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मेघाहातुबुरु खदान की 100 फीट गहरी खाई, चट्टानों के बीच जिंदगी की जंग और NDRF का वैज्ञानिक रेस्क्यू ऑपरेशन

On: June 6, 2026 2:56 PM
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मेघाहातुबुरु खदान में लैंड स्लाइड पर मॉक ड्रिल, NDRF-CISF-सेल-CRPF-वन विभाग और अस्पताल टीम ने दिखाया बेहतरीन तालमेल

रिपोर्ट : शैलेश सिंह

सारंडा की दुर्गम पहाड़ियों और लौह अयस्क खदानों के बीच यदि कभी कोई बड़ी प्राकृतिक या औद्योगिक आपदा आ जाए तो सैकड़ों जिंदगियों को बचाने की चुनौती कितनी कठिन हो सकती है, इसका जीवंत प्रदर्शन 6 जून को सेल की मेघाहातुबुरु खदान में देखने को मिला। यहां राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की 9वीं बटालियन, पटना ने अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों और विशेष रेस्क्यू उपकरणों के साथ विशाल मॉक ड्रिल का आयोजन किया।
इस अभियान का नेतृत्व उप समादेष्टा विनय कुमार ने किया, जबकि उनके साथ CISF किरीबुरू-मेघाहातुबुरु यूनिट के उप समादेष्टा इंगले मयूर दादाराव और उनकी टीम भी पूरी सक्रियता के साथ मौजूद रही।
मॉक ड्रिल में सेल किरीबुरू के महाप्रबंधक राम सिंह, मेघाहातुबुरु खदान के महाप्रबंधक प्रभारी संजय कुमार सिंह, सुरक्षा विभाग, सीआरपीएफ, वन विभाग, किरीबुरू पुलिस, सेल अस्पताल की चिकित्सक डॉ. अर्चना बेक के नेतृत्व में मेडिकल टीम तथा विभिन्न एजेंसियों के अधिकारी और कर्मी शामिल हुए।

कल्पित लैंड स्लाइड, लेकिन हालात बिल्कुल वास्तविक

मॉक ड्रिल की कहानी एक बड़े लैंड स्लाइड हादसे पर आधारित थी। अभ्यास के अनुसार मेघाहातुबुरु खदान में अचानक भारी भूस्खलन हो गया और पांच श्रमिक मलबे और चट्टानों के बीच फंस गए। कई गंभीर रूप से घायल थे और एक श्रमिक विशाल चट्टानों के नीचे दबा हुआ था।
हादसे की सूचना मिलते ही पहले सेल और CISF की स्थानीय टीम ने अपने उपलब्ध संसाधनों के साथ राहत एवं बचाव कार्य प्रारंभ किया। जब स्थिति गंभीर मानी गई तो इसे मेजर डिजास्टर मानते हुए NDRF को बुलाया गया।
इसके बाद शुरू हुआ आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षित मानव संसाधनों का ऐसा प्रदर्शन, जिसने सभी को प्रभावित कर दिया।

रेस्क्यू ऑपरेशन का सबसे कठिन चरण, 100 फीट गहरी खाई से निकाला घायल

मॉक ड्रिल का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा वह था, जब एक श्रमिक को चट्टानों और मलबे के बीच से निकालना था। NDRF के जवानों ने विशेष रस्सी प्रणाली, रोपवे स्ट्रक्चर और ऊंचाई से बचाव की तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए लगभग 100 फीट गहरी खाई तक सुरक्षित पहुंच बनाई।
विशेष हार्नेस, स्ट्रेचर और नियंत्रित रोप सिस्टम की मदद से घायल को सुरक्षित बाहर निकाला गया। पूरे अभियान के दौरान प्रत्येक कदम वैज्ञानिक तरीके से संचालित किया गया ताकि बचाव दल और घायल दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

वैज्ञानिक पद्धति से बना कमांड सिस्टम

NDRF ने घटना स्थल पर पहुंचते ही पूरे क्षेत्र को व्यवस्थित ढंग से विभाजित किया। ऑपरेशन के लिए अलग-अलग पोस्ट स्थापित किए गए, जिनमें शामिल थे—
* कम्युनिकेशन पोस्ट
* मेडिकल पोस्ट
* कमांड पोस्ट
* स्टेजिंग पोस्ट
* रेस्क्यू जोन
* सुरक्षा घेरा
इस व्यवस्था का उद्देश्य सभी एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करना और बिना भ्रम की स्थिति के राहत अभियान को आगे बढ़ाना था।

उप समादेष्टा विनय कुमार बोले—हर सेकेंड कीमती होता है

NDRF की 9वीं बटालियन के उप समादेष्टा विनय कुमार ने कहा कि किसी भी लैंड स्लाइड या बड़े हादसे में शुरुआती कुछ घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
उन्होंने कहा,
“घटना के बाद सबसे पहले CISF और सेल की टीम ने अपने संसाधनों से राहत कार्य प्रारंभ किया। इसके बाद NDRF को बुलाया गया। हमारी टीम ने मौके पर पहुंचकर सीन को सुरक्षित किया, उसका आकलन किया और आधुनिक तकनीकों के माध्यम से फंसे लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने का सफल अभ्यास किया।”
उन्होंने बताया कि NDRF अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में नियमित रूप से ऐसे मॉक ड्रिल आयोजित करती है ताकि संभावित कमियों की पहचान की जा सके और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल विकसित हो सके।

