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सारंडा की खदानों से DMFT में 270 करोड़ जमा, फिर भी खनन प्रभावित गांव बदहाल! आखिर कहां जा रहा विकास का पैसा?

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चिड़िया और गुवा खदानों से तीन वित्तीय वर्षों में ₹270.26 करोड़ जमा, अकेले 2025-26 में ₹76.78 करोड़ का योगदान; सुशील बारला ने उठाए गंभीर सवाल, झारखंड हाईकोर्ट की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच की मांग

रिपोर्ट शैलेश सिंह

किरीबुरू/सारंडा। पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा क्षेत्र में स्थित चिड़िया (मनोहरपुर) और गुवा लौह अयस्क खदानों से जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) मद में करोड़ों-अरबों रुपये जमा हो रहे हैं, लेकिन खनन प्रभावित गांवों की बदहाली आज भी दूर नहीं हो पाई है। जिन गांवों की जमीन, जंगल, जल और पर्यावरण से लौह अयस्क का खनन कर सरकार और खनन कंपनियां भारी राजस्व अर्जित कर रही हैं, उन्हीं गांवों के ग्रामीण आज भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधा, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वच्छ पेयजल, पक्की सड़क, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के नाम पर DMFT में इतनी विशाल राशि जमा हो रही है, तो सारंडा के प्रभावित गांवों की तस्वीर क्यों नहीं बदल रही है? आखिर इन गांवों के हिस्से का विकास कहां अटक गया है? क्या DMFT की राशि वास्तव में खनन प्रभावित ग्रामीणों के जीवन स्तर को सुधारने में खर्च हो रही है या फिर विकास के नाम पर दूसरे क्षेत्रों और अन्य कार्यों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है?

भारत आदिवासी पार्टी के पश्चिमी सिंहभूम जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए DMFT की राशि के उपयोग, योजनाओं की स्वीकृति, निविदा, कार्यादेश और भुगतान से लेकर धरातल पर हुए कार्यों तक की झारखंड उच्च न्यायालय, रांची की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।

 

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तीन वर्षों में DMFT में जमा हुए 270 करोड़ से अधिक, आंकड़े देखकर चौंक जाएंगे!

सेल निगमित कार्यालय, नई दिल्ली के पत्रांक HR/RTI/CO/26/060 से प्राप्त जानकारी के अनुसार पश्चिमी सिंहभूम जिले की चिड़िया लौह अयस्क खान (मनोहरपुर) एवं गुवा लौह अयस्क खान से वित्तीय वर्ष 2025-26 में DMFT मद में कुल ₹76,78,91,642 यानी लगभग 76.79 करोड़ रुपये जमा किए गए हैं।

वहीं वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2025-26 तक इन दोनों खदानों से DMFT मद में कुल ₹2,70,26,88,195 यानी लगभग 270.27 करोड़ रुपये जमा किए गए हैं।

वित्तीय अवधि जमा राशि
2025-26 ₹76.78 करोड़
2023-24 से 2025-26 तक कुल ₹270.26 करोड़

ये आंकड़े अपने आप में बताते हैं कि सारंडा की खनिज संपदा से DMFT को कितनी बड़ी आर्थिक ताकत मिल रही है। लेकिन इस आर्थिक ताकत का लाभ खनन प्रभावित गांवों के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा, यह जांच का सबसे महत्वपूर्ण विषय है।

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खदानें सारंडा की, खनिज संपदा सारंडा की, फिर विकास से वंचित क्यों हैं यहां के गांव?

सारंडा के जंगलों में दशकों से लौह अयस्क का खनन हो रहा है। चिड़िया और गुवा जैसी खदानों से भारी मात्रा में खनिज संपदा का दोहन किया जा रहा है। खनन गतिविधियों का सीधा असर आसपास के गांवों, जंगलों, जलस्रोतों, पर्यावरण और ग्रामीणों की आजीविका पर पड़ता है।

इसके बावजूद खनन प्रभावित गांवों में आज भी अनेक बुनियादी समस्याएं बनी हुई हैं। कहीं ग्रामीणों को बेहतर इलाज के लिए दूर-दराज के अस्पतालों का चक्कर लगाना पड़ता है, तो कहीं बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए संघर्ष करना पड़ता है। कई गांवों में सड़क, पेयजल, सिंचाई, रोजगार और अन्य जरूरी सुविधाओं की मांग वर्षों से उठती रही है।

ग्रामीणों की अपेक्षा थी कि DMFT की भारी-भरकम राशि से सारंडा के प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य केंद्रों का सुदृढ़ीकरण, स्कूलों का विकास, पेयजल योजनाएं, सड़क निर्माण, सिंचाई व्यवस्था, आजीविका के साधन और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। लेकिन अपेक्षित सर्वांगीण विकास का अभाव कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

 

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खनन प्रभावितों के हिस्से का पैसा दूसरे क्षेत्रों में खर्च करने का आरोप, जांच से खुलेगा राज!

