मुख्य सचिव के आदेश पर भारी पड़ रहा एक अंडर सेक्रेटरी का प्रभाव! सूत्रों के दावों ने खड़े किए कई बड़े सवाल
रिपोर्ट : शैलेश सिंह
झारखंड में पुलिस विभाग के चर्चित ट्रेजरी घोटाले के बाद मुख्य सचिव द्वारा विभिन्न विभागों में वित्तीय और स्थापना व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए गए हैं। इन्हीं निर्देशों के तहत लेखा लिपिकों के प्रमंडल स्तर पर स्थानांतरण की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाया जाना था। लेकिन ग्रामीण कार्य विभाग में यह मामला अब सवालों के घेरे में आता दिखाई दे रहा है।
सूत्रों का दावा है कि अन्य विभागों से सेवा प्राप्त लगभग बीस लेखा लिपिकों की स्थानांतरण संबंधी संचिकाएं लंबे समय से लंबित पड़ी हुई हैं और इन पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा रहा है।

क्या मुख्य सचिव के आदेश से ऊपर है विभागीय व्यवस्था?
सूत्रों के अनुसार ग्रामीण कार्य विभाग में कार्यरत अंडर सेक्रेटरी विजय कुमार भगत प्रमंडल स्तर के बजाय जिला स्तर पर, यानी एक डिवीजन से दूसरे डिवीजन में स्थानांतरण कराने की प्रक्रिया पर जोर दे रहे हैं। जबकि दावा किया जा रहा है कि मुख्य सचिव के निर्देशों के अनुरूप व्यापक स्तर पर स्थानांतरण किया जाना है।
यदि यह दावा सही है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विभागीय स्तर पर ऐसी व्यवस्था क्यों अपनाई जा रही है, जो सरकार की मंशा से अलग प्रतीत होती है।
बीस लेखा लिपिकों की संचिका आखिर क्यों लंबित?
सूत्रों का आरोप है कि सेवा प्राप्त बीस लेखा लिपिकों की ट्रांसफर संचिका आर्थिक स्वार्थों के कारण दबाकर रखी गई है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन विभागीय गलियारों में इसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं।
सरकारी व्यवस्था में किसी भी फाइल का अनावश्यक रूप से लंबित रहना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
एक अधिकारी के पास इतना बड़ा कार्यभार क्यों?
ग्रामीण कार्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर एक और बड़ा सवाल उठ रहा है। सूत्रों के अनुसार विजय कुमार भगत के अधीन स्थापना, स्थापना मुख्यालय, डीडीओ, अभियंताओं की पोस्टिंग, स्थानांतरण, लेखा लिपिकों से संबंधित संचिकाएं, योजना आवंटन तथा आवंटन विमुक्ति जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य हैं।
इसके अलावा आरईओ और स्पेशल डिवीजन के विभिन्न स्तर के अभियंताओं के स्थानांतरण और स्थापना संबंधी मामलों में भी उनकी भूमिका बताई जा रही है।
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग में अन्य सक्षम पदाधिकारी नहीं हैं, जिन्हें इन महत्वपूर्ण दायित्वों का हिस्सा बनाया जा सके?
ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर वसूली के आरोप
सूत्रों का यह भी दावा है कि मनचाहे डिवीजन में स्थानांतरण कराने के नाम पर आर्थिक दोहन और अवैध वसूली की शिकायतें मिल रही हैं। इतना ही नहीं, आवंटन विमुक्ति के मामलों में भी विभिन्न कार्यपालक अभियंताओं से आर्थिक लेन-देन के आरोप लगाए जा रहे हैं।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्ष का बयान भी सामने नहीं आया है। लेकिन यदि इन दावों में सच्चाई है तो यह सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
क्या निगरानी जांच की जरूरत है?
सूत्रों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर यह मांग उठने लगी है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच मंत्रिमंडल निगरानी विभाग या किसी सक्षम एजेंसी से कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि लंबित संचिकाओं के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं और क्या किसी प्रकार की अनियमितता हुई है।
आय से अधिक संपत्ति के आरोप भी चर्चा में
सूत्रों के अनुसार विजय कुमार भगत के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति की जांच की मांग भी उठ सकती है। हालांकि इस संबंध में अब तक किसी सक्षम एजेंसी द्वारा कोई आधिकारिक कार्रवाई या पुष्टि सार्वजनिक नहीं की गई है।
कानूनी दृष्टि से किसी भी व्यक्ति को दोषी तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक सक्षम जांच एजेंसी या न्यायालय द्वारा तथ्य स्थापित न कर दिए जाएं।
क्या दागदार हो रहा है सेवा इतिहास?
विभागीय हलकों में यह चर्चा भी है कि उच्च पदों तक पहुंचने की दौड़ में यदि प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं तो यह किसी भी अधिकारी के सेवा इतिहास पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
सूत्रों का कहना है कि यदि समय रहते लंबित संचिकाओं का निपटारा नहीं हुआ और आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई तो यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है।

सबसे बड़ा सवाल
* मुख्य सचिव के निर्देशों के बावजूद संचिकाएं लंबित क्यों हैं?
* एक ही अधिकारी के पास इतने महत्वपूर्ण प्रभार क्यों हैं?
* ट्रांसफर और आवंटन को लेकर उठ रहे आरोपों की जांच कौन करेगा?
* क्या विभाग पारदर्शिता के लिए स्वतंत्र जांच को तैयार है?
जब तक इन सवालों के जवाब सामने नहीं आते, तब तक ग्रामीण कार्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रही शंकाएं खत्म होना मुश्किल दिखता है। अब निगाहें सरकार और निगरानी एजेंसियों पर टिकी हैं कि वे इन आरोपों और चर्चाओं को किस गंभीरता से लेती हैं।













