदूरों का कब्जा? सेल खदानों में त्रिवेणी कंपनी के खिलाफ उबाल

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किरीबुरू-मेघाहातुबुरु में स्थानीय रोजगार का सवाल गरमाया, ग्रामीणों ने आंदोलन का दिया संकेत

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

किरीबुरू/मेघाहातुबुरु। सेल की किरीबुरू और मेघाहातुबुरु लौह अयस्क खदानों में कोर ड्रिलिंग का कार्य कर रही बड़ी ठेका कंपनी त्रिवेणी अर्थमूवर्स प्राइवेट लिमिटेड को लेकर सारंडा क्षेत्र के स्थानीय बेरोजगारों और ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी द्वारा खदान क्षेत्र में काम कराने के बावजूद अब तक प्रभावित गांवों के एक भी स्थानीय बेरोजगार को रोजगार का अवसर नहीं दिया गया है।

स्थानीय बेरोजगारों की जगह बाहरी श्रमिक!

ग्रामीणों का कहना है कि सारंडा की धरती से लौह अयस्क निकाला जा रहा है, खदानों से आसपास के गांव प्रभावित हो रहे हैं और क्षेत्र के हजारों युवक-युवतियां रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। इसके बावजूद खदानों में काम कराने के लिए स्थानीय श्रमिकों को प्राथमिकता देने के बजाय बाहर से मजदूर लाकर काम कराया जा रहा है।

ग्रामीणों के मुताबिक कंपनी के वाहन प्रतिदिन बाहरी श्रमिकों को लेकर खदान क्षेत्र में पहुंचते हैं। दिनभर काम कराने के बाद शाम को उन्हीं वाहनों से श्रमिकों को वापस ले जाया जाता है। इससे स्थानीय बेरोजगारों में यह सवाल उठ रहा है कि जब काम सारंडा की धरती पर है तो रोजगार का अधिकार स्थानीय लोगों को क्यों नहीं मिल रहा?

ओड़िशा के पचरी क्षेत्र में भी उठ चुका है सवाल

स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि यही कंपनी किरीबुरू से सटे ओड़िशा के पचरी गांव क्षेत्र में भी खनन कार्य कर रही है। ग्रामीणों के अनुसार उस क्षेत्र की खदानों की भौगोलिक सीमा और प्रभाव क्षेत्र से झारखंड के कई गांव भी जुड़े हुए हैं। बावजूद इसके झारखंड के प्रभावित गांवों के बेरोजगारों को वहां भी अपेक्षित रोजगार नहीं मिलने की शिकायत सामने आती रही है।

अब झारखंड स्थित किरीबुरू-मेघाहातुबुरु खदानों में भी स्थानीय रोजगार को लेकर इसी प्रकार का विवाद खड़ा होने लगा है।

सारंडा में मजदूरों की कमी नहीं

ग्रामीणों का कहना है कि सारंडा क्षेत्र में वर्षों से खनन गतिविधियों से जुड़े कुशल, अर्धकुशल और मेहनतकश मजदूरों की बड़ी संख्या मौजूद है। क्षेत्र के युवाओं को खदानों में विभिन्न प्रकार के कार्यों का अनुभव भी है। ऐसे में बाहर से श्रमिकों को लाकर काम कराना स्थानीय बेरोजगारों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार माना जा रहा है।

ग्रामीणों का सवाल है कि यदि स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर ही नहीं मिलेंगे तो खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और रोजगार के वादों का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिलेगा?

‘विस्थापन और प्रदूषण हमारा, रोजगार बाहर वालों का क्यों?’

ग्रामीणों में यह भावना तेजी से उभर रही है कि खनन का प्रभाव स्थानीय लोगों को झेलना पड़ता है। सड़क, धूल, प्रदूषण, भारी वाहनों की आवाजाही और पर्यावरणीय दबाव का सामना आसपास के ग्रामीण करते हैं, लेकिन जब रोजगार की बारी आती है तो स्थानीय लोगों को पीछे कर दिया जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि “अगर हमारी जमीन और हमारे क्षेत्र से खनिज निकल रहा है, तो रोजगार में पहला अधिकार भी यहां के प्रभावित लोगों का होना चाहिए।”

बढ़ सकता है आंदोलन का दायरा

स्थानीय बेरोजगारों और ग्रामीणों में बढ़ते आक्रोश के बीच आने वाले दिनों में इस मुद्दे को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू होने की संभावना जताई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि कंपनी और संबंधित प्रबंधन ने स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार देने की दिशा में ठोस पहल नहीं की तो वे सामूहिक रूप से आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।

बताया जा रहा है कि स्थानीय स्तर पर बेरोजगार युवाओं और ग्रामीण प्रतिनिधियों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। आने वाले दिनों में बैठक कर आंदोलन की रणनीति तय किए जाने की संभावना है।

सेल प्रबंधन से उठने लगे सवाल

खनन क्षेत्र में ठेका कंपनियों के माध्यम से होने वाले कार्यों में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना लंबे समय से क्षेत्र का प्रमुख मुद्दा रहा है। ऐसे में त्रिवेणी अर्थ एंड मूवर्स के कार्य में स्थानीय बेरोजगारों की कथित अनदेखी ने एक बार फिर रोजगार के सवाल को केंद्र में ला दिया है।

ग्रामीणों की मांग है कि सेल प्रबंधन पूरे मामले की जांच कर यह स्पष्ट करे कि कोर ड्रिलिंग कार्य में कितने स्थानीय श्रमिक कार्यरत हैं, कितने बाहरी श्रमिक लाए जा रहे हैं और प्रभावित गांवों के बेरोजगारों को रोजगार देने के लिए क्या व्यवस्था की गई है।

अब आर-पार की तैयारी!

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि वे किसी कंपनी के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन स्थानीय अधिकारों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी। यदि बाहर से श्रमिक लाकर स्थानीय युवाओं को रोजगार से वंचित करने का सिलसिला जारी रहा तो आंदोलन को व्यापक रूप दिया जाएगा।

सारंडा के बेरोजगारों का कहना है कि अब केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा। उन्हें खदानों में सम्मानजनक रोजगार और स्थानीय युवाओं के लिए प्राथमिकता चाहिए। यही मांग अब धीरे-धीरे आंदोलन का रूप लेती दिखाई दे रही है।

हालांकि, कंपनी और सेल प्रबंधन की ओर से इस संबंध में आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। उनका पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

SINGHBHUMHALCHAL NEWS

सिंहभूम हलचल न्यूज़ एक स्थानीय समाचार मंच है, जो पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड से सटीक और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए समर्पित है। यह राजनीति, अपराध, मौसम, संस्कृति और सामुदायिक मुद्दों को हिंदी में कवर करता है।

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