एक तरफ दिहाड़ी मजदूर बेटा, दूसरी तरफ करोड़ों का इनामी पिता—चार दशक तक दहशत फैलाने वाले माओवादी सरगना का आखिरकार हुआ अंत।
रिपोर्ट: शैलेश सिंह
करीब चार दशक तक जंगलों में बंदूक के दम पर दहशत का साम्राज्य खड़ा करने वाला प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) का शीर्ष नेता और पोलित ब्यूरो का आखिरी सक्रिय सदस्य मिसिर बेसरा आखिरकार सुरक्षा एजेंसियों के शिकंजे में आ गया। धनबाद जिले में हुई कार्रवाई में उसे माओवादी नेता मेहनत उर्फ मोछू के साथ गिरफ्तार किया गया। विभिन्न राज्यों में उसके सिर पर 1 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। उसके खिलाफ हत्या, विस्फोट, सुरक्षाबलों पर हमले, रंगदारी और देशद्रोह सहित 150 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज बताए जाते हैं।
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी को सुरक्षा एजेंसियां माओवादी नेटवर्क के लिए सबसे बड़ा झटका मान रही हैं। हालांकि पुलिस का कहना है कि केंद्रीय समिति के सदस्य असीम मंडल की तलाश अभी भी जारी है।

कौन है मिसिर बेसरा?
झारखंड के गिरिडीह जिले के पीरटांड़ प्रखंड के मदनाडीह गांव में 1960 में जन्मा मिसिर बेसरा कभी एक सामान्य छात्र था। उसने गांव से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए धनबाद चला गया। राजनीति विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई के दौरान वह वामपंथी उग्र विचारधारा से प्रभावित हुआ और 1980 के दशक में घर छोड़कर माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) में शामिल हो गया।
बाद में एमसीसी और पीपुल्स वार ग्रुप के विलय के बाद वह भाकपा (माओवादी) का हिस्सा बना और धीरे-धीरे संगठन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गया।
परिवार से टूटा रिश्ता, जंगल बना ठिकाना
मिसिर बेसरा के पिता स्वर्गीय दर्पण बेसरा और माता रसोमती देवी थे।
उसकी पहली पत्नी मोनासी देवी थीं। घर छोड़ने के बाद वर्षों तक कोई संपर्क नहीं रहने पर उन्होंने दूसरी शादी कर ली। बाद में माओवादी संगठन में रहते हुए बेसरा ने श्यामा देवी से विवाह किया।
उसके बेटे जय बेसरा दक्षिण भारत में कैंटीन हेल्पर के रूप में काम करते हैं, जबकि सिद्धार्थ दिहाड़ी मजदूर हैं। बेटी शांति कुमारी भी सामान्य जीवन जी रही हैं।
हाल के महीनों में उसके बेटे जय बेसरा और दामाद ने वीडियो संदेश जारी कर पिता से हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण करने की भावुक अपील की थी।
दिहाड़ी मजदूर बेटा, करोड़ों का इनामी पिता
मिसिर बेसरा की जिंदगी का सबसे बड़ा विरोधाभास यही रहा कि एक ओर वह करोड़ों रुपये के इनामी और देश के सबसे वांछित माओवादी नेताओं में शामिल था, वहीं उसका बेटा मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करता रहा।
सिद्धार्थ ने कई बार कहा कि बचपन के बाद उसने अपने पिता को कभी नहीं देखा। जब वह लगभग पांच वर्ष का था, तभी पिता जंगलों में चले गए और फिर कभी घर नहीं लौटे।
खून से लिखी दहशत की कहानी
चार दशकों तक मिसिर बेसरा ने झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के जंगलों में माओवादी नेटवर्क को मजबूत किया। उस पर कई बड़े हमलों की साजिश रचने और नेतृत्व करने का आरोप है।
2003 बिटकिलसोय आईईडी हमला
पश्चिम सिंहभूम जिले के बिटकिलसोय इलाके में सुरक्षाबलों के काफिले को निशाना बनाकर बारूदी सुरंग विस्फोट कराया गया।
इस हमले में बड़ी संख्या में जवान शहीद हुए और कई घायल हुए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया।
2004 बलिबा हमला
इसके अगले वर्ष बलिबा क्षेत्र में भी घात लगाकर सुरक्षाबलों पर हमला किया गया।
दोनों हमलों में कुल 55 सुरक्षाकर्मियों के शहीद होने की बात सामने आई। इन घटनाओं के बाद संगठन के भीतर मिसिर बेसरा का कद तेजी से बढ़ा और उसे केंद्रीय सैन्य आयोग में अहम जिम्मेदारी दी गई।
लैंडमाइन और घात लगाकर हमले का मास्टरमाइंड
जांच एजेंसियों के अनुसार मिसिर बेसरा की रणनीति थी—
