22 करोड़ से बनी सड़क की उम्र पर सवाल, 2027 तक मेंटेनेंस की जिम्मेदारी—फिर किसके आदेश पर हो रही भारी ढुलाई?
निर्माण के वक्त लोडेड वाहनों को थी मनाही, अब खुलेआम चल रहा अयस्क परिवहन? ग्रामीण पूछ रहे—आखिर आदेश किसका है?
रिपोर्ट शैलेश सिंह
सारंडा। सारंडा के मीना बाजार से पोंगा जंक्शन तक बनी लगभग 13 किलोमीटर लंबी ग्रामीण सड़क इन दिनों विकास और औद्योगिक परिवहन के बीच पैदा हुए एक बड़े सवाल का केंद्र बन गई है। करीब 22 करोड़ रुपये की लागत से वर्ष 2022 में बनी यह सड़क प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत तैयार की गई थी। सड़क की निर्धारित अधिकतम भार क्षमता लगभग 12 टन बताई जाती है और इसके मेंटेनेंस की अवधि वर्ष 2027 तक निर्धारित है।

लेकिन अब इसी सड़क पर सेल की मनोहरपुर ओर माइंस यानी चिड़िया खदान से लौह अयस्क लेकर 10 से 12 चक्का वाले भारी मालवाहक वाहनों के नियमित परिचालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का दावा है कि इन वाहनों में 20 टन से अधिक भार लेकर लगातार अयस्क ढुलाई की जा रही है। यही वजह है कि सड़क निर्माण के कुछ ही वर्षों बाद इसकी हालत तेजी से खराब होती जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जिस सड़क की डिजाइन क्षमता 12 टन है, उस पर 20 टन से अधिक भार वाले वाहनों की लगातार आवाजाही होगी तो सड़क आखिर कितने दिनों तक टिकेगी?
22 करोड़ की सड़क, लेकिन भार क्षमता से डेढ़ गुना ज्यादा बोझ
सड़क निर्माण से जुड़े उपलब्ध विवरण के अनुसार मीना बाजार से पोंगा जंक्शन तक करीब 13 किलोमीटर सड़क का निर्माण जमशेदपुर की विजय शंकर मिश्रा नामक ठेका कंपनी द्वारा लगभग 22 करोड़ रुपये की लागत से वर्ष 2022 में किया गया था।
यह सड़क सामान्य ग्रामीण आवागमन की जरूरतों को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनाई गई थी। सड़क का उद्देश्य सारंडा के ग्रामीण इलाकों को बाजार, अस्पताल, थाना, प्रखंड, अनुमंडल और अन्य प्रमुख स्थानों से बेहतर संपर्क उपलब्ध कराना था।
लेकिन वर्तमान में सड़क का इस्तेमाल जिस तरह भारी औद्योगिक परिवहन के लिए किया जा रहा है, उसने इसकी उपयोगिता और टिकाऊपन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