सुशील बारला ने आरोप लगाया कि DMFT की राशि का मूल उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों का विकास करना है, लेकिन सारंडा के वास्तविक प्रभावित गांवों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिल रही है। उनका कहना है कि जब इन खदानों से सैकड़ों करोड़ रुपये DMFT में जमा हो रहे हैं, तब भी प्रभावित गांवों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव इस बात की जांच की मांग करता है कि आखिर राशि का उपयोग किन योजनाओं और किन क्षेत्रों में किया जा रहा है।

उन्होंने आशंका जताई कि खनन प्रभावित गांवों के विकास के लिए उपलब्ध राशि का इस्तेमाल दूसरे क्षेत्रों और अन्य कार्यों में किया जा रहा है। यदि ऐसा हुआ है तो यह DMFT के मूल उद्देश्य और खनन प्रभावित ग्रामीणों के हितों के साथ गंभीर अन्याय है।

उन्होंने मांग की कि यह भी जांच हो कि कहीं विकास योजनाओं के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट, वित्तीय अनियमितता और लूट तो नहीं हो रही है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि निष्पक्ष जांच और संबंधित अभिलेखों की पड़ताल से ही हो सकेगी।

हाईकोर्ट की निगरानी में जांच की मांग, योजनाओं से लेकर भुगतान तक खुले हर फाइल का हिसाब

भारत आदिवासी पार्टी के जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2025-26 तक चिड़िया एवं गुवा लौह अयस्क खदानों से DMFT मद में जमा कुल राशि और उसके उपयोग की झारखंड उच्च न्यायालय, रांची की निगरानी में उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।

उन्होंने जांच के दायरे में निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल करने की मांग की है—

  1. दोनों खदानों से DMFT मद में जमा कुल राशि का वर्षवार और खदानवार पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए।
  2. DMFT मद से स्वीकृत सभी योजनाओं, उनकी प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृतियों की जांच हो।
  3. योजनाओं की निविदा प्रक्रिया, ठेकेदारों को जारी कार्यादेश और भुगतान का पूरा रिकॉर्ड खंगाला जाए।
  4. किन योजनाओं पर कितना पैसा खर्च हुआ और वास्तविक निर्माण कार्य कितना हुआ, इसकी भौतिक जांच कराई जाए।
  5. खनन प्रभावित गांवों के बजाय दूसरे क्षेत्रों में राशि खर्च किए जाने के मामलों की पड़ताल हो।
  6. अधूरी, कागजी अथवा निर्धारित समय सीमा से अधिक विलंबित योजनाओं की जिम्मेदारी तय की जाए।
  7. योजनाओं की गुणवत्ता और उनसे वास्तविक लाभान्वित ग्रामीणों की संख्या का सत्यापन कराया जाए।
  8. वित्तीय अनियमितता, राशि के दुरुपयोग या अधिकारियों एवं संबंधित एजेंसियों की लापरवाही सामने आने पर दोषियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।

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कागजों पर विकास या जमीन पर हकीकत? DMFT योजनाओं का हो भौतिक सत्यापन

सुशील बारला ने कहा कि केवल फाइलों में योजनाओं की स्वीकृति, कार्यादेश और भुगतान दिखा देने से विकास नहीं हो जाता। यह देखना जरूरी है कि जिस गांव के नाम पर योजना स्वीकृत हुई, वहां वास्तव में काम हुआ भी है या नहीं। यदि सड़क निर्माण के नाम पर राशि खर्च हुई है तो सड़क की स्थिति क्या है? यदि पेयजल योजना के नाम पर भुगतान हुआ है तो ग्रामीणों को नियमित पानी मिल रहा है या नहीं? यदि स्वास्थ्य और शिक्षा के नाम पर बजट आवंटित हुआ है तो उसका लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचा या नहीं?

उन्होंने मांग की कि DMFT से कराए गए सभी कार्यों का स्वतंत्र तकनीकी एवं सामाजिक ऑडिट कराया जाए। संबंधित गांवों के ग्रामीणों से पूछताछ कर योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता और गुणवत्ता का भी आकलन किया जाए।

 

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खनिज संपदा से करोड़ों का राजस्व, लेकिन आदिवासी और ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के लिए मोहताज!

सुशील बारला ने कहा कि खनिज संपदा से सरकार और संबंधित संस्थानों को भारी राजस्व प्राप्त हो रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा का दोहन हो रहा है, उसी क्षेत्र के ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह स्थिति किसी भी कीमत पर उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि DMFT का गठन खनन प्रभावित क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के उद्देश्य से किया गया है। इसलिए इस मद में जमा होने वाली राशि का पहला अधिकार उन ग्रामीणों का होना चाहिए, जो खनन गतिविधियों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव झेल रहे हैं।

सुशील बारला की दो टूक- DMFT की राशि खनन प्रभावितों की अमानत, बंदरबांट बर्दाश्त नहीं!

सुशील बारला ने स्पष्ट कहा कि DMFT की राशि किसी अधिकारी, ठेकेदार या विभाग की मनमर्जी से खर्च करने का फंड नहीं है। यह खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और वहां के लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए निर्धारित राशि है। इसका उपयोग पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सारंडा के गांवों को उनके अधिकारों से वंचित रखकर विकास का दावा करना बेमानी है। यदि करोड़ों रुपये जमा होने के बावजूद प्रभावित गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क, रोजगार और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

अब जरूरत केवल DMFT में जमा अरबों रुपये के आंकड़े गिनाने की नहीं, बल्कि एक-एक रुपये के खर्च का हिसाब सार्वजनिक करने की है। सारंडा के ग्रामीणों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनकी जमीन और जंगलों से निकले लौह अयस्क के बदले उनके गांवों के विकास पर कितना पैसा खर्च हुआ। आखिर सारंडा की खनिज संपदा से DMFT का खजाना भर रहा है, तो सारंडा के गांवों की बदहाली कब दूर होगी?

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