सबसे बड़ी चुनौती होती है कम्युनिकेशन और पीड़ितों तक पहुंचना

विनय कुमार ने कहा कि किसी भी बड़ी आपदा के दौरान सड़क, संचार व्यवस्था प्रभावित हो जाती है। ऐसे में राहत कार्य में सबसे बड़ी चुनौती फंसे लोगों तक पहुंचना और उनके साथ संपर्क स्थापित करना होता है।
उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन की भूमिका भी बेहद अहम होती है। प्रशासन को जरूरत पड़ने पर ग्रीन कॉरिडोर बनाना, सड़क मार्ग खाली कराना, एंबुलेंस और मेडिकल टीम उपलब्ध कराना तथा आवश्यकता होने पर हेलीकॉप्टर जैसी सुविधाओं की व्यवस्था करनी चाहिए।

CISF ने कहा—NDRF जैसा दूसरा कोई नहीं

CISF के उप समादेष्टा इंगले मयूर दादाराव ने NDRF की कार्यशैली की सराहना करते हुए कहा,
“आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में NDRF जैसी दूसरी कोई एजेंसी नहीं है। उसके जवान दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर पूरी निष्ठा के साथ कार्य करते हैं।”
उन्होंने कहा कि CISF भी भविष्य में ऐसे संसाधनों को बढ़ाने और प्रशिक्षण को मजबूत करने का प्रयास करेगी, जिससे किसी भी आपदा की स्थिति में और प्रभावी ढंग से काम किया जा सके।

NDRF से बहुत कुछ सीखने को मिला : संजय कुमार सिंह

मेघाहातुबुरु खदान के महाप्रबंधक प्रभारी संजय कुमार सिंह ने कहा कि यह मॉक ड्रिल सभी एजेंसियों के लिए एक बड़ा सीखने का अवसर रहा।
उन्होंने कहा,
“NDRF के पास अत्याधुनिक संसाधन और वैज्ञानिक तकनीकें हैं। इस अभ्यास में CISF और अन्य एजेंसियों का बेहतरीन तालमेल देखने को मिला। जहां लैंड स्लाइड हुआ है, उस क्षेत्र को तत्काल सुरक्षा घेरे में ले लेना चाहिए ताकि अनावश्यक लोगों की आवाजाही बंद हो सके।”

कार्य स्थल पर श्रमिकों की सही संख्या का रिकॉर्ड जरूरी : राम सिंह

सेल किरीबुरू के महाप्रबंधक राम सिंह ने कहा कि किसी भी औद्योगिक क्षेत्र में यह जानकारी हमेशा उपलब्ध रहनी चाहिए कि कार्य स्थल पर कितने कर्मचारी काम कर रहे हैं।
उन्होंने कहा,
“यदि दुर्घटना होती है तो यह पता होना चाहिए कि कितने लोग सुरक्षित बाहर निकल चुके हैं और कितने अभी भी फंसे हुए हैं। इससे रेस्क्यू ऑपरेशन को सही दिशा मिलती है। साथ ही NDRF जैसी एजेंसियों से जल्द सहायता कैसे प्राप्त की जाए, इसकी जानकारी भी सभी को होनी चाहिए।”

घायलों की संख्या बढ़ने पर एंबुलेंस की कमी बड़ी चुनौती

किरीबुरू खदान के सुरक्षा अधिकारी रथिन बिस्वास ने कहा कि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में सबसे पहले सेल, CISF और अस्पताल के आपातकालीन नंबरों पर सूचना दी जाती है।
उन्होंने बताया,
“यदि घायलों की संख्या अधिक हो जाती है तो एंबुलेंस की कमी एक बड़ी समस्या बन जाती है। ऐसे समय में अन्य उपलब्ध वाहनों का भी उपयोग करना पड़ता है।”

अनुभवों का हुआ आदान-प्रदान

इस अवसर पर NDRF के कंपनी कमांडर राम कुमार सिंह, CISF के इंस्पेक्टर अरविंद, मेघाहातुबुरु के सुरक्षा अधिकारी मानस रंजन राउत, वन विभाग के शंकर पांडेय तथा CRPF के अधिकारियों ने भी आपदा प्रबंधन से जुड़े अपने अनुभव साझा किए।
उन्होंने कहा कि किसी भी बड़े हादसे में अकेली एजेंसी सफलता हासिल नहीं कर सकती। सभी विभागों के बीच सामंजस्य और संयुक्त अभ्यास ही वास्तविक आपदा के समय बड़ी संख्या में लोगों की जान बचा सकता है।

सारंडा जैसे दुर्गम क्षेत्र में ऐसी तैयारी क्यों जरूरी है

सारंडा का इलाका घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और विशाल लौह अयस्क खदानों के लिए जाना जाता है। यहां खनन कार्य के दौरान प्राकृतिक और तकनीकी दोनों प्रकार की चुनौतियां बनी रहती हैं।
ऐसे में NDRF की यह मॉक ड्रिल केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि भविष्य की संभावित आपदाओं से निपटने की व्यापक तैयारी का हिस्सा है।

मॉक ड्रिल का संदेश : तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव

मेघाहातुबुरु खदान में आयोजित इस संयुक्त मॉक ड्रिल ने यह स्पष्ट कर दिया कि आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित मानव संसाधन, मजबूत कम्युनिकेशन नेटवर्क और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल से बड़ी से बड़ी आपदा का प्रभाव कम किया जा सकता है।
100 फीट गहरी खाई से घायल को सुरक्षित निकालने से लेकर मेडिकल पोस्ट, कमांड पोस्ट और वैज्ञानिक रेस्क्यू सिस्टम की स्थापना तक पूरे अभियान ने यह संदेश दिया कि संकट की घड़ी में समय पर लिया गया सही निर्णय अनगिनत जिंदगियों को बचा सकता है।
NDRF, CISF, सेल प्रबंधन, CRPF, वन विभाग, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि जब सभी एजेंसियां एक मंच पर आती हैं तो आपदा के सामने भी उम्मीद की नई किरण जगाई जा सकती है।

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