12 टन की सड़क पर 20 टन से अधिक भार का सवाल
सड़क की निर्धारित क्षमता और उस पर चल रहे वाहनों के भार के बीच का अंतर इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू है।
यदि किसी सड़क को अधिकतम करीब 12 टन भार के अनुरूप बनाया गया है और उस पर नियमित रूप से 20 टन से अधिक भार वाले भारी वाहन चलते हैं, तो सड़क पर सामान्य ग्रामीण यातायात की तुलना में कई गुना अधिक दबाव पड़ना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञ दृष्टि से देखा जाए तो किसी सड़क की उम्र केवल निर्माण की गुणवत्ता से तय नहीं होती। वाहनों का भार, प्रतिदिन वाहनों की संख्या, मौसम, जल निकासी, सड़क की बेस संरचना और रखरखाव जैसे कई कारक उसकी वास्तविक उम्र तय करते हैं।
ऐसे में ग्रामीणों का सवाल है कि यदि 2022 में बनी सड़क को 2027 तक मेंटेनेंस की जरूरत के साथ तैयार किया गया था, तो उससे पहले ही भारी वाहनों के कारण सड़क क्षतिग्रस्त होने पर इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
मेंटेनेंस 2027 तक, सड़क उससे पहले ही टूट गई तो?
यहां दूसरा बड़ा सवाल ठेका कंपनी की जवाबदेही से जुड़ता है।
सड़क निर्माण के बाद निर्धारित मेंटेनेंस अवधि के दौरान ठेकेदार की जिम्मेदारियां होती हैं। लेकिन यदि सड़क को उसकी निर्धारित डिजाइन क्षमता से कहीं अधिक भार वाले वाहनों के लिए लगातार इस्तेमाल किया जाता है और इससे सड़क समय से पहले क्षतिग्रस्त होती है, तो यह जांच का विषय होना चाहिए कि नुकसान निर्माण गुणवत्ता के कारण हुआ या सड़क के अत्यधिक/अनुमति से बाहर उपयोग के कारण।
ग्रामीणों की चिंता है कि कहीं ऐसा न हो कि कुछ वर्षों में सड़क पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाए और उसके बाद जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने का सिलसिला शुरू हो जाए।
22 करोड़ रुपये की सरकारी योजना से बनी सड़क की उम्र कम होती है तो आर्थिक नुकसान अंततः सरकारी खजाने और ग्रामीणों को ही उठाना पड़ेगा।

निर्माण के समय लोडेड वाहन को नहीं थी अनुमति!
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू सड़क निर्माण के दौरान लागू व्यवस्था से जुड़ा बताया जा रहा है।
ग्रामीणों और मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार सड़क निर्माण के दौरान चिड़िया खदान से लौह अयस्क परिवहन में लगे लोडेड वाहनों को इस ग्रामीण सड़क से गुजरने की अनुमति नहीं थी।
व्यवस्था यह थी कि खदान से लौह अयस्क लोड कर वाहन फॉरेस्ट रोड के रास्ते मनोहरपुर रेलवे साइडिंग तक जाते थे। वहां अयस्क अनलोड करने के बाद खाली वाहन वापस इसी ग्रामीण सड़क के रास्ते खदान की ओर जाते थे।
अर्थात सड़क का इस्तेमाल खाली वाहनों की आवाजाही के लिए किया जाता था, जबकि अयस्क से लदे भारी वाहनों के लिए अलग मार्ग का इस्तेमाल होता था।
अब ग्रामीण इसी व्यवस्था को आधार बनाकर सवाल उठा रहे हैं कि जब निर्माण के समय सड़क पर लोडेड वाहनों के परिचालन को लेकर स्पष्ट रोक या सीमा थी, तो वर्तमान में उसी सड़क पर भारी लोडेड वाहनों का परिचालन किस आधार पर शुरू हुआ?

RWD चक्रधरपुर के आदेश पर भी उठे सवाल
मामले से जुड़े सूत्रों का दावा है कि ग्रामीण कार्य विभाग (RWD), चक्रधरपुर की ओर से इस सड़क को लौह अयस्क के भारी परिवहन के लिए इस्तेमाल किए जाने संबंधी कोई आदेश आज तक जारी नहीं किया गया है।
हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग से होना बाकी है।
यदि वास्तव में विभाग की ओर से कोई अनुमति या आदेश जारी नहीं हुआ है, तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है—