- जंगलों में आईईडी बिछाना।
- सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमला करना।
- हथियार लूटना।
- पुलिस चौकियों को निशाना बनाना।
- लेवी वसूली से संगठन को आर्थिक ताकत देना।
इसी रणनीति ने उसे माओवादी संगठन का सबसे खतरनाक कमांडर बना दिया।
2009 का चर्चित कोर्ट जेलब्रेक
जून 2009 में बिहार के लखीसराय अदालत परिसर से मिसिर बेसरा को छुड़ाने की घटना देश की सबसे चर्चित नक्सली कार्रवाइयों में गिनी जाती है।
करीब 30 हथियारबंद माओवादियों ने मोटरसाइकिलों पर पहुंचकर अदालत परिसर के बाहर हमला किया।
पुलिस पर ताबड़तोड़ फायरिंग और बमबाजी की गई।
एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई जबकि कई घायल हुए।
हमलावर मिसिर बेसरा को छुड़ाकर जंगलों में फरार हो गए।
इस घटना के बाद उसकी तलाश और तेज कर दी गई।
गणपति का भरोसेमंद कमांडर
माओवादी संगठन के शीर्ष नेता गणपति के सबसे भरोसेमंद नेताओं में मिसिर बेसरा की गिनती होती थी।
उसे पूर्वी क्षेत्रीय ब्यूरो की जिम्मेदारी दी गई।
झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में संगठन विस्तार की जिम्मेदारी उसी के पास रही।
एक करोड़ का इनामी चेहरा
देश के कई राज्यों में उसके खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हुए।
उसके ऊपर एक-एक करोड़ रुपये तक का इनाम घोषित किया गया।
वह भास्कर, सुनीर्मल, प्रधान जी और सागर जैसे कई नामों से पहचान बदलता रहा।
अनल दा की मौत के बाद बढ़ा सत्ता संघर्ष
जनवरी 2026 में शीर्ष माओवादी नेता अनल दा के मारे जाने के बाद संगठन के भीतर नेतृत्व को लेकर संघर्ष तेज हो गया।
मिसिर बेसरा और केंद्रीय समिति सदस्य असीम मंडल के बीच प्रभाव को लेकर अंदरूनी खींचतान शुरू हो गई।
बताया जाता है कि संगठन दो गुटों में बंट चुका था।
सुरक्षाबलों का लगातार दबाव
पिछले कई महीनों से झारखंड के सारंडा, कोल्हान और आसपास के जंगलों में लगातार बड़े अभियान चलाए गए।
इन अभियानों में
- कोबरा बटालियन
- सीआरपीएफ
- झारखंड जगुआर
- जिला पुलिस
ने संयुक्त कार्रवाई की।
इन अभियानों में कई शीर्ष माओवादी मारे गए और दर्जनों ने आत्मसमर्पण किया।
गिरफ्तारी कैसे हुई
सुरक्षा एजेंसियों को लगातार इनपुट मिल रहे थे कि मिसिर बेसरा अपना ठिकाना बदल चुका है।
खुफिया सूचना के आधार पर धनबाद में विशेष अभियान चलाया गया।
कार्रवाई के दौरान मिसिर बेसरा और उसके साथी मेहनत उर्फ मोछू को गिरफ्तार कर लिया गया।
क्या अब खत्म हो जाएगा माओवादी नेटवर्क?
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी माओवादी संगठन के लिए सबसे बड़ा झटका है।
हालांकि अभी केंद्रीय समिति सदस्य असीम मंडल पुलिस की पकड़ से बाहर है।
अधिकारियों का कहना है कि झारखंड में सक्रिय माओवादी कार्यकर्ताओं की संख्या अब बेहद कम रह गई है।
परिवार की अपील आखिर बेअसर रही
बेटे जय बेसरा ने कई बार वीडियो जारी कर कहा था—
“पिताजी, अब हथियार छोड़ दीजिए। परिवार के पास लौट आइए।”
दामाद ने भी प्रशासन के सहयोग से आत्मसमर्पण की अपील की थी।
लेकिन बेसरा ने जंगल का रास्ता नहीं छोड़ा।
अब वर्षों बाद वह सुरक्षा एजेंसियों की गिरफ्त में है।
मिसिर बेसरा का प्रोफाइल
नाम: मिसिर बेसरा
जन्म: 1960
गांव: मदनाडीह, पीरटांड़, गिरिडीह (झारखंड)
संगठन: भाकपा (माओवादी)
पद: पोलित ब्यूरो सदस्य
इनाम: 1 करोड़ रुपये
उपनाम: भास्कर, सुनीर्मल, प्रधान जी, सागर
मामले: 150 से अधिक
मुख्य आरोप: हत्या, आईईडी विस्फोट, सुरक्षाबलों पर हमले, रंगदारी, नक्सली गतिविधियों का संचालन
आगे क्या?
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के बाद अब जांच एजेंसियां उससे संगठन के वित्तीय नेटवर्क, हथियार आपूर्ति, छिपे ठिकानों और केंद्रीय समिति के अन्य सदस्यों के बारे में पूछताछ करेंगी। सुरक्षा एजेंसियों की नजर अब असीम मंडल और बचे हुए सक्रिय माओवादी कैडर पर है। यदि यह अभियान सफल रहता है, तो झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में माओवादी नेटवर्क को निर्णायक झटका लग सकता है।