“आखिर किसके आदेश पर रोज दौड़ रहे हैं भारी अयस्क वाहन?”
क्या सेल प्रबंधन ने स्वयं परिवहन का रास्ता निर्धारित किया है?
क्या परिवहन कंपनी के पास कोई अलग अनुमति है?
क्या स्थानीय स्तर पर कोई प्रशासनिक सहमति दी गई है?
या फिर वर्षों से चली आ रही व्यवस्था के आधार पर ही भारी वाहनों का परिचालन जारी है?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब सार्वजनिक होना जरूरी है।
सड़क टूट रही है, परेशानी ग्रामीणों की बढ़ रही
इस पूरे मामले का सबसे सीधा असर सारंडा के ग्रामीणों पर पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क पर लगातार भारी वाहनों के परिचालन से सड़क की सतह तेजी से टूट रही है। जगह-जगह गड्ढे बन रहे हैं और कई हिस्सों में आवागमन मुश्किल हो गया है।
बाइक, ऑटो, छोटे चारपहिया वाहन और पैदल चलने वाले ग्रामीणों को भारी वाहनों के बीच से गुजरना पड़ता है। इससे दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती है।
ग्रामीणों का कहना है कि अयस्क परिवहन का लाभ खनन और परिवहन व्यवस्था से जुड़े लोगों को मिल सकता है, लेकिन सड़क टूटने और दुर्घटना के खतरे का सीधा खामियाजा स्थानीय ग्रामीण भुगत रहे हैं।
पहले हादसा, फिर विरोध—फिर भी सवाल कायम
इसी मार्ग और क्षेत्र में भारी वाहनों की आवाजाही को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश पहले भी सामने आ चुका है। कुछ माह पूर्व एक ग्रामीण चिकित्सक की मालवाहक वाहन की चपेट में आने से मौत के बाद ग्रामीणों ने सड़क जाम कर अयस्क ढुलाई रोक दी थी।
उस घटना ने यह सवाल गंभीर बना दिया था कि खनन परिवहन और ग्रामीण यातायात के बीच सुरक्षा का संतुलन आखिर कैसे कायम किया जाए।
लेकिन घटना के बाद भी सड़क की स्थिति और भारी वाहनों के परिचालन को लेकर स्थायी समाधान सामने नहीं आने से ग्रामीणों में नाराजगी बनी हुई है।

सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, जवाबदेही का भी है
अब मामला केवल जर्जर सड़क की मरम्मत तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें कई स्तरों पर जवाबदेही तय करने की जरूरत दिखाई देती है।
पहला— सड़क की वास्तविक भार क्षमता क्या है?
दूसरा— वर्तमान में चल रहे भारी वाहनों का वास्तविक भार कितना है?
तीसरा— इस सड़क पर लोडेड अयस्क वाहनों के परिचालन की लिखित अनुमति किस विभाग ने दी है?
चौथा— यदि RWD चक्रधरपुर ने अनुमति नहीं दी है तो परिवहन किस आदेश के आधार पर हो रहा है?
पांचवां— सड़क समय से पहले क्षतिग्रस्त होती है तो मरम्मत का खर्च कौन उठाएगा?
छठा— सड़क निर्माण और मेंटेनेंस की शर्तों के तहत ठेका कंपनी की जिम्मेदारी किस सीमा तक होगी?
और सबसे अहम— क्या ग्रामीणों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारी वाहनों के लिए अलग और मजबूत परिवहन मार्ग की व्यवस्था की जाएगी?
अब जांच जरूरी, वरना 22 करोड़ की सड़क फिर बनेगी बोझ
ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन, RWD, सेल प्रबंधन और संबंधित परिवहन एजेंसियां संयुक्त रूप से सड़क की तकनीकी जांच कराएं। सड़क की डिजाइन क्षमता, वर्तमान क्षति, प्रतिदिन गुजरने वाले वाहनों की संख्या और उनके भार का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि मीना बाजार से पोंगा जंक्शन तक बनी इस ग्रामीण सड़क पर लोडेड लौह अयस्क वाहनों के परिचालन की अनुमति आखिर किसके आदेश से है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि सड़क आज कितनी टूटी है।
बड़ा सवाल यह है कि 22 करोड़ रुपये से बनी 12 टन क्षमता वाली सड़क को 20 टन से अधिक भार वाले वाहनों के हवाले करके यदि समय से पहले खत्म कर दिया गया, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा—सरकार, सेल, ठेकेदार या फिर वही सारंडा के ग्रामीण, जिनके आवागमन के लिए यह सड़क बनाई गई थी